Friday, July 24, 2009

सामाजिक परिवर्त्तन के संदर्भ में मैथिली की दशा और दिशा

साहित्य का कार्य समाज का यथार्थ चित्रण होता है । हमारी सझ में मैथिली साहित्य इससे वंचित है । मैथिली साहित्य में सामाजिक परिवर्त्तन का स्वर कुछ आलेखों में मिलता है परंतु इस तरह साहित्य का चित्रण पुरातनवादी रचनाकारों को नहीं पचता है । वैश्वीकरण का प्रभाव मैथिली साहित्य पर भी पड़ा है । मैथिली पत्रकारिता के सिद्धांत के निर्वहन के झूठे दंभ भरनेवाले जे कहने के लिए सबों की बात करते हैं, की रचनाधर्मिता खास क्षेत्र, वर्ग और समुदाय तक ही केंद्रित है । इस शैली से अलग चलने की साहस किसी में नही है । पटना से प्रकाशित समय साल नामक मैथिली द्वैमासिक पत्रिका का अस्तित्व दीर्घजीविता के लिए मसाला पर टिका है । इस तरह का साहित्य सृजन मात्र दुकानदारी ही है । दल विशेष से प्रभावित रचनाकार और संपादक की लेखनी अभी भी उसके चक्रव्यूह को तोड़ने में समर्थ नहीं है । हिंदी में दलित साहित्य का सृजन अच्छी तरह हो रहा है परन्तु मैथिली साहित्य अभी भी इससे परिपूर्ण नहीं हो सका है । जब तक इस वर्ग की चर्चा मैथिली में नहीं होगी तब तक इस उपेक्षित वर्ग के समर्थक भाषायी समृद्धि के लिए कैसे जुड़ेगे? गाँवघर में सर्वहारा मजदूर लोग और कथित छोटे जाति के प्राणी ही इस भाषा को वास्तव में जीवित करके रखा है । मैथिली अकादेमी से प्रकाशित और डॉ० मंत्रेश्‍वर झा द्वारा रचित कविता संग्रह अनचिन्हार गाम में इसकी झलक दृष्टिगोचर हुई परन्तु इसके बाद की रचना में इस दृष्टिकोण का सर्वथा अभाव हो गया है । समाज में आज मैथिली के संदर्भ में प्रचलित है कि यह ब्राह्यणों की भाषा है मगर यह बात मात्र दुष्प्रचार ही है । एक गंभीर पाठक के रूप में मैं यह जानता हूँ कि जियाउर रहमान जाफरी, कैसर रजा, मंजर सुलेमान मेघन प्रसाद, महेन्द्रनारायण राम, देवनारायण साह,अच्छेलाल महतो, सुभाषचन्द्र यादव, महाकांत मंडल, अभय कुमार यादव, बुचरू पासवान, हीरामंडल, सुरेन्द्र यादव, शिव कुमार यादव, बिलट पासवान विहंगम आदि अपने साहित्य सृजनता से मैथली साहित्य का समृद्धि प्रदान करने हेतु सक्रिय हैं । पटना में मैथिली की समर्पित संस्था चेतना समिति द्वारा दलित महिला अमेरिका देवी और तिलिया देवी के सम्मान का क्या मतलब वास्तव में मैथिली भाषायी क्षेत्र की दलित महिला के सम्मान से दलित वर्ग के भाषा-भाषी लोगों का समर्थन अवश्य मिलेगा । इस प्रयास को अन्य संस्थाओं को भी अपनाने की आवश्यकता है । कितने आश्‍चर्य की बात है कि नोबेल पुरस्कार की चयन समिति को इस वर्ग के कृतित्व और व्यक्‍तित्व पर नजर खुली है परन्तु मिथिला और मैथिली की संस्था इस विषय पर आँख मूँदे है । बिहार राज्य धार्मिक न्याय परिषद के अध्यक्ष डॉ० किशोर कुणाल इस विंदु पर केंद्रित होकर ‘दलित देवो भव” पुस्तक की रचना की जिसकी मैथिली में अनुवाद होनी चाहिये । मैथिली साहित्य के बहुआयामी प्रतिभा के उपन्यासकार कवि नाटककार और इस साहित्य को अपने अपरिमित साहित्यिक रचना से उर्वर बनाने वाले डॉ० ब्रजकिशोर वर्मा मणिपद्म अपने विविध रचना और स्वभावगत विशिष्टता के कारण अत्यंत लोकप्रिय हुए । उनके लोक गाथात्मक उपन्यास मिथिला की संस्कृति को समेटे है । लोरिक विजय, नैका बनिजारा, रायरणपाल, रजा सलहेस, लवहरि-कुशहरि, दुलरा दयाल की रचना कर मैथिली के सर्वागीण विकास, भाषायी समृद्धता और लोकप्रियता को बढ़ाने में अपना अविष्मरणीय योगदान दिया । उनके उपन्यास का वातावरण या विषयवस्तु में वो ऐसे पात्र के जीवन परिचय का प्रदर्शन किया जो अपने-अपने वर्ग समुदाय और वर्णव्यवस्था के अंतर्गत जीवनयापन करने में महत्वपूर्ण स्थान रखता है । नैका बनिजारा में बनियाँ समाज की व्यापकता तो है ही साथ ही धोबी, हजाम, ब्राह्यण, क्षत्रिय आदि का उल्लेख आदि भी है । राजा सलहेस में दुसाध की शौर्यगाथा का वर्णन किया गया है । लवहरि-कुशहरि में ब्राह्यण द्वारा पूजा पाठ के विधा और भील मलाह आदि की चर्चा भी हुई है । वीर क्षत्रिय राय रणपाल की कथा से सभी परिचित है । समाज में धनी और गरीब में क्या अंतर है, इसका सूक्ष्म परख मणिपद्म जी को था । ग्रामीण जीवनयापन के कारण उनकी लेखनी में ग्राम्य समाज की मर्मज्ञता दृष्टिगत होती है । अट्टालिका में रहनेवाले झुग्गी-झोपड़ी में रहकर झोपड़ी को जो चित्रण करेंगे उसमें अंतर निश्‍चित ही होगा । मणिपद्म ने रचना का पात्र यादव, दुसाध, मलाह, चमार, धोबी, वणिक आदि चुना जिसका कारण उनकी सामंत्री शोषण की घोर विरोधी मानसिकता और स्वातंत्र्य प्रेम था । सामाजिक संरचना की दृष्टि को ध्यान में रखकर मैथिली के अपूर्ण भंडार को पूर्ण करने के सफल प्रयास करनेवाले मणिपद्म के बाद कौन है? वर्त्तमान में मैथिली में उनके विलक्षण लेखनशैली कथा में पात्र का सार्थक विर्वहन और भाषा का व्यवस्थित रूप किंचित नहीं मिलता है । आज उनके शैली को प्रेरणाश्रोत मानकर लेखनी उठाने के पहल की आवश्यकता है । वर्त्तमान में मणिपद्म के भूले-बिसरे कृति के पुनप्रकाशन हेतु कर्णगोष्ठी, कोलकत्ता का योगदान प्रशंसनीय है । मैथिली प्रकाशकों की जिम्मेवारी है कि इस विषयवस्तु को ध्यान रखकर वैसे विधाका प्रकाशन करें जिसका अभाव है । आज के मैथिलीप्रेमियों का ध्यान चहटगर गीत, नाटक, व्यंग्य और शोधपूर्ण आलोचना विधा के प्रति ज्यादा है । मैथिली को लोकप्रिय बनाने के अभियान में कुछ रचनाकार लग गए हैं । आज के युवा वर्ग के नब्ज को पहचानने के बाद मधुकांत झा की ‘लटलीला’ प्रकाशित हुई है । निश्‍चित रूप से इस कदम से मैथिली के पाठकों में वृद्धि होगी । वास्तव में आज दो ही वस्तु की ब्रिकी ज्यादा होती है - “धर्म और काम” । धर्म पर मैथिली में बहुत रचना हो चुकी है परन्तु काम पर अभी तक इरह का दुःसाहस किसी रचनाकार ने नहीं किया है । आज के संदर्भ में समाज का सही चित्रण वार्त्तालाप के रूप में “लटलीला” में की गई है । हालांकि इस पुस्तक की सभी रचनाएँ पटना से प्रकाशित समय-साल पत्रिका में लतिका के छद्‌म नाम से पूर्व में ही छप चुकी है । इस आलेख के प्रसंग में पं० चंद्रनाथ मिश्र अमर का कथन उल्लेखनीय है कि “इसके माध्यम से बहुतों के सड़े अँतरी का दुर्गन्ध बाहर आ गया है । यथार्थ के नाम पर नग्नता को हम पचा नहीं पाते हैं । ” रूढिवादिता, अंधविश्‍वास, छूआछूत और संकीर्ण मानसिकता के विरूद्ध ध्यान में रखकर आज मैथिली में लेखन चाहिये । स्व० राजकमलचौधरी और स्व० प्रभास चौधरी की कृति का प्रतिबिंब नहीं मिलता है । व्यवस्था के प्रति विद्रोह का स्वर जिस लेखन में होगा उसका स्वागत तो होगा ही । आज के पाठकों की मानसिकता बदलते समय के अनुसार बदल रहा है । इसका मूल कारण सामाजिक परिवर्त्तन है । इस परिवर्त्तन को दृष्टि में रखकर अगर लेखन नहीं होगा उसको आज का पाठक नकार देगा । स्व० हरिमोहन झा की वृत्ति इसका सबसे बड़ा उदाहरण है । रसीले चटपटे, हास्य व्यंग्य और उपेक्षित वर्ग का स्वर मैथिली साहित्य में अनुगूंजित होगी तो उसकी लोकप्रियता और माँग दोनों में उत्तरोत्तर वृद्धि होगी । पुराने भाषायी शैली के स्थान पर नए युवा रचनाकारों की आलोचनात्मक लेखन को प्रोत्साहन मिलने की आवश्यकता है । गौरीनाथ, अविनाश, पंकज पराशर, श्रीधरम, विभूति आनंद, अमरनाथ, देवशंकर नवीन, तारानंद वियोगी, मंत्रेश्‍वर झा, प्रदीप बिहारी आदि की रचना इस वर्ग का प्रतिनिधित्व करती है । संक्षेप में कहा जाय तो मैथिली का सर्वागीण विकास तभी होगा जब इसके सभी विधाओं पर रचना होगी । अभी तक कुछ विधाओं पर ज्यादा रचना हो रही है मगर दूसरे विधाओं पर अत्यंत अल्प । इस तरह मैथिली की व्यापकता और लोकप्रियता स्वप्न जैसी लगती है । मैथिली में स्वाद के अनुसार रचना को ढालना पड़ेगा उसको सही दिशा मिलेगी और दशा सुधरेगी । वर्त्तमान में इसके लिए सबसे अधिक सक्रिय संस्था “भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर और साहित्य अकादेमी दिल्ली” तथा स्वाति फाउंडेशन (प्रबोध साहित्य सम्मान प्रदाता) आदि के मैथिली के संवर्द्धन हेतु प्रयास सराहनीय है ।
gopal.eshakti@gmail.com

Thursday, July 23, 2009

फिल्म समीक्षा : तेरे संग

अवयस्क उम्र में गर्भधारण जैसे समसामयिक विषय पर आधारित फिल्म ‘तेरे संग’ में बदलते समाज में बच्चों के दिमाग में चल रहे विचार विंदु को बोल्ड तरीके से उठाया गया है । अंत में वही ठीक होगा जो ठीक है । उक्‍त विचार दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने फिल्म तेरे संग के प्रचार कार्यक्रम के एक जलसे के दौरान कही ।
इस फिल्म में दिल्ली के सब्जी मंडी सहित कई अन्य इलाकों में भी शूटिंग की गई है । सतीश कौशिक के नेतृत्व एवं दृष्टि का लाभ इस फिल्म को मिला है । फिल्म के एक सीन में नायिका कहती है - “मुझे किस करो, मुझे देखना है कैसा लगता है? एक अन्य संवाद में नायक से नायिका पूछती है कि तुम मुझे प्यार करते हो? जिस पर नायक कहता है पता नहीं पुनः नायिका का यह कहना कि “ठीक है , जब पता करने लगो तो बता देना । ” बड़ा ही मर्मस्पर्शी है ।
“मैने पार किया” एवं “कयामत से कयामत तक” के बाद इस फिल्म में दर्शकों को अवयस्कि उम्र का निष्कपट एवं नादानी दोनों एक साथ देखने को मिलेगा । परिणाम तो देखेंगे ही । इस फिल्म की नायिका ने इस फिल्म में भूमिका निभाने हेतु स्कूल डोनेशन के बहाने फिल्म डायरेक्टर से प्रस्ताव हासिल किया था । जो काबिलेगौर है । कुल मिलाकर युवाशक्‍ति पर एक सशक्‍त और समसामायिक फिल्म कही जा सकती है ।

ऐसी न्याय व्यवस्था से कैसी उम्मीद?

न्यायालयों में बड़ी संख्या में मुकदमों के लंबित रहने पर राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने भी चिंता जाहिर की है । उन्होंने पुराने कानूनों में सुधार और न्यायिक संस्थानों को मजबूत बनाने की जरूरत बताई । इतने साल पुराने कानून को हम आज भी ढोते फिर रहे हैं । समय के परिप्रेक्ष्य में कानून भी व्यापक संशोधन एवं बदलाव की माँग कर रहा है । कानून की खामियों की वजह से अपराधी अपराध कर बेरोकटोक होकर घूम रहे हैं । वहीं मुक्‍तभोगी सजा पाने को विवश है । अदालतों के चक्‍कर लगाते-लगाते एवं हर कदम पर जेब ढीली करने के कारण ही अधिकांश लोग अदालतों के चक्‍कर लगाने से परहेज करते हैं तथा समाधान के अन्य विकल्प ढूँढने लगते हैं । प्रश्न यह उठता है कि समय पर यदि न्याय ना मिले तो वैसे न्याय का क्या औचित्य? आज भी भारतीय जेलों में बिना अपराध घोषित कैदी बढ़ रहे हैं । क्या यह भारतीय प्रजातंत्र के लिए डूब मरने जैसी बात नहीं है? आज आवश्यकता है त्वरित न्याय व्यवस्था की फास्ट ट्रैक कोर्ट की अदालत आपके गाँव तक जैसे व्यवस्था की । देश की संपूर्ण न्याय व्यवस्था को त्वरित एवं पारदर्शी बनाने हेतु डिजिटल करने की परम आवश्यकता है । सरकार की मंशा हो तो छः महीने के अंदर ही कानूनों के संशोधन संबंधी कार्य पूरे किए जा सकते हैं । आखिर आजादी के ६२ वर्ष गुजरने के बाद भी अब तक इतनी सरकार आई गई मगर किसी को भी इस देशव्यापी महत्वपूर्ण समस्या के समाधान की चिंता क्यों नहीं हुई?
विगत लोकसभा चुनाव के दौरान कानून की एक खामी अपने आप में सारी कहानी कह देती है “विचाराधीन कैदियों को वोट डालने का अधिकार नही देने को लेकर कानून में ही मतभेद है । जनप्रतिनिधि अधिनियम १९५१ के रूल ६७ (५) में विचाराधीन कैदियों को मताधिकार से वंचित कर दिया गया है जबकि संविधान के अनुच्छेद ३२६ मं कैदियोंको भी मत डालने का अधिकार देने की बात कही गई है । ”
इतनी सुरक्षा व्यवस्था के बावजूद भी नामी गिरामी जेलों में भी कैडी अपने दबंगता एवं रूतबे के बदौलत मोबाईल, टीवी, पिस्तौल, शराब का जमकर इस्तेमाल कर रहे हैं । इस आशय की खबरें हमें अक्सर पढ़ने को मिलती हैं । जेलों में क्षमता से अधिक कैदियों को जानवरों की तरह ठूँसकर रखा जाता है ।
भय, पैसा और पुलिस की दबाब के प्रभाव में आकर अदालत में गवाहों के ब६यान बदल जाते हैं । मध्यप्रदेश, राजस्थान, कर्नाटक और महाराष्ट्र में गवाहों की स्थिति को लेकर डेढ साल के दौरान की गई मामलों के अधययन से यह निषकर्ष निकला है कि ३१ फीसदी गवाहों को रूपए का लालच दिया गया, ३९ प्रतिशत को डराया धमकाया गया तथा २४ फीसदी ने माना कि उन्हें पुलिस द्वारा ही परेशान किया गया । केंद्रीय गृह मंत्रालय के अधीन पुलिस अनुसंधान एवं विकास ब्यूरो के सहयोग से नेशनल लॉ इंस्टीच्यूट युनिवर्सिटी, भोपाल के प्रो० जी० एस० वाजपेयी ने इस अध्ययन में गवाहों के पलटने के कारणों से लेकर आने वाली दिक्‍कतों की बारीकी से पड़ताल की । इस दौरान चार राज्यों के ७८९ गवाहों से चर्चा कर किए गए अध्ययन की रिपोर्ट हाल ही में ब्यूरो को सौंपी गई है ।
प्रो० बाजपेयी के अनुसार ः गवाहों की स्थिति पर देश में यह पहला अध्ययन है । गवाहों की सबसे बड़ी दिक्‍कत यह भी सामने आई कि उन्हें एक ही मामले में गवाही देने के लिए कई चक्‍कर लगाने पड़ते हैंऔर इससे होने वाले नुकसान को देखते हुए वे गवाही देने से बचते हैं । ४१ फीसदी गवाहों ने बताया कि उन्हें गवाही देने के चक्‍कर में आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा
।३५ फीसदी का व्यवसाय प्रभावित हुआ । गौरतलब है प्रो. सभरवाल प्रकरण में कुछ पुलिसकर्मी व कुछ गवाह मुकर गए थे जिन्हें पक्ष विरोधी घोषित किया गया था । कोर्ट के चक्‍कर लगाते-लगाते थक गए ।
नियत दिन सुनवाई नहीं होना गवाहों को हतोत्साहित करने का मुख्य कारण सामने आया है । ६१.७ फीसदी मामलों में देरी की वजह स्थगन रही । ६५ फीसदी गवाहों को मामले की सुनवाई के सिलसिले में एक से अधिक बार अदालत आना पड़ा । ९.४ फीसदी गवाहों को तो छह और इससे अधिक बार कोर्ट के चक्‍कर लगाना पड़े । दंड प्रकिया संहिता की धारा ३०९ में उल्लेख है कि उस दिन न्यायिक प्रकिया प्रारंभ होने के बाद यह तक जारी रहेगी जब तक सभी उपस्थित गवाहों का परीक्षण न हो जाए ।
ऐसी भी स्थिति ः ३९ फीसदी गवाहों के साथ गवाही के पहले या बाद में मारपीट की गई । राजस्थान में इस तरह के मामलों का प्रतिशत २०.५ तथा मप्र में ५.८ पाया गया । ३ फीसदी गवाहों को ही गवाही भत्ता मिल पाता है । ३५ फीसदी गवाह फर्जी पाए गए । ४५ फीसदी गवाह जटिल न्यायिक प्रक्रिया को बयान बदलने का कारण मानते हैं । ४६.३ फीसदी का अनुभव था कि अभियुक्‍त आर्थिक रूप से ताकतवर है तो वह दबाव द्वारा गवाह पलटने में सफल होताहै । यह बात महाराष्ट्र में ४०.६ फीसदी तथा मप्र में १२.६ फीसदी गवाहों ने मानी । ३९.६ फीसदी गवाहों का मानना है कि अभियुक्‍त की आपराधिक पृष्ठभूमि गवाहों के पलटने का कारण होती है ।

Thursday, July 16, 2009

गाँधीवाद की बढ़ती ख्याति

कितनी विडंबना है कि विश्‍व की महाशक्‍ति अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा ने भी महात्मा गाँधी को अपने प्रेरणा स्त्रोतों में प्रमुख नेता माना है । ओबामा का यह कथन काफी महत्वपूर्ण है कि -“हिंसा बगैर उद्देश्य की पूर्त्ति का सिद्धांत का उदाहरण मैने कहीं और नहीं देखा । महात्मा गाँधी भारत की असली उन्‍नति ग्राम आधारित अर्थव्यवस्था में मानते थे लेकिन वैश्‍वीकरण की दौड़ में इसे पूरी तरह नजर‍अंदाज किया गया । वैश्‍विक आर्थिक मंदी ने जब अपना जोर दिया और महाशक्‍ति की भी हालात बदतर होने ल्गी तब समझदार दिग्गजों ने गाँधी के ‘चलो गाँव की ओर” नीति को अपनाने में ही अपनी बुद्धिमानी समझी । इसी अचूक रामबाण बदौलत उद्योग जगत्के महारथियों ने इस महासंकट से निजात पाई । मंदी ने भारत को बहुत कुछ नहीं बिगड़ा है तो इसकी सबसे बड़ी वजह ग्रामीण और कस्बाई बाजार ही है । देश में केवल उन्हीं क्षेत्रों में मंदी की सबसे ज्यादा मार पड़ी है जो विदेशों से कारोबार पर आधारित है जबकि देशी ग्रामीण और कस्बाई बाजार के बदौलत कई क्षेत्र वर्त्तमान में बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं । आने वाले समय में अर्थव्यवस्था की धुरी भी यही बाजार बनने वाला है । जब महानगरों और बड़े शहरों में कई वस्तुओं और सेवाओं का बाजार संतृप्त हो वुका होगा तब इन कंपनियों के पास अपने उत्पादों की बिक्री के लिए ग्रामीण और कस्बाई बाजारों को ही लक्ष्य बनाना होगा । संक्षेप में कहा जाय तो गाँधी दूरदर्शी थे । उन्हें भारत के हर इलाकों और आवश्यकताओं की जानकारी थी । वे जानते थे कि भारत की अधिकांश जनता गाँवों में बसती है इसलिए गाँव के सशक्‍तिकरण के बगैर राष्ट्र के सशक्‍तिकरण की बात बेमानी होगी । हालाँकि इस बार गाँवों के विकास हेतु बजट राशि में वृद्धि कर प्रणव मुखर्जी ने गाँधीवादी फॉर्मूले को ही अपनाया है जो एक अशुभ संकेत है । आज विदेशों में गाँधीवादी विचारधारा, मूल्य, दर्शन आदि पर नित्य नए शोध हो रहे हैं और हम भारतीय गाँधीवादी सिद्धान्तों की उपेक्षा कर रहे हैं । उत्तरप्रदेश की मुख्यमंत्री अपनी राजनीति चमकाने हेतु गाँधी का अपमान कर रही है । यहाँ कुछ उदाहरण प्रस्तुत किए जा रहे हैं जिससे विदेशों में गाँधी की बढ़ती ख्याती और ज्ञिजासा का पता चलता है । समय का चक्र एक बार फिर गाँधीवाद के धुरी पर ही केन्द्रित होगा ऐसा मेरा विश्‍वास है । लंदन में नीलाम होंगे गांधी के खतब्रिटेन के प्रमुख नीलामघर सॉथेबी’ज में १४ जुलाई को महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू के हस्ताक्षरित पत्र और अन्य दस्तावेजों तथा पोस्टकार्डो की नीलामी की जाएगी । नीलामी के दौरान महात्मा गांधी द्वारा इस्लामिक विद्वान और खिलाफत आंदोलन के प्रमुख नेता मौलाना अब्दुल बारी को उर्दू में लिखे गए हस्ताक्षरित पत्रों की अनुमानित कीमत २,५००-३००० पाउंड (करीब १.९९ से २.३८ लाख रूपए) तय की गई है । गांधीजी के हस्ताक्षरयुक्‍त खादी के एक कपड़े की अनुमानित कीमत २०००-२५०० पाउंड (लगभग १.५९-१.९९ लाख रूपए) आंकी गई है । माना जाता है कि यह कपड़ा खुद गांधीजी ने बुना था । उन्होंने इसे दक्षिण अफ्रीका की अभिनेत्री मोइरा लीस्टर को भेंट किया था । इस नीलामी में कुल १५३ वस्तुओं को रखा जाएगा । अमेरिका में गांधी बनेंगे न्याय के प्रतीकअमेरिका में महात्मा गांधी को स्वतंत्रता व न्याय का प्रतीक माने जाने की तैयारी शुरू हो गई है । अमेरिकी कांग्रेस के छह सदस्यों ने भारत के राष्ट्रपिता गांधी को पूरे विश्‍व में स्वतंत्रता व न्याय का प्रतीक बताते हुए उनकी १४० वीं जयंती मानने के लिए प्रतिनिधि सभा में एक प्रस्ताव पेश किया है । जिसमें कहा गया है कि गांधी का नेतृत्व दूरदृष्टि से भरा था । प्रस्ताव में कहा गया है कि इसी वजह से विश्‍व के सबसे पुराने लोकतंत्र अमेरिका तथा विश्‍व के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत में एक मजबूत संबंध कायम हो पाएं है । इसमें यह भी उल्लेख किया गया कि गांधी एक महान राजनीतिज्ञ नेता, समर्पित और आध्यात्मि हिंदू व भारत के राष्ट्रीय आंदोलन के प्रणेता थे । ब्रिटेन में हुआ गांधीजी की प्रतिमा का अनावरण भारतीय मूल के लोगों की बहुलता के कारण ब्रिटेन का ‘लिटिल इंडिया’ कहे जाने वाले लेस्टर शहर में भारत के राष्ट्रगान की ध्वनि के बीच महात्मा गांधी की प्रतिमा का अनावरण किया गया । इस मौके पर करीब एक हजार लोग सहर की बेलग्रेव रोड में उपस्थित थे । इस सेरेमनी के मौके पर ब्रिटेन के गृहमंत्री एलन जॉन्सन भी मौजूद थे । ब्रिटेन में अपनी तरह की यह दूसरी विशाल प्रतिमा स्थापित हुई है । लंदन अंडरग्राउंड में महात्मा गांधी के संदेशलंदन अंडरग्राउंड के जरिए सफर करने वालों को अब भारत के राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की वह मशहूर पंक्‍ति सुनने को मिलेगी जिसमें उन्होंने कहा है कि आंख के बदले आंख का न्याय तो पूरी दुनिया को अंधा बना देगा । लंदन अंडरग्राउंड में गांधी के अलावा सारट्रे, आइंस्टीन और दूसरे महान विचारकों की मशहूर पंक्‍तियां भी उद्‌घोषणा के बीच सुनने को मिलेगी । लंदन परिवहन प्राधिकरण द्वारा यह कदम अंडरग्राउंड यात्रा को आनंदमय बनाने के मकसद से उठाया गया है । महान विचारकों के मशहूर पंक्‍तियों के संग्रह का काम कई पुरस्कार जीत चुके कलाकार जर्मी डेलर को दिया गया था । इसकी शुरूआत पिकाडली लेन पर बहुत जल्दी ही होने वाली है । अभी ट्रायल के तौर पर इन पंक्‍तियों की उद्‌घोषणा हुई है । इसके बाद यात्रियों की मिली-जुली प्रतिक्रिया आई है । हिन्द स्वराज की आत्माएक बात हम गाँधीवालों को बार-बार याद करनी चाहिए और गाँठ बाँध कर रखनी चाहिए । वह यह है कि गाँधी-विचार और प्रयोग के टुकड़े नहीं हो सकते, करने की कोशिश भी नहीं करनी चाहिए । हम इसे गाँधीजी की विशेषता समझे या कमी लेकिन यह अकाट्य है कि गाँधी आयेगा तो पूरा ही आयेगा या नहीं आयेगा । उसके टुकड़े बनाकर, अपनी सुविधा या पसन्दगी से हम उसे चाहें जितना पूजें, उसका विद्रूप ही बनाएंगे, उसका उपहास ही करेंगे । हमने रचनात्मक कार्यक्रम की एक पूँछ पकड़ कर गाँधीजी को पकड़ लेने का दावा किया ! और शासकों ने गाँधीजी को कर्मकाण्डों और पुतलों में जड़वत्‌ बना देने तथा दूसरे को पीटने की लाठी की तरह भाँजने का करतब किया है । हिन्द स्वराज की आत्मा व्यवस्था चलाने की नहीं, व्यवस्था बदलने की है और इसलिए इसे लेकर चलेंगे तो स्थापित व्यवस्था से टकराव अपरिहार्य है । यह टकराब कब, कैसे, कितना और कहाँ होगा, इसका निर्धारण उस वक्‍त के नेतृत्व और परिस्थिति पर छोड़ना होगा । विगत वर्ष भारत में गाँधीजी के सत्याग्रह पर अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन में आर्थिक उदारवाद में गांधी जी के आम आदमी की ओर ध्यान खींचते हुए सोनिया गांधी ने कहा कि वैश्‍वीकरण का लाभ कुछ लोगों तक ही सीमित न रह जाये इसके लिए विकासशील देशों की सरकारोंको ध्यान देना चाहिए । श्रीमती गांधी ने कहा कि महात्मा गांधी ने जो रास्ता दुनिया को दिखाया वह आज भी प्रासंगिक है । गांधी जी के सत्याग्रह पर अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन में विभिन्‍न वक्‍ताओं ने इस बात पर जोर दिया कि आम आदमी तक विकास की किरण पहुंचे तथा विश्‍व में चल रहे युद्ध उन्माद को अहिंसक तरीके से शांत किया जाये । महात्मा गांधी जी ने १०० साल पहले दक्षिण अफ्रीका से सत्याग्रह की शुरूआत नस्लवाद के विरोध में की थी । धीरे-धीरे वे विश्‍व के दबे-कुचले तथा रंगभेद से पीड़ित लोगों की आवाज बन गये । उन्होंने दक्षिण अफ्रीका से उस समय के सबसे बड़े शासक के विरूद्ध अहिंसा के बल पर लड़ाई लड़ी और्भारत आने पर उन्होंने इस देश की आजादी के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया । सम्मेलन में जांबिया के पूर्व राष्ट्रपति कनेथ कोंडा ने इराक का उल्लेख करते हुए चिंता प्रकट की । उन्होंने कहा कि अमेरिका तथा इंग्लैंड जैसे सम्पन्‍न राष्ट्रों को यहां से तत्काल अपनी सेनायें हटा लेनी चाहिये । उनका मानना था कि युद्ध से कोई समस्या हल नहीं हो सकती बल्कि यहां भी गांधी जी के अहिंसक आंदोलन का सहारा लेना चाहिए । उन्होंने कहा कि इस समय विश्‍व में गरीबी के खिलाफ युद्ध छेड़ने की आवश्यकता है । आज भी विकासशील देशों में बहुत बड़ी संख्या में लोग भोजन भी जुटा नहीं पाते हैं । दूसरी ओर एड्‌स जैसी बीमारी दिन ब दिन बढ़ती जा रही है । इस बीमारी को रोकने के लिए वह धन खर्च किया जाना चाहिए जो युद्ध में खर्च हो रहा है । उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि मानव की सेवा उसी ढंग से की जानी चाहिए जिस तरह महात्मा गांधी ने अपने समय में की थी । इस सम्मेलन में मॉरीशस के प्रधानमंत्री नवीन चन्द्र रामगुलाम, पोलैंड के मजदूर नेता लेक वालेसा, दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद विरोधी तथा नोबेल पुरस्कार से नवाजे गये बिशप डेसमंड टुटू, बांग्लादेश में ग्रामीण बैंक के संस्थापक तथा नोबेल पुरस्कार विजेता मौ. यूनुस, महान नेता नेल्सन मंडेला के साथ कंधे से कंधा मिलाकर दक्षिण अफ्रीका के स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेने वाले अहमद कथराडा, मिशिगन विश्‍वविद्यालय के अर्थशास्त्री सी.के. प्रहलाद महात्मा गांधी की पौत्री इला गांधी, श्रीलंका में सर्वोदय आंदोलन के प्रणेता डा. ए. टी. आर्यरत्‍न, पेरू के अर्थशास्त्री हेरनाडो सोटो के अतिरिक्‍त भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, तत्कालीन विदेश मंत्री प्रणव मुखर्जी तथा रक्षा मंत्री ए. के. एन्टोनी आदि मौजूद थे । सम्मेलन में अपने विचार व्यक्‍त करते हुए पोलैंड के श्रमिक नेता लेक वालेसा ने कहा कि महात्मा गांधी को सिर्फ भार और दक्षिण अफ्रीका तक ही सीमित नहीं किया जाना चाहिए बल्कि वे पूरी दुनिया की धरोहर हैं । गांधीजी ने मानव सेवा का अहिंसक ढंग से सेवा करने का रास्ता दिखाया जो आज के समय में सर्वोत्‍तम मार्ग है । बिशप डेसमंड टुटू ने कहा था कि हर तरह की असमानता को मिटाने के लिए गांधीजी के विचार सबसे ज्यादा अपनाने योग्य हैं । उन्होंने कहा कि विश्‍व की आर्थिक व वैज्ञानिक प्रगति होने के बाद भी करोड़ों लोग बहुत ही तंगी का जीवन व्यतीत कर रहे हैं । इन्हीं लोगों की सेवा का बीड़ा महात्मा गांधी ने उठाया था । गांधी जी की शिक्षाओं का सही अनुपालन तभी हो सकेगा जब पीड़ितों के चेहरे पर हम लोग मुस्कान ला सकेंगे । भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा कि विश्‍व के सभी विवादों को शांतिपूर्ण तरीके से हल किया जाये ।

स्वाधीनता के ६२ वर्षः क्या खोया क्या पाया ?

स्वाधीनता के ६२ वें वर्ष में हम प्रवेश कर चुके हैं परन्तु क्या हम वास्तव में स्वाधीन हो पाए हैं? हमने अब तक क्या खोया एवं क्या पाया? इस तथ्य पर चिंतन किए बिना राष्ट्र की मूलभूत समस्याओं का समाधान संभव नहीं है । आज केवल समस्याओं पर ही मूलभूत समस्याओं का समाधान संभव नहीं है । आज केवल समस्याओं पर ही बातें होती है, समाधान पर चर्चाएं होती ही नहीं है क्योंकि वैश्‍विक दृष्टि का अभाव है । हो सकता है हम अपने दृष्टि को क्रियान्वित करने में सक्षम ना हों । दोनो ही परिस्थिति खेदजनक है । आईटी क्रांति के बदलाव ने हर क्षेत्र को नई दिशा दी है । उदाहरण के तौर पर बैंक में हमें जमा अथवा निकासी हेतु घंटों पंक्‍ति में लगा रहना पड़ता था परन्तु आज एटीएम एवं नेटबैंकिग के कारण मिनटो में लेन-देन आसान हो गया । लोगों के पास आज पैसा है परंतु समय नहीं है । ऐसी परिस्थिति में लोगों की आकांक्षाएँ एवं पूर्ति करने हेतु संघर्ष बड़ गई है । हम संतोष को त्याग रहे हैं । अपने संस्कृति को भूलते जा रहे हैं । हम क्या थे, के बारे में विदेशी अनुसंधान करके हमें बता रहेहैं । हम पाश्‍चात्य संस्कृति के मोहपाश में पूरी तरह जकड़ चुके हैं । टीवी और इंटरनेट ने इस संस्कृति को और अधिक हवा दी है । इस स्थिति में भी हम अपने धर्म, सभ्यता, धरोहर से विमुख होते जा रहे हैं । अर्थात यह सब चीजें कल इसलिए हो जायेगी । क्या हमारे ऋषि-मुनियो, महापुरूषों ने इसी के लिए त्याग और तपस्या किया था । भारत जिन कारणों से विश्‍वगुरू है उन कारणों को छिन्‍न- भिन्‍न करने का षडयंत्र चल रहा है ताकि भारत और सशक्‍त बन ही नहीं सके । वास्तव में हम क्षणिक उपरी समस्याओं को ही देख पाते हैं और उसी के समाधान तक सीमित रह जाते हैं जबकि मौलिक समस्याएं अर्थात समस्याओं की जड़ तक पहुँच ही नहीं पाते हैं । होना यह चाहिए कि बदलाव हेतु सक्षम सकारात्मक शक्‍तिओं में आपसी संयोजन का कार्य शुरू हो । समन्वय के लिए समाज को डिजिटल होना पड़ेगा । सरकारी, गैर सरकारी सभी विभागों/ श्रेत्रों को कंप्यूटर से जोड़ना पड़ेगा ताकि पारदर्शिता आए । इसी पारदर्शिता से समन्वय के साथ-साथ भ्रष्टाचार पर भी अंकुश लगेगा जो हमारी व्यवस्था की जड़ों को खोखला कर रही है। समय की जबरदस्त माँग है कि एक बार फिर संपूर्ण क्रांति का उद्‌घोष हो । ताकि आमूलचूल परिवर्तन हेतु माहौल बन सके । राष्ट्र सर्वप्रथम की भावना एवं मानसिकता की अनिवार्यता का जज्बा जगाने हेतु छात्रों नौजवानों को जनजागरण का अभियान छेड़ना पड़ेगा । परिवर्तन हेतु मुख्यतः चार शक्‍तियाँ प्रभावी भूमिका अदा कर सकती है - मातृ शक्‍ति । महिला सशक्‍तिकरण, युवा शक्‍ति, आध्यात्मिक शक्‍ति एवं आईटी शक्‍ति । इसमें सबसे अधिक उर्जा आईटी शक्‍ति में है परन्तु उसे नियंत्रित करने हेतु आध्यात्मिक शक्‍ति की आवश्यकता है । कंप्यूटरीकृत व्यवस्था अथवा डिजिटल फॉरमेटिंग आवश्यक है परन्तु इसके इस्तेमाल के कुछ हानिकारक परिणाम भी सामने आ रहे हैं । इसके उपाय आध्यात्मिकता में ही निहित है । शांति एवं विकास की परिकल्पना “स्पिरिचुअल मैन एंड डिजिटल सोसाइटी” के फॉर्मूले से ही साकार हो सकती है । इस स्लोगन पर अनुसंधान करने पर पता चल सकेगा कि एक-एक वाक्य में बदलाव एवं उर्जा के सारे तथ्य समाहित है । इतिहास गवाह है कि छात्रों-युवाओं ने जब-जब अंगड़ाई ली है तो राष्ट्र और दिशा में बदलाव लाने का कार्य किया है । आज इस शक्‍ति की झंकृत करने की आवश्यकता है जो वैचारिक परिवर्त्तन के रामवाण से ही संभव है । पुरूष प्रधान समाज में महिलाएँ बराबरी एवं सम्मान का दर्जा पाने को आतुर है जो एक शुभ संकेत है । जनजागरण एवं शिक्षा ने हमारे सोंच को बदला है । हमारी अगली पीढ़ी हमसे अधिक ज्ञानवान एवं सजग है । आज पुराने आजमाए फॉर्मूलों पर नए का चस्पा लगा कर अलग तरीके से पेश करने की प्रवृत्ति बढ़ी है । सहकारिता, सहभागिता, पारदर्शिता, सकारात्मकता, समन्वय का सिद्धांत पुराना ही तो है बेशक नए लोग नए तरीके से इसकी व्याख्या में जुटे हैं । आज विकास की सारणी में हम बेशक अपना स्थान ऊँचे पर रखते हो परन्तु मूल्य, विचार, दर्शन, दृष्टिकोण, सभ्यता, संस्कृति, कमजोर कर दिया है । हमलोग केवल नकलची बनकर रह गए हैं । शिव खड़ा कहते हैं “अन्याय करने से भी अधिक दोषी तो अन्याय सहने वाला है” परन्तु आज हम अन्याय सहने के अभ्यस्त बन चुके हैं । व्यक्‍तिगत स्वार्थ ने हमें इस तरह पंगु बना दिया है कि हम स्वयं के अतिरिक्‍त दूसरे की आवश्यकता को समझना ही नहीं लगता कि इससे अच्छे तो हम गुलाम थे । हाँ इतना अंतर जरूर आया है कि पहले हम अंग्रेजों के गुलाम थे परन्तु अब सामंतवादियों, भ्रष्टाचारियों एवं दुर्जनों के गुलाम है । हमारे आईटी जगत के लोगों को ऐसा सॉफ्टवेयर बनाने में अभी असफलता नहीं मिली है जिसके माध्यम से हमारी चेतना, हमारे मूल्य, हमारे अधिकार, और हमारे कर्त्तव्य को सही-सही दर्शाकर आमजनों के दिमाग में भा सके । गाँधी आज अप्रासंगिक हो गए हैं । उदाहरण स्वरूप गाँधी पर बने संस्थाओं मेंही आपसी सामंजस्य और सहभागिता का अभाव है तो दूसरी संस्थाओं से किस बात की अपेक्षा? जिस नैतिक मूल्यों की दुहाई हम देते हैं उस नैतिकता को अनिवार्य शिक्षा के रूप में शामिल करने की हमारे शासकों/प्रशासकों को समझ नहीं आती । हम कहाँ जा रहे हैं, इसका पता खुद नहीं मालूम? हमारे क्रांतिकारियों, स्वतंत्रता सेनानियों की त्याग और बलिदान को समानित करने के बजाय नेताओं ने अपनी मूर्त्ति लगाने का अभियान छेड़ा हुआ है । यह कहाँ तक उचित है ? आज हर श्रेत्र मे न्यायालय को हस्तक्षेप करना पड़ता है । आखिर हम अपने कर्त्तव्य को क्यों भूल जाते हैं । कर्त्तव्य पथ पर चले बिना अधिकार की माँग करना बेमानी है । महाशक्‍तियों को यह अहसास हो गया है कि भारत अंग्रेजों से तो स्वाधीन हो है परन्तु इसे अपने पराधीनता के जाल में कैसे जकड़ा जाय । महाशक्‍तियों ने यह अनुसंधान कर लिया है कि समृद्ध और गौरवशाली भारतीय सभ्यता संस्कृति के बलबूते पर भारत विश्‍वशक्‍ति बन सकता है । इसलिए विश्‍वशक्‍ति बनने की राह में अनेक काँटे बिछाए जा रहे हैं । हमारी ढुलमुल विदेश नीति इसके लिए पूरी तरह से जिम्मेदार है । भारतीय छात्रों, नौजवानों की प्रतिभा क्षमता के विदेशी कायल हो चुके हैं । वे अपने सभी श्रेत्रों में भारतीय मूल को अब स्थान देने लगे हैं । इसका कारण आखिर क्या है? हमें अपनी शक्ति को समझना होगा, केन्द्रित करना होगा, समन्वित करना होगा तथा उसको देश के व्यापक हित के लिए पुनः आध्यात्मिक एवं ई-क्रांति का आगाज करना पड़ेगा । तभी २०२० के सपनों का भारत की परिकल्पना साकार हो सकेगी ।

एक नीलेकणी ही क्यों ?

अंततः केन्द्र सरकार ने देश के सभी नागरिकों के लिए विशिष्ट पहचानपत्र बनाने की परियोजना का जिम्मा इन्फोसिस के को-चेयरमैन नंदन नीलेकणी को सौंप दिया । इस परियोजना का नेतृत्व करने के लिए सरकार ने उनको कैबिनेट मंत्री का दर्जा भी दिया है । यूनिक आइडेंटिफिकेशन अथॉरिटी ऑफ इंडिया (यूआईएआई) चेयरमैन के तौर पर नियुक्‍ति होने के तुरंत बाद नीलेकणी ने इंफोसिस से इस्तीफा दे दिया कंपनी ने बजाप्रा बयान जारी कर कहा, ‘इंफोसिस के निदेशक मंडल ने नीलेकणी का इस्तीफा मंजूर कर लिया है जो ९ जुलाई २००९ से प्रभावी हो गया । सूचना एवं प्रसारण मंत्री अंबिका सोनी ने कैबिनेट के फैसले की जानकारी देते हुए बताया कि यह प्राधिकरण भारत सरकार की प्रमुख योजनाओं से लाभान्वित हो रहे लोगों का पहचानपत्र बनाने का काम करेगा ताकि सही व्यक्‍ति तक इन योजनाओं का लाभ पहुँच सके । इसके तहत देश के सभी नागरिकों को एक “यूनिक बायोमीट्रिक जिसके नंबर के आधार पर नागरिक की पूरी जानकारी सरकार के पास उपलब्ध होगी । आइडेंटिटी कार्ड दिया जाएगा । उद्योग जगत के सूत्रों के अनुसार इस परियोजना की लागत १०,००० करोड़ रूपए है । चालू वित्त वर्ष के अंतिम बजट में १०० करोड़ रूपए चिहित किए गए है । ५४ वर्षीय नीलकेणी ने १९७८ में आई आईटी बंबई से इलेक्टिकल इंजीनियरिंग में स्नातक की डिग्री हासिल की । इन्फोसिस के को-चेयरमैन के पद से इस्तीफा देने के बाद ही नीलकेणी सार्वजनिक स्तर पर काफी कार्य कर रहे हैं । वे राष्ट्रीय ज्ञान आयोग के सदस्य होने के साह ही ई-गवर्नेस के लिए बनाए गए राष्ट्रीय सलाहकार समूह के भी सदस्य हैं । इसके अतिरिक्‍त नीलेकणी जवाहरलाल नेहरू शहरी योजना की समीक्षा समिति के भी सदस्य हैं । अप्रैल २००८ में ही नीलेकणी एनसीएईआर के अध्यक्ष चुने गए थे । २८ वर्ष पहले एनाआर नारायणमूर्ति के साथ मिलकर इन्होंने इंफोसिस कंपनी की स्थापना की थी । यूएआईए का गठन जनवरी २००९ मेंयोजना आयोग के अंग के तौर पर किया गया था । इस पर देश भर में यूनिक आइडेंटिफिकेशन योजना लागू करने से संबंधित नीतियाँ और कार्यक्रम तय करने की जिम्मेवारी होगी । अथॉरिटी रजिस्ट्रार जनरल ऑफ इंडिया के साथ मिलकर काम करेगा, जो राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर को अंतिम रूप देने में लगा है । सरकार की योजना के अनुसार सन्‌ २०११ तक सभी नागरिकों को यूनिक आइडेंटिफिकेशन संख्या जारी कर दी जाएगी । अथॉरिटी इन संख्याओं के डाटाबेस को नियंत्रित करेगा और साथ ही नियमित अंतराल पर इन्हें अपडेट करने और इनके रखरखाव का काम भी उसके जिम्मे होगा । यूआईडी परियोजना के जरिए देश की आंतरिक सुरक्षा से जुड़ी चिंताओं के समाधान अलावा वस्तुओं और सेवाओं के सार्वजनिक बँटवारे के लिए एक व्यवस्थित तंत्र भी विकसित किया जा सकेगा । प्रारंभ में यूआईडी संख्या राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर या मतदाता सूची के आधार पर आवंटित की जाएगी तथा व्यक्‍ति की पहचान पर जालसाजी की संभावना खत्म करने के लिए इसमें तस्वीर और बायोमेट्रिक आँकड़े जोड़े जाऐंगे । साथ ही लोगों के फायदे के लिए इसके आसान पंजीकरण और जानकारियों में बदलाव की प्रक्रिया को आसान बनाने के तरीकों पर भी विचार किया जा रहा है । राष्ट्रपति के अभिभाषण में भी इस बात का जिक्र किया गया था कि इस कार्य को अंजाम देने के लिए एक अधिकार प्राप्त समूह का गठन किया जाएगा और तीन वर्षों में काम पूरा कर लिया जाएगा । इसी क्रम में आगे बढ़ते हुए सरकार ने नीलेकणी को यह जिम्मा सौंपा है । प्रमुख बात यह है कि नीलेकणी को सरकार योजना आयोग में सदस्य बनाना चाहती थी परन्तु स्वयं नीलेकणी ने इसके लिए इनकार कर दिया था क्योंकि वहाँ उन्हें अपेक्षित परिणाम देने वाला काम नहीं दिख रहा था । इसके अलावा वह सेवानिवृत अफसरशाहों की श्रेणी में शामिल लोगों की जमात में भी खड़ा होना नहीं चाहते थे । अब “नेशनल अथॉरिटी फॉर यूनिक आइडेंटिफिकेशन” के चेयरमैन के तौर पर उन्हें न सिर्फ परिणाम दिखाने का मौका मिलेगा बल्कि यह उनकी विशेषज्ञता वाले क्षेत्र सूचना प्रौद्योगिकी से भी जुड़ा होगा । नंदन नीलेकणी आईटी की दुनियाँ में भारत की नाक समझी जानेवाली इंफोसिस के संस्थापकों में से हैं तथा उनकी पहचान लीक से हटकर चलनेवाले संस्था-निर्माता की है । लीक छोड़कर चलना और संस्था बनाना दोनों अलग-अलग गुण है । एक ही व्यक्‍ति में दोनों गुणों की मौजूदगी लगभग असंभव ही है परन्तु नारायणमूर्ति की छवि को खंडित किए बिना उससे अलग नीलेकणी ने पिछले कुछ वर्षों में सिद्ध किया है कि ये दोनों ही गुण अंदर प्रचुर मात्रा में मौजूद है । यूएआईए के चेयरमैन बनने के साथ ही, यह सर्वविदित हो गया कि अगले तीन वर्षों में यह संस्था के सभी नागरिकों को अद्वितीय पहचान देनेवाली है जिसके अंतर्गत वोटर‍आईटी, डाइविंग लाइसेंस और पासपोर्ट से कहीं आगे तक होगा । यह पहचान भारतीय नागरिकों को नेपाली और बांग्लादेशी आप्रवासियों और पाकिस्तानी घुसपैठियोंम को अलग करने के काम आने के साथ-साथ महत्वपूर्ण आर्थिक भूमिका भी निभाने जा रही है । इस पहचान का इस्तेमाल देश की एक-एक ईच जमीन की मिल्कियत पक्‍की करने में किया जा रहा है । गरीबी रेखा से नीचे के लोगों को राहत बाँटने, हर बच्चे को स्कूल पहुँचाने अथवा जरूरतमंद किसानों को सस्ती खाद और बीज मुहैया कराने की सरकारी कोशिशें विचौलियों को पहले से ज्यादा अमीर बनाने में ही खर्च हो जाती हैं । राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार योजना (नरेगा) के तहत दी जानेवाली रकम भी दलालों के द्वारा मजदूरों के जाली हस्ताक्षर या अंगूठा निशान मे माध्यम से अपने खातों में स्थानांतरित करवा दी जाती है । उम्मीद है कि नीलेकणी के नेतृत्व में यूएआइए का कार्ड ऐसे घपलों के लिए कोई गुंजाईश नहीं हैं छोडेगा । बैंकों एवं बीमा कंपनियों का ही नहीं बल्कि सभी प्रकार के उपभोक्ता सामान बनाने वाली कंपनियाँ भी चाहती है कि सभी संभावित ग्राहकों की पूरी पहचान उनके सामने हो । वर्त्तमान में वे पहचानपत्र हेतु फोनसेवा प्रदाता कंपनियों पर निर्भर हैं । भविष्य में अपनी इस जरूरत को पूरा करने के लिए यूएआइए पर निर्भर होंगी । निश्‍चित रूप से इससे ग्राहकों की झुंझलाहट बढ़ेगी परन्तु स्पष्ट उद्देश्य होने के कारण यह दोनों पक्षों के हित में फायदेमंद ही होगा । सबसे जनजीवन में पूर्णरूपेण सूचना प्रौद्योगिकी का हस्तक्षेप बढेगा और माउस की दो-चार क्लिक के जरिए एक अरब १० करोड़ भारतीयों में से किसी एक तक भी पहुँचा जा सकेगा । एक अनुमान के मुताबिक भारत की आईटी कंपनियों को इस विशाल योजना में डेढ़ लाख करोड़ रूपे का कारोबार और एक लाख नौकरियाँ नजर आ रही है, जो ग्लोबल मंदी के इस दौर में उनके लिए सबसे बड़ी खुशखबरी है । नीलेकणी ने कहा है कि “अगले साल यूनिक आइडेंटिफिकेशन नंबर जारी करने से संबंधित योजना वास्तव में सबके लिए सड़क-बिजली-पानी जैसा ही महत्वपूर्ण है और इसका आर्थिक विकास पर अहम असर पड़ेगा । वास्तव में अगर इस परियोजना पर सही तरीके से अमल किया गया तो यह देश के राजनीतिक हालात को बदलने की ताकत रखती है । उम्मीद की जा रही है कि अगर देश के हर नागरिक को १६ अंकों वाला यूनिक आइडेंटिफिकेशन कार्ड मिल गया तो सरकार को अपने कार्यक्रम को लागू करने और गरीबी उन्मूलन में बहुत आसानी हो जाएगी । सैद्धान्तिक रूप से इस कार्ड के बन जाने के बाद सब्सिडी और जरूरमंद तक सीधे धन हस्तांतरण की सुविधा मिल जाएगी । इस प्रक्रिया के अस्तित्व में आने के बाद लालफीताशाही से काफी हद तक छुटकारा मिल जाएगा और प्रक्रियागत खामियों से निपटने में मदद मिलेगी । सरकार का प्रस्ताव है कि इस तरह के कार्ड से देश के हर नागरिक के वित्तीय, शैक्षणिक और स्वास्थ्य संबंधी जानकारी रखी जा सकेगी । सरकार ने इस महत्वपूर्ण कार्य हेतु नीलेकणी का चुनाव कर एक सर्वोत्तम कदम उठाया है, परन्तु इस कार्य में कुछ चुनौतियाँ भी है । इस अभियान के तहत लोगं को शामिल करना और उनकी सही पहचान दर्ज करना । सर्वविदित है कि देश में पहले से पहचान संबंधी दस्तावेज मसलन राशन कार्ड, पैन कार्ड, मतदाता पहचान पत्र अथवा पासपोर्ट बनवाना साधारण प्रक्रिया है परन्तु यह काफी जटिल है । लोगों के पास एक से अधिक पैन कार्ड या मतदाता पहचान पत्र हैं । बायोमीट्रीक्स का इस्तेमाल इसके लिए मददगार साबित हो सकता है । इसके अलावे कार्ड से संबंधित शिकायतों के निपटारे में आनेवाली समस्याएं सुलझाना भी बड़ी चुनौती होगी । विगत अनुभवों के मद्‌देनजर एक और कार्ड बनवाने के लिए राजी करने में भी तमाम समस्याएँ आऐंगी । सबसे अधिक परेशानी लोगों से उनकी व्यक्‍तिगत जानकारी विशेषकर वित्तीय ब्यौरा जुटाने में आएगी । लोगों के मन में इस बात का डर समाया रहता है कि उनकी यह जानकारी सरकार के पास पहुंच जाएगी तो वे मुसीबत में पड़ सकते हैं । दुनियाँ के शायद सबसे बड़े इस प्रोजेक्ट के लिए डेटाबेस तैयार करने में आनेवाली चुनौतियाँ जगजाहिर है । इसे पारदर्शी बनाने और जालसाजी से बचाने की पूरी कोशिश जानी चाहिए जिससे कि इसे राशन कार्ड, पैन कार्ड और मतदाता पहचान पत्र की तरह इस्तेमाल किया जा सके । आय और निवास भी जगह बदलने से संबंधित आँकड़े जमा अरना और बड़ी चुनौती है । वित्तीय सुविधाओं के दायरे में पूरी आबादी को लाना और बीपीएल सूची तैयार करना भी चुनौतीपूर्ण कार्य है । उम्मीद ही नहीं विश्‍वास है कि नीलेकणी इन जिम्मेवारियों को सफलतापूर्वक अंजाम देंगे । इनकी सफलता के उपरांत केवी कामथ (आइसीआईसी आई), एस रामदोराई (टीसीएस) या दीपक पारेख (एचडीएफसी) जैसे निजी क्षेत्र के कई समर्थ या दिग्गजों के लिए विशाल सार्वजनिक उद्यमों के संचालन का रास्ता खुल जाएगा । आखिर पेशेवर दक्षता का दायरा निजी क्षेत्रों तक ही क्यों रहता है? इससे राष्ट्रीय संसाधनों की बर्बादी हो न हो किंतु यथोचित सम्मान तो हुआ ही नहीं । ये दिग्गज अपने क्षेत्र के प्रतिस्पर्धी माहौल का ज्ञान, नेतृत्व, क्षमता, निष्ठा और कार्य के प्रति प्रतिबद्धता भी अपने साथ लाते हैं जिसका सरकार में अभी तक अभाव है । यह परियोजना भ्रष्टाचार व काहिली से ग्रस्त पारंपरिक नौकशाही नहीं चला सकती । आमदनी, विवाह एवं जाति जैसी निजी संवेदनशील जानकारियाँ एक स्मार्ट कार्ड में लोड करने की नाजुक जिम्मेदारी समझौता परस्त सरकारी मशीनरी को नहीं दी जा सकती । हमारी व्यवस्था में आयकर फाइले गैंगस्तरों के हाथों में पड़ जाती है । क्रेडिट कार्ड की जानकारी विभिन्‍न कंपनियों की टेलीकॉलर्स को मिल जाती है । यूनीक आईटी कार्ड की सार्वभौमिक साख स्थापित करने के लिए नीलेकणी को व्यवस्था बनानी होंगे जो निजी सूचनाओं के अवैध इस्तेमाल को रोक सकें । परियोजना के लिए जैसी जटिल डिजाईन व टेक्नोलॉजी चाहिए, उसके लिहाज से भी विषय के ज्ञाता होने के नाते नीलेकणी बिल्कुल उपयुक्‍त है परन्तु नीलेकणी परिणाम तभी दे पाऐंगे जब सरकारी एजेंसियाँ अपेक्षित सहयोग करे चूँकि इसको राज्य सरकारों और गृह, प्रतिरक्षा व वित्त जैसे कई मंत्रालयों से मंजूरियाँ लेनी होगी, इसलिए कोई भी विभाग या मंत्रालय इस परियोजना को ढप नहीं भी तो धीमा तो अवश्य कर सकता है । ऐसा इसलिए कि नागरिकता से लेकर टैक्स, पेंशन, मताधिकार, सरकारी सहायता प्राप्त शिक्षा और खाद्य इस कार्ड पर निर्भर हो सकते है । जिसे मंत्रालयों के सहयोग की जरूरत होगी । देश में मौजूद अवैध रूप से निवास करनेवालों को छाँटकर १.२ अरब लोगों का खाका तैयार करने जैसी विराट चुनौती दुनियाँ में दूसरी नहीं है । इसकी कामयाबी नीलेकणी प्रधानमंत्री एवं सोनिया गाँधी की संयुक्‍त राजनीतिक के साथ ताकत की संयुक्‍त शक्‍ति पर निर्भर करेगी । देश के हर नागरिकों का परम कर्तव्य है कि राष्ट्रहित की इस परियोजना को अपना हरसंभव सहयोग और समर्थन प्रदान करें तथा इसके लिए व्यापक रूप से जनजागरण का अभियान अभी से ही प्रारंभ कर दें । शांति एवं विकास का मूलमंत्र “स्पिरिचुअल मैन डिजिटल सोसाईटी” की परिकल्पना इस परियोजना से अवश्य पूर्ण होगी । सरकार को चाहिए किहर विभाग, हर क्षेत्र में एक नीलेकणी की नियुक्‍ति कर उसे व्यापक अधिकार से लॉस करे । वास्तव में बदलाव की धारा तभी बहेगी । अब जनता का सरकार से प्रश्न है कि “एक नीलेकणी ही क्यों?” देश में मौजूद अव्यवस्थाओं एवं चुनौतियों से निपटने के लिए हमें कई नीलेकणी की आवश्यकता है ।

कई भागों में विभाजित है हमारा देश

हमारा देश कई भागों में विभाजित हो चुका है । हर जगह क्षेत्रवाद, भाषावाद, उग्रवाद, हिलारें मार रही है । किसी को यह समझने की फुरसत नहीं है कि भविष्य में इसका क्या असर होगा? आज अलगांववादी तथा विदेशी ताकतों ने देश के अंदर असंख्य गद्दारों एवं जयचंदों को पैदा कर दिया है । अल्पसंख्यक युवा वर्ग इनके निशाने पर हैं । इन्हें बगलाकर देश के खिलाफ इस्तेमाल करने की साजिश की जा रही है । अल्पसंख्यक एवं धर्मनिरपेक्षता पर काफी बहस हो चुकी है। देश के कई हिस्सों में अल्पसंख्यक अब बहुसंख्यक की श्रेणी में आ चुके हैं । धर्मनिरपेक्षता बनाम पंथनिरपेक्षता की जंग चल रही है । आतंकवाद से एक नया शब्द हिंदू आतंकवाद की उत्पत्ति हुई है । जो दल चुनाव में क्षेत्रीयता के खिलाफ भाषण देने का कार्य करती है उसी दल की सरकार द्वारा अखिल भारतीय भर्ती बोर्ड क्षेत्रीयता पर आधारित हो चुकी है । क्या किसी भी विभाग का अखिल भारतीय भर्ती बोर्ड जब क्षेत्रीयता पर आधारित होगी तो उसका अखिल भारतीय स्वरूप तथा देश के किसी भी नागरिक को कहीं भी रहने एवं नौकरी करने की आजादी का क्या होगा? महाराष्ट्र एवं असम में बिहारी लोगों की हत्या एवं दुर्व्यवहार इसी क्रम की एक कड़ी है । जनता की गाढी कमाई बेफिजूल एवं गैरविकास के मद में खर्च की जा रही है । उत्तरप्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती द्वारा करोड़ों अरबों की राशि मूत्तियों के अनावश्यक मद में खर्च किया जाता है । यूपी सरकार द्वारा २५ करोड़ भी राशि तो चाय-पानी के खर्च मद में किया गया तथा पीएम के बोकारो दौरे पर एक घंटे का खर्च लगभग दो करोड़ बन जाता है । सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी करनेवाले सुरेन्द्र साव ने झारखंड उच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका दायर कर सूचना का अधिकार कानून के रूप में विदेशों में जमा है तथा उसको वापस लाने के मुद्‌दे पर मात्र राजनीति ही हो रही है । आँकड़ों के बलबूते झूठी वाहवाही एवं चर्चा बटोरने वाले लाल यादव के रेल मंत्रित्व काल पर अब श्वेत पत्र लाने की ममता बनर्जी की बात पर सवालिया निशान क्यों खड़ा किया जा रहा है? साँच को आँच क्या, निष्पक्ष जाँ होने दीजिए दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा । वास्तव में चारा घोटाले जैसे कितने घोटालों की फाइलों पर धूल जम रही है । लिब्रहान आयोग के फैसले की देख लीजिए । त्वरित न्याय यदि जनता को नहीं मिल पाए तो न्याय का क्या मतलब रह जाता है? विस्थापित कश्मीरियों की वापसी पर मात्र ०.५% खर्च किया जाता है । दूसरी ओर कैग ने संसद में मार्च २००८ को समाप्त होने वाले वर्ष के लिए सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों के वित्तीय अनियमितताएँ पकड़ी है । आखिर हम किस पर विश्‍वास करें? किसको दोषी तथा किसको निर्दोष मानें? गहराई से देखे तो सतापक्ष ही नहींविपक्ष भी कम नहीं है । उसके सांसद घूस लेकर प्रश्न पूछ रहे है? अब आडवाणी जी इसे कॉरपोरेट जंग का परिणाम मानते हैं । कारण जो भी हो आखिर ऐसे हालात के लिए जिम्मेदारी कौन लेगा? कौन इन समस्याओं का समाधान हल कर पाएगा / कौन इन समाधानों को अमली जामा पहनाएगा ? विदेशी पाश्‍चात्य संस्कृति ने हमारे सांस्कृतिक मूल्यों की चूलें हिला दी है । टीवी एवं इंटरनेट की संस्कृति ने हमें पाशविक जीवन की ओर जाने का संकेत दे रही है । समलैंगिकता की आजादी एवं उसे अपराध के दायरे से बाहर रखने की माँग हो रही है । यदि लड़का-लड़का या लड़की-लड़की के जिंदगी भर साथ रहने अर्थात पति-पत्‍नी के तरह रहने की मान्यता मिल गया तो वह दिन दूर नहीं जब कुछ विक्षिप्त लोग पशुओ के साथ ठीक इसी तरह रहने की माँग कर बैठें । क्या वैसी स्थिति समाज या कानून को मान्य होगी? क्या हमारा सामाजिक ताना-बाना छिन्‍न-भिन्‍न नहीं हो जाएगा ? अफसरों एवं नेताओं की अंग्रेजी मानसिकता ने राष्ट्रभाषा हिंदी की महत्व को समझने के बजाय उसे उपेक्षित कर दिया है । शिक्षा में नैतिक शिक्षा को कोई मान्यता ही नहीं दी गई है । हम आज तक पाक समस्या का समाधान नहीं निकाल पाए हैं । हमारे राजनीतिक आकाओं में दृढ़ ईच्छाशक्‍ति का जबरदस्त अभाव है । वे नई स्थितियों के अनुकूल तथा नई तकनीकी अपनाने के बजाय पुराने परंपरा को ही ढो रहे हैं । क्या वाकई इसी से हम सर्वश्रेष्ठ बनने का मंसूबा पूरा कर पाऐंगे ? वास्तव में हमारे देश को आज एक हिटलर की जरूरत है जो सारी समस्याओं की जड़ों में समाधान रूपी भट्ठा डालकर जड़ मूल से विषमताओं एवं भ्रष्टाचार के स्त्रोतों पर अंकुश लगा सके । वाकई यह कठिन है परन्तु असंभव नहीं । व्यवस्था में सड़क इतनी हो चुकी है कि उसका ऑपरेशन ही मात्र विकल्प है । अभी तक छोटे-मोटे अलगांववादी गुट भारत के शासन पर आरोप लगाते रहे हैं तब भी भारत एक वैधानिक राष्ट्र के रूप में बरकरार रहा परन्तु अब तो हर राजनीतिक दल शासन और व्यवस्था पर प्रश्न उठा रहा है । अल्पसंख्यक एवं बहुसंख्यकवाद पर नुक्‍ताचीनी हर जगह होनी शुरू हो गई है । प्रश्न यह उठता है कि राजनीतिक दलों को ही यह व्यवस्था नाजायज लग रही है तो अलगांववादी कश्मीरी संगठनों नक्सलियोंजैसे अन्य संगठनों काक्या होगा ? हमारी गौरवशाली अतीत एवं उदार लोकतंत्र तथा सार्वजनिक तर्क के शिष्टाचार से युक्‍त समाज क्या ऐसी स्थिति में कायम रह सकता है? विभिन्‍न जाँव एजेंसियाँ अपने तमाम अनुभवों एवं सूचनाओं को सही और समय पर प्रस्तुत नहीं कर पाती है । जिससे असली, अपराधी मुक्‍त होकर पुनः नए अपराध की ओर उन्मुख हो जाता है । जिससे हम न्याय की उम्मीदें रखते हैं उससे विवाद हो जाने की स्थिति में आपसी दूरी बढ़ती जा रही है । वास्तव में हमलोग ऐसे खतरनाक मोड़ पर खड़े हैं जहाँ भेदभाव तथा अलगाववाद ने एक तरफ खाई और दूसरी तरफ कुंआ जैसी स्थिति बना दी है । समाज विभक्‍त हो चुका है । हम हमारा समाज, बनाम तुम्हारा समाज के झगड़े में अपनी ऊर्जा को खत्म कर रहे हैं । इस स्थिति से हमें उबरना होगा । इन स्थितियों को कैसे नियंत्रित की जाय? कुछ लोगोंका मत है कि कानून को अपना काम करने देना चाहिये ऐसे संस्थान बनाए जाएँ जो किसी धार्मिक भेदभाव के बिना काम कर सके, राजनीतिक दलों को चुप रहना चाहिए इत्यादि । मुश्किल यह है कि उपरोक्‍त बातें अपना अर्थ खो बैठी है । पुरानी गलतियों के दुष्परिणाम हमें आज भोगने पड़ रहे हैं । पूर्वाग्रह से ग्रस्त हमारी मानसिकता को आशा तो दिखाई ही नहीं पड़ती । समस्याओं पर चर्चा तथा समाधान प्रस्तुत करना आसान है परन्तु उसे लागू करने का साहस आज कितने लोग दिखा रहे है? संक्कट के शीर्ष में आ जाने जैसी विकट परिस्थिति का सामना केवल मानसिकता में परिवर्त्तन एवं वैचारिक क्रांति के द्वारा ही संभव हो सकेगा ।

कैसे हो आम आदमी का सशक्‍तिकरण

यह युग है शक्‍ति का, विज्ञान का, भौतिकता का, प्रगति का, प्रतिस्पर्धा का, अणु और परमाणु का, इसलिए प्रत्येक व्यक्‍ति शीघ्र शक्‍तिमान बनना चाहता है । इस होड़ में प्रत्येक राष्ट्र सम्मिलित है । व्यक्‍ति सफलताओं की सीढ़ीयाँ चढ़ते जाना चाहता है परन्तु जब वह किसी सीढ़ी पर ठहर जाता है और उसकी अपनी शक्‍ति जवाब दे जाती है तब वह किसी अदृश्य शक्‍ति से पुनः शक्‍ति संचित करना चाहता है । वह शक्‍ति उसे मिलती है उस महाशक्‍ति से जो समस्त सृष्टि को अपनी शक्‍ति से संचालित करती रहती है और वह शक्‍ति है मातृशक्‍ति । हमें मातृशक्‍ति को सुरक्षा और सम्मान के साथ-साथ शिक्षा एवं रोजगार में प्राथमिकता देनी होगी । बिना इसके भारत के आम आदमी के सशक्‍तिकरण का सपना बेकार की बात है । इसके साथ ही हमें आध्यात्मिकता की राह पर चलना पड़ेगा क्योंकि यही वही वह रास्ता है जिसके बलबूते हम शांति, स्वास्थ्य और सौहार्द्र वातावरण की कल्पना को साकार कर सकते हैं । हमें अपने प्राचीन सांस्कृतिक धरोहर यथा आयुर्वेद और योग को प्राथमिकता देना होगा । देखिए तो सही, बदलाव होता है या नही ? हर बदलाव की शुरूआत विचार से ही शुरू होती है । बीते समय को जाँचकर भविष्य की योज्ना बनाने में हमें संतुलन पूरा ध्यान रखना होगा । हम लोगों की जिज्ञासाएँ दीर्घकालीन हो गई है । आज चिंतकों ने कई एक साल आगे की योजनाओं पर आज से सोचना शुरू कर दिया है । कहावत है कि “भविष्य के बारे में सोचो और अतीत को अवश्य ध्यान रखो” मगर परेशानी शुरू तब होती है जब तक अतीत से सीख तो लेना चाहते हैं परन्तु उससे बँधना नहीं चाहते । कुछ हद तक यह ठीक भी है । वैश्विक परिवर्त्तन के इस युग में हमें यह सोचना ही चाहिए कि ऐसा क्या करें जो संपूर्ण विश्‍व को बदल दे । इतिहास गवाह है कि अगर विचार प्रबल हो तो उसको वास्तविकता के धरातल पर मूर्त्त रूप लेने में समय नही लगता । कभी-कभी हम सोचने से डरते हैं क्योंकि हमें यह तो पता हैं कि क्या नहीं हो सकता है अर्थात नकारात्मकता की शुरूआत ही हमारेविचार दृष्टि को शिथिल कर देती है । मगर यदि मान लें कि सब कुछ हो सकता है और फिर सोचे तो देखेंगे कि हम अपने उद्देश्यपूर्ति में सफल हो गए । हमें यह सोंचने की आदत डालनी होगी कि “एवरी थिंग इज पॉसिबल” अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के जीतने का मूलमंत्र था- “यस आई कैन डू” अर्थात मैं कर सकता हूँ । आज हमें सकारात्मकता को अपने विचार शैली का अंग बनाना ही पड़ेगा तभी हम संपूर्ण हो सकेंगे । जीवन में कई चीजें बदलाव चाहती है परंतु हमारी दकियानुसी सोच यह सोचने को बाध्य करती है कि यही चला आ रहा है और यह पद्धति हमें एक ही ढ़र्रे की जिंदगी जीने को मजबूर करती है जबकि बदलाव के लिए चाहिए हिम्मत सोंचने के साथ ही उस पर अमल करने की अगर हम वास्तव में बदलाव चाहते हैं तो हमें कुछ नए ढंग से सोचने का साहस करना पड़ेगा । “कौन कहता है आसमाँ में सुराग नहीं हो सकता , एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारों । ” हमारा देश बदलावों से गुजर रहा है और अर्थव्यवस्था के विकास में अहम भूमिका निभाने के लिए तैयार है । स्पर्धा में आगे रहने और भावी चुनौतियों का सामना करने के लिए शिक्षण संस्थानों को सुधार एवं अभिनव्प्रयोग करने चाहिए । उत्कृष्टता का नमूना अपनाकर कुशलता में बेहतरी और प्रभावशीलता बढ़ती है । दुर्भाग्य की बात यह है कि हमारे मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल एवं वित्तमंत्री प्रणव मुखर्जी को प्राथमिक शिक्षा पर बजट आवंटन बढाने एवं नैतिक शिक्षा को अनिवार्य पाठयक्रम के रूप में मान्यता देने का औचित्य ही समझ में नहीं आता । हमारे नीति निर्माण मैकाले की शिक्षा पद्धति एवं विदेशी सभ्यता-संस्कृति के रंग में पूर्णतः रंग चुके हैं । समलैंगिकता की मान्यता देने की चुनौती वास्तव में पाश्‍चात्य शैली की देन है । समाज एवं राष्ट्र को विघटित प्रदूषण करने की सुनियोजित षडयंत्र चल रहा है जिसका नमूना भर है यह उदाहरण । भारतीय संस्कृति में ‘जियो और जीने दो’ का सिद्धान्त सर्वोपरि माना गया है । नर की सेवा ही नारायण की सेवा है । मानव सेवा ही माधव सेवा है । उत्तरप्रदेश की मुख्यमंत्री जनता के रकम का उपयोग मूत्तियाँ लगाने में कर रही है, क्या यह न्यायोचित है? मैग्सेसे पुरस्कार विजेता एवं सामाजिक कार्यकर्त्ता अरविंद केजरीवाल कहते हैं कि “वक्‍त की जरूरत यही है कि आम आदमी के हाथ में ताकत दी जाय । टैक्स के रूप में लिए जाने वाले आम आदमी के पैसे के खर्च का अधिकार उसी के पास होने चाहिए । जब हम केंद्रीय स्तर पर नियमन यानी रेग्युलेशन्की बात करते हैं, तो दो बातें मुझे सबसे महत्वपूर्ण लगती हैं एक आज उन्हीं क्षेत्रों में नियमन हो रहा है, जहां से सरकार अपनी भूमिका को या अपने नियंत्रण को समेट रही है यानी जिन-जिन क्षेत्रों में निजीकरण हो रहा है, वहां नियामक प्राधिकरण बनाए जा रहे हैं, मसलन, टेलीकॉम क्षेत्र है या बिजली क्षेत्र है, लेकिन इसमें हमें एक बात का ध्यान रखना होगा कि उन्हीं क्षेत्रों में इस तरह के कदम उठाए जहां गरीबों पर सीधा असर नहीं पड़ता है जैसे एक गरीब आदमी के लिए टेलीफोन मूलभूत जरूरत है, लिहाजा यहां अगर निजीकरण के बाद नियमन कर दिया जाता है, तो कोई दिक्‍कत नहीं है लेकिन सरकार अगर कहे कि शिक्षा क्षेत्र का निजीकरण कर एक नियामक प्राधिकरण बना दिया जाए तो उससे मैं बिल्कुल सहमत नहीं हूं जिन क्षेत्रों से हमारी गरीब जनता सीधे तौर पर प्रभावित होती है, वहां तो सरकार का नियंत्रण ही जरूरी है । वहां हम नियामक प्राधिकरणों पर भी पूरा भरोसा नहीं कर सकते । अब यहां भी हमें इस बात का ध्यान रखना होगा कि जहां प्रतियोगिता है, वहां तो कीमतें और गुणवत्ता का निर्धारण कंपनियां प्रतियोगिता के आधार पर ही कर सकती हैं । जैसे दूरसंचार का क्षेत्र है । वहां कंपनियो के बीच प्रतियोगिता ज्यादा है, इसलिए कीमतें अपने आप कम रहती हैं और ग्राहकों को अच्छा सेवाएं उपलब्ध करवाना निजी कंपनियों की मजबूरी हो जाती है । लेकिन ध्यान देने की जरूरत वहां है, जहां इस तरह की प्रतियोगिता का अभाव है, जैसे बिजली का क्षेत्र है । इसमें चूंकि बहुत ज्यादा प्रतियोगिता नहीं है, इसलिए यहां नियमन की सबसे अधिक जरूरत है । इस तरह पहली और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि नियमन वहां हो, जहां गरीब लोगों पर इसका सीधा असर न पड़े और प्रतियोगिता की संभावना कम हो, ताकि आम आदमी के हितों की न्यायसंगत रक्षा हो सके । दूसरी महत्वपूर्ण बात जो मैं इन नियामक प्राधिकरणों के बारे में महसूस करता हूं कि ये प्राधिकरण सिर्फ सेवानिवृत नौकशाहों की आरामगाह बनकर रह गए हैं । ये लोग मुख्यमंत्रियों या केंद्रीय मंत्रियों की समितियों द्वारा नियुक्‍त कर दिए जाते हैं, यानी राजनीतिक दल अपने खास लोगों को अच्छे पद के नाम पर इनका इस्तेमाल करते हैं । इसलिए इन लोगों में न तो जरूरी तकनीकी दक्षता होती है और न ही सही दृष्टिकोण, दर‍असल सारी उम्र लालफीताशाही में काम करने के बाद इनकी सोच उसी दायरे में सिमट जाती है और उसका असर नियमन में भी नजर आता है । इस तरह इन नियामक प्राधिकरणों का भी नौकशाही के ढर्रे पर चलने वाली सरकारी संस्थाओं जैसा हाल होने का खतरा बना ही रहता है । नतीजतन वह मूल भावना ही खत्म हो जाती है, जिससे इन्हें बनाया जाना है । नियमन में एक बड़ी कमी मुझे महसूस होती है कि इसमें आम आदमी की भलाई का मकसद तो है, लेकिन उस आम आदमी की भागीदारी कहीं नहीं है । इसे मैं एक उदाहरण से समझता हूं । मैं दिल्ली से सटे गाजियाबाद (उत्तर प्रदेश) के कौशांबी में रहता हूं । वहां हम लोग ९२ लाख रूपये का आवास कर सरकार को देते हैं और सरकार का कहना है कि वह इस पैसे को हमारे क्षेत्र की भलाई के लिए खर्च करती है । लेकि हैरत की बात यह है कि यह पैसा कहां खर्च होना है, किस लिए खर्च होना है और हमारी जरूरतें क्या हैं, ये बातें हमसे पूछी ही नहीं जाती । हम एक दिन सुबह उठते हैं और देखते हैं कि हमारे इलाके में सड़क बन रही है, जबकि हो सकता हैं कि हमारी ज्यादा बड़ी जरूरत पीने का पानी हो । और जब हम अपनी असली जरूरतों के लिए सरकारी दफ्तरों में जाते हैं तो कहा जाता है कि पैसा नहीं है तो यहां नियमन क्यों नहीं हो सकता? ऐसा क्यों नहीं हो सकता कि मेरे इलाके में क्या काम होना है, इसका फैसला मैं ही करूं? अगर एक प्राधिकरण बनाया जाए जिसमें स्थानीय क्षेत्र का उचित प्रतिनिधित्व हो तो काम बेहतर होगा और नियमन का असली मकसद यानी लोगों की परेशानियों का हल भी पूरा होगा । मेरा मानना है कि असली प्रशासक आम आदमी ही होना चाहिए । यही जरिया है उसके चेहरे पर मुस्कुराहट लाने का ।

समलैंगिता के खिलाफ ज्योतिषी ने खोला मोर्चा



समलैंगिता को अपराध के दायरे से बाहर रखने के उच्च न्यायालय के फैसले पर उच्चतम न्यायालय ने अपनी हथौड़ा चला दिया है । सर्वोच्च न्यायालय ने दिल्ली उच्च न्यायालय के उस फैसले को जाँच के दायरे में ला दिया है जिसके तहत उसने समलैंगिकता को अपराध के दायरे से बाहर कर दिया था । मुख्य न्यायाधीश के. जी. बालकृष्णन एवं न्यायाधीश पी. साथशिवम की एक पीठ ने केन्द्र और नाज फाउंडेशन नामक गैर सरकारी संस्था की उस याचिका पर नोटिस जारी किया है जिसके मुताबिक देश में समलैंगिकता का वैध बनाने की माँग की जा रही थी । हालांकि सर्विच्च न्यायालय ने उस याचिका को खारिज कर दिया जो दिल्ली उच्च न्यायालय के फैसले पर रोक लगान की माँग कर रही थी । उसका कहना है कि केन्द्र और दूसरे पक्षं के विचार जाने बगैर इस पर फैसला लेना मुमकिन नहीं है । इस मामले की अगली सुनवाई २० जुलाई को होगी । सर्वविदित है कि उच्च न्यायालय के आदेश के खिलाफ ज्योतिषी एस. के. कौशल ने याचिका दायर की थी । कौशल की तरफ से एडवोकेट प्रवीण अग्रवाल ने कहा कि उच्च न्यायालय आदेश का समाज पर बुरा असर पड़ेगा । उन्होंने देश में हुए सात गे शादियों के बारे में कुछ नहीं कहा गया है । न्यायालय ने कहा कि फैसले में शादियों के बारे में कोई बात नहीं थी । सिर्फ समलैंगिकता को अपराध के दायरे से बाहर रखा था । न्यायालय ने यह भी कहा कि उच्च न्यायालय का फैसला सिर्फ भारतीय पीनल कोड की धारा ३७७ को लेकर है । यह कानून १८६० से है और कुछ गिने-चुने मामलों में ही इसका इस्तेमाल किया गया है । न्यायालय ने कहा कि पुलिस इस तरह के मामले मेंकोई शिकायत दर्ज नहीं करती है । बीते १३० से भी ज्यादा वर्षों में बच्चों के साथ दुष्कर्म को छोड़कर कुछ ही मामलों में इसका इस्तेमाल किया गया है । न्यायाधीश बालाकृष्णन के अनुसार मेरी जानकारी के मुताबिक गे मामलों में किसी को सजा नहीं हुई है । एड्वोकेट अग्रवाल ने अपनी याचिका में कहा था कि इस तरह की शादियों पर रोक लगनी चाहिए, जिस पर पीठ ने कहा ‘हमलोगों में शादी की परिभाषा नहें बदली है । परस्पर सहमति से वयस्कों के बीच समलैंगिक यौन संबंधों को दंडनीय अपराध के दायरे से बाहर करने के दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले से इस अत्यधिक संवेदनशील और विचारोत्तेजक विषय पर एक नई बहस को जन्म दे दिया था । समलैंगिक संबंधों के बारे में हाईकोर्ट की इस क्रांतिकारी व्यवस्था ने स्त्री-पुरूष के संबंधों से इतर उधर रहे वर्ग के लिए सामाजिक मान्यताओं को नए सिरे से लिखने का प्रयास किया है । हाईकोर्ट का यह फैसला अंतिम न्यायिक व्यवस्था नहीं है । यह मामला अंततः सुप्रीम कोर्ट पहुँच चुका है । वैसे तो भारतीय दंड संहिता की धारा ३७७ में अपेक्षित संशोधन होने तक दिल्ली में हाईकोर्ट के इस फैसले को एक नजीर रूप में पेश कर सकेंगा क्योंकि इतने अधिक संवेदनशील विषय पर यह पहली न्यायिक व्यवस्था है । समलैंगिकता पर दी गई इस न्यायिक व्यवस्था की विभिन्‍न धार्मिक नेताओं ने तीखी आलोचना की है । धार्मिक नेताओं का मानना है कि इस व्यवस्था से यौन स्वच्छंदता कायम होगी । कुछ धार्मिक नेता समलैंगिकता को एक तरह की मानसिक बीमारी मानकर इसके उपचार के लिए योग और ध्यान जैसे उपाय करने की हिमायत भी करते हैं । ऐसी स्थिति मेंइस विवादास्पद विषय पर अब सुप्रीम कोर्ट की सुविचारिता व्यवस्था की आवश्यकता है । हाईकोर्ट की इस व्यवस्था को लेकर नैतिकता और सामाजिक मूल्यों की दुहाई देने का सिलसिला भी शुरू हो गया है । परस्पर सहमति से समलैंगिक संबंधों को कानूनी मान्यता देने की न्यायिक व्यवस्था के बाद अब सवाल खड़ा हो गया है कि आने वाले समय में भारतवर्ष में समलैंगिक विवाह को भी क्या मान्यता मिल जाएगी? यदि ऐसाहोता है तो अनेक कानूनी समस्याएं और चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं और सरकार्तथा विधायिकाको कानूनी प्रावधानों पर नए सिरे से गौर करना पड़ सकता है । समलैंगिक संबंधों को अपराध की श्रेणी से बाहर रखने वाले संगठनों का तर्क है कि वे धारा ३७७ को समाप्त करने के पक्षधर नहीं रहे हैं । उनका यही मानना है कि विचारों में हो रहे बदलावों के मद्देनजर १५० साल्पुराने इस कानूनी प्रावधान में भी सुधार किया जाए लेकिन जबरन अप्राकृतिक यौनाचार करनेया बल यौनाचार को इस धारा के तहत दंडनीय अपराध बनाए रखना चाहिए । दूसरी ओर, समलैंगिकता को कानूनी मान्यता दिए जाने से असहमति रखने वाले वर्ग का मानना है कि चंद पश्‍चिमी देशों की तरह भारत में इसका अनुसरण करना उचित नहीं है। एक अनुमान के अनुसार भारत में इस समय समलैगिक संबंध रखने वालों की संख्या करीब २५ लाख है । कानून के जानकार महसूस करते हैं कि समाज के इस प्रवृत्ति वाले लोगों के हितों की रक्षा करना परम आवश्यक है । हाईकोर्ट ने इस वर्ग के समता के अधिकारों की ही रक्षा की है जिसकी वजह से अब पुलिस अनावश्यक रूप से उन्हें हैरान और परेशान नहीं कर सकेगी । बहरहाल, इस मुद्दे पर अच्छी-खासी बहस छिड़ चुकी हैं । कई पहलुओं पर विचार जरूरीसमलैंगिक होना एक मनोवैज्ञानिक विकृति है या सहज जैविक स्थिति, इस बहस ने पश्‍चिमी समाजों मेंपिछले कुछ दशकों में जोर पकड़ा है । संसार का कोई भी समाज समलैंगिक प्रवृत्तियों से मुक्‍त नहीं है, लेकिन संतानोत्पनि से कोई संबंध न होने के कारण इसे प्राकृतिक मानने के बजाय हर जगह एक तरह की विकृति के तौर पर ही देखा जाता रहा है । भारत में अंग्रेजी कानून से पहले इसे आपराधिक कृत्य भले न माना जाता रहा हो लेकिन अनैतिक जो इसे समझा ही जाता था । दर‍असल, समलैंगिक यौन व्यवहार काफी बड़े दायरे की चीज है, जिसमें यह तय करना कठिन है कि कौन लोग इसमें अपनी जैविक मजबूरियों के कारण शामिल है और कौन शौकिया तौर पर या किसी मजबूरी में इसमें शामिल हो गए हैं । ज्यादातर समलैंगिकों के अतीत में झांकने पर पता चलता है कि बचपन में वे किसी यौन दुष्कर्म के शिकार हुए थे और फिर उनके लिए सामान्य यौन व्यवहार के दायरे में आना कठिन होता चला गया । इसी तरह समलैंगिक व्यवहार से जुड़े कई लोगों का दखल विपरीत लिंगी यौन व्यवहार में भी बराबर का ही होता है । इससे एक खतरनाक स्थिति बनती है, जहां समलैंगिकता को अपराध के दायरे से बाहर करते ही अपराधों का एक बड़ा दायरा खुल जाता है । दो वयस्क लोग यदि परस्पर सुविचारित सहमति से आपस में यौन संबंध बनाते हैं तो इसके लिए उन्हें अपराधी करार देना एक नजर में न्याय शास्त्र की कसौटी पर खरा उतरता नहीं मालूम पड़ता । लेकिन अगर सहमति को ही एकमात्र आधार माना जाए तो दुनिया के सारे आपराधिक कानूनों के दायरे से सबसे पहले परस्त्रीगमन या एडल्टरी को बाहर किया जाना चाहिए । ऐसा नहीं किया जाता तो इसका कारण यही है कि समाज का एक न्यूनतम ढआंचा बनाए रखने के लिए यौन संबंधों के मामले में केवल दो व्यक्‍तियों की आपसी सहमति ही काफी नहीं है । आपराधिक कानून में समलैंगिकता के लिए जगह तय करते वक्‍त सिर्फ डाई हार्ड समलैंगिकों को मजबूतियों का ही नहीं, समाज पर पड़ने वाले इसके असर का भी आकलन किया जाना चाहिए ताकि यह समाज में यौन विकृतियां बढ़ाने का बहाना न बन जाए । राजनीतिक दलों के लिए विकट स्थितिसमलैंगिकता कोअपराध बताए जाने वाली आईपीसी की धारा ३७७ को खत्म करने का फैसला लेना केंद्र सरकार के लिए आसान नहीं है । उदार विचारों के माने जाने वाले केंद्रीय कानऊन मंत्री वीरप्पा मोइली ने कहा है कि सरकार जल्दबाजी में नही है । स्वास्थ्य मंत्री गुलाम नबी आजाद ने कहा कि इस मामले पर में चर्चा होना चाहिए । अदालत में इस धारा के अंतर्गत गिरफ्तार लोगों ने अपनी गिरफ्तारी को चुनौती देते हुए याचिकाएं दाखिल कर रखी है । पिछली बार इस मामले में तत्कालीन केंद्रीय गृह मंत्री शिवराज पाटिल और स्वास्थ्य मंत्री ए. रामदास के विचार अलग-अलग थे । पुआने खयालात के पाटिल ३७७ हटाए जाने के विरोधी थे, जबकि रामोदास इस धारा को आउटडेटेड मानते थे । अब प्रधानमंत्री ने संबंधित मंत्रालयों से कहा है कि वे इस मामले में आमराय बनाकर अदालत को मांगी हुई जानकारी उपलब्ध करवाएं । राजनीतिक दल इस विवादास्पद मुद्दे पर बहुत सावधानी बरत रहे हैं । सत्ताधारी कांग्रेस और मुख्य विपक्षी दल बीजेपी के नेता समलैंगिकता के सवाल पर अपनी राय जाहिर करने से बचना चाह रहे हैं । कांग्रेस के प्रवक्‍ता डॉ. शकील अहमद ने कहा कि इस मामले में पार्टी की कोई राय नहीं है । उन्होंने गेंद सरकार के पाले में डालते हुए कहा कि फैसला सरकार को ही करना है । डॉ. शकील ने कहा कि सरकार की तरफ से कहा जा चुका वह समाज के विभिन्‍न वर्गो और धार्मिक नेताओं से बात करके इस मामले में कोई फैसला लेंगे । एक वरिष्ठ कांग्रेसी नेता ने कहा कि हमें वोट तो दोनों के चाहिए । मगर समाज का बड़ा हिस्सा और भारत के सभी प्रमुख धर्मों के नेता इसे अनैतिक बताते हुए ३७७ को बनाए रखने के पक्ष में माहौल बनाने में लग गए हैं । जो भी नेता इस मुंह खोलेगा उसे मुश्किल हालात का सामना करना पड़ेगा । इस विषय पर बात करते हुए हर नेता ने कहा कि प्लीज उसकी पहचान छिपाई जाए । हाल ही मेंलोकसभा जीतकर आए एक सांसद ने कहा कि अगर हम समलैंगिकता को कानूनी दर्जा देने की बात कहते हैं तो देहांत में लोग हमें मारेंगे । गांवों में जबर्दस्त सेंस ऑफ ह्यमर (हास्य बोध) होताहै । वहां हम पर ऐसे-ऐसे कटाक्ष किए जाएंगे कि आप सोच नहीं सकते । गां के लोग हंसकर कहेंगे कि भाई साहब आप भी? और अगर हम ३७७ को बनाए को बनाए रखने की बात कहते हैं तो यहां शहरों में लोग हमे दकियानूसी कहेंगे । केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री गुलाम नबी आजाद ने कहा कि धारा ३७७ को खत्म करने का मुद्दा सिर्फ कानून या स्वास्थ्य से जुड़ा हुआ ही है, बल्कि हमारी संस्कृति से भी जुड़ा हुआ है । ऐसे में इस पर सड़क से लेकर संसद तक बहस होनी चाहिए । इसके सभी सकारात्मक और नकारात्मक पहलुओं पर चर्चा के बाद ही कोई फैसला लिया जा सकता है । कॉन्फ्रेंस के दौरान उस समय पूरा हॉल हंसी से गूंज उठा जब आजाद से यह पूछा गया कि समलैंगिकता पर उनकी अपनी क्या राय है, उन्होंने हल्के फुल्के अंदाज में कहा कि मैं समलैंगिक नहीं हूं । मोइली अपने बयान से पलटेकानून मंत्री वीरप्पा मोइले ने आईपीसी की धारा ३७७ पर अपने पिछले बयान से पलट गए हैं । पहले उन्होंने कहा था कि सरकार समलैंगिकता को प्रतिबंधित करने वाले कानूनों में सुधार लाने के बारे में सोच रही है । अब उनका कहना है कि मेरे बयान का गलत मतलब निकाला गया । यह पूछे जाने पर कि क्या उन्होंने जल्दबाजी में बयान दे दिया, मोइली का कहना था, मैंने आईपीसी की कुछ धाराओं में सुधार की बात कही थी । देवबंद भी समलैंगिकता के खिलाफइस्लामिक शिक्षण संस्था दारूलुलूम देवबंद ने केंद्र द्वारा धारा ३७७ के तहत समलैंगिकता पर लगी रोक को हटाने के प्रस्ताव का कड़ा विरोध किया है । दारूल उलूम का कहना है कि अप्राकृतिक सेक्स इस्लाम सिद्धांत के खिलाफ है । दारूल उलूम देवबंद के डिप्टी वाइस चांसलर मौलाना अब्दुल खालिक मद्रासी ने कहा, समलैंगिकता शरीयत कानून के तहत अपराध है और इस्लाम में इसे हराम माना जाता है । मद्रासी ने केंद्र से आईपीसी की धारा ३७७ न हटाने कोकहा है । इसके तहत समलैंगिकता को आपराधिक दर्जा दिया गया है । दारूल उलूम का यह ऐतराज केंद्रीय कानून मंत्री वीरप्पा मोइली के उस बयान के बाद आया है जिसमें उन्होंने कहा था आईपीसी की धारा ३०७ को खत्म करने का फैसला समाज के सभी वर्गों के विचार जानने के बाद लिया जाएगा । इनमें चर्च जैसे धार्मिक ग्रुप भी शामिल होंगे । ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के अध्यक्ष मौलाना सालिम कासमी ने भी समलैंगिक संबंधों को अपराध करार देते, हुए कहा, समलैंगिकता इस्लामिक कानून और आईपीसी की धारा ३७७ के तहत दंडनीय है । इसके साथ छेड़छाड़ नहीं की जानी । बोर्ड के एक और सदस्य मौलाना मोहम्मद सूफियान कासमी और उत्तर प्रदेश इमाम संगठन के प्रेजिडेंट मुफ्ती जुल्फिकार ने भी इसी तरह की बातें कही । कासमी का कहना था कि समलैंगिकता को कानूनी घोषित करने से समाज को नुकसान हो सकता है ।

पंचायतों के मध्ययुगीन क्रूर फैसले

महात्मा गाँधी पंचायती राज के प्रबल समर्थक थे परन्तु उन्होंने सपने में भी इसके विद्रूप चेहरे की कल्पना न की होगी । पंचायती राज व्यवस्था स्व० राजीव गाँधी का भी सपना था । कुछ राज्यों में यह व्यवस्था लागू भी है परन्तु पंचायतों के कुछ फैसलों से मानवीय संवेदना तार-तार हो चुकी है । इन फैसलों ने पंचायतों के अधिकार की पुनसमीक्षा की आवश्यकता पैदा कर दी है । पहला पश्‍चिमी उत्तरप्रदेश के देवबन्द के फुलास गाँव की दूसरी अयोध्या फैजाबाद की है । विगत १४ जून को फुलास के आसपास आठ गाँवों की पंचायत बुलायी गई थी । पंचायत में चर्चा के बाद फैसलाहुआ गाँव की कोई भी महिला अकेले गाँव से बाहर कदम नहीं रखेगी । महिला के साथ उसके परिवार का कोई न कोई मर्द होना जरूरी है । फरमान पर लागू करवाने के लिए बजाप्रा कमेटियों का गठन किया गया था । दूसरी घटना ११ साल की कमला को बिरादरी की पंचायत के फरमान पर गिरवी रखा गया, जहाँ चार महीने तक गिरवी रखनेवाले पुरूषों ने उसके साथ सामूहिक बलात्कार किया । विरोध करने पर उसकी पिटाई भी होती रही । कमला के भाई द्वारा गाँव की एक लड़की से किया गया प्यार और दोनों का गाँव छोड़कर भाग जाना ही सजा की मुख्य वजह थी । पंचायतों के ये दोनों फैसले मध्ययुगीन सोंच पर आधारित है परन्तु प्रश्न यह है कि ऐसे गैरकानूनी पंचायतों और पंचजनो को अधिकार और शक्‍ति कहाँ से प्राप्त हो रही है? यदि गाँव में कुछ लोगों द्वारा भी विरोध किया जाता तो ऐसी पंचायतों का आयोजन सफल हो पाता ? इन गाँवों और उनके समाज में महिलाओं के लिए बराबरी का हक अभी दूर की बात है । महिलाओं की संगठित ताकत अभी आकार ग्रहण नहीं कर पाती है । सरकार और प्रशासन को इससे कोई मतलब नहीं है कि किस तबके का अधिकार कुचला जा रहा है । समुदाय पंचायतों का काला इतिहास हमारे समाज में बहुत पुराना है और न सिर्फ हमारे देश में बल्कि आसपास के देशों मेंभी वह उतना ही बुरा, क्रूर और पिछड़ा है । ऐसी पंचायतों प्रेमियों को के साथ अमानुषिक व्यवहार करती है । पेड़ से लटका देना, पीट-पीट कर मार डालना और बलात्कार ही, परिणामस्वरूप इन प्रेमियों को नसीब होता है । अंतर्जातीय विवाह को कानूनी मान्यता के बावजूद पंचायते अभी भी दकिया नूसी सोंच से ग्रस्त है और इन कानून को मान्यता नहीं देता है । पाकिस्तान की मुख्तारन माई का किस्सा तो काफी चर्चित हो चुका है जिसका सामूहिक बलात्कार जाति पंचायत के आदेश पर हुआ था । पुरूष प्रधान समाज में महिलाएँ आज भी पंचायतों के उलजुलूल फैसलों को मानने की अभिशप्त है । उनके पैरों में अदृश्य बेडियाँ जकड़ी है । जाति विशेष एवं असामाजिक तत्वों को बढ़ावा देने में पंचायतों की प्रमुख भूमिका से लगता है कि खाप पंचायतों को गैरकानूनी घोषित कर दिया जाय जिनमें व्यक्‍ति के अधिकार स्त्रियों एवं दलितों की अस्मिता का कोई सम्मान नहीं है । बिहार के मिथिला क्षेत्र में अमेरिका देवी, तिलिया देवी ने पंचायतों के फैसलों की परवाह किए बिना पुरूष प्रधान समाज से जमकर टक्‍कर लिया और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई है । हरियाणा में तो महिलाओं ने नशे के खिलाफ बिगुल फूँक दिया है और वहाँ अवैध दारू भट्‌टिओं को तहस-नहस कर दिया है । महिलाओं एवं युवाओं को अपने हक की रक्षा हेतु एकजुट होकर पंचायतों के गैरकानूनी फैसलों के खिलाफ विद्रोह करने के साथ मीडीया एवं सरकार तक पहुँचाने का कार्य करना होगा । तभी इन पंचायतों पर अंकुश लग सकेगी तथा मानवाधिकार सुरक्षित रहेगा और न्याय मिल पाएगा । वैश्‍वीकरण के इस युग में जमाना कहाँ से कहाँ चला गया किन्तु आज भी अशिक्षा एवं रूढ़िवादी परंपराओं के चलते गाँवों में विकास का प्रतिशत नहीं बढ़ पाया है । तथा दूसरों के मामले में ताक-झाँक की परंपरा प्रभावी है इसलिए वहाँ का वातावरण ही नहीं पनप रहा है । बदलते परिवेश और जानकारी के अभाव के कारण ग्रामीण समाज अभी भी अंधे युग में पुरानी सोंच में ही जी रहा है । वास्तव में बदलाव की आँधी तो हमें गाँवों में पैदा करनी चाहिए । चलंत न्याय व्यवस्था तथा पुलिस पब्लिक संवाद के जरिए इन स्थितियों पर काफी हद तक काबू पाया जा सकता है । अकेले पढ़ने, नौकरी करने, घूमने की आजादी अगर हमेंअभी भी प्राप्त नहीं है तथा इन तथाकथित पंचायतों के मुखियाओं की कृपा से हमें आजादी नहीं मिल पाय तो हम कहाँ से स्वाधीन हो गए ?

डिजिटल सोसाईटी की दिशा में बढ़ा एक स्वागतयोग्य कदम

कहते हैं कि साधना और साधन मिले तो वह चीज आसान हो जाती है । भारत के कानून मंत्री वीरप्पा मोइली कहते हैं कि न्यायपालिका में पारदर्शिता और उत्तरदायित्व तय हो । इसके लिए एक तंत्र का बनाया जाना बेहद जरूरी है । प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह न्याय, पारदर्शिता और आदान-प्रदान के मंत्र को अपने कार्यशैली के रूप में आत्मसात करना चाहते हैं । वे चाहते हैं कि संस्थात्मक व्यवस्थाओं के साथ-साथ प्रबंधन एवं तकनीकी श्रेत्र में भी आपसी आदान-प्रदान हो । राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने भी जन-प्रशासनिक सुधार को चन्हित किया है । प्रधानमंत्री ने कैबिनेट की स्वीकृति के लिए प्रस्ताव भेज दिए हैं जिसमें वे सामाजिक, भौगोलिक न्याय को कैसे प्राप्त करेंगे । उन्होंने यह भी कहा है कि योजनाओं से प्रभावित सहभागिता की बुद्धि को कैसे देख सके यह व्यवस्था होनी चाहिए । वे सामाजिक अंकेक्षण तक में भी पूरी पारदर्शिता चाहते हैं जिससे केन्द्र की योजना की पूरी राशि लाभुकों तक पहुँचे । गृह मंत्रालय द्वारा दिल्ली पुलिस को हाइटेक करने की योजना बनाई जा रही है, लेकिन आज भी दिल्ली पुलिस के कांस्टेबल को अपने इलाके में चोरों व अपराधियों का पीछा करने के लिए एक साइकिल दी जाती है । यह व्यवस्था खुद अपने आप में एक प्रश्न है कि आज के समय में अपराधी अपराध करते समय १०० से २५० सीसी तक की मोटरसाइकिल का प्रयोग करते हैं । ऐसे में मानव ऊर्जा से चलनेवाली यह साइकिल कहाँ तक कामयाब हो पाएगी? आज भी अंग्रेजों के जमाने वाली सुविधाएँ ही मुहैया करवाई जा रही है । ऐसी परिस्थिति में पुलिस महकमा अपने पुलिसकर्मियों से सौ फीसदी सत्यता की उम्मीद कैसे कर सकता है? दूसरी ओर समाजवादी विचारधारा वाले नेतागण केवल आदिम जमाने की बाते करते हैं जबकि औद्योगिक घरानों की एक परिकल्पना से दीन-हीन का सपना भी हकीकत बन जाता है । जिस बाजार ने आम रिक्शेवाले के हाथ में मोबाईल थमाया था, उसी ने अब पंक्चर लगानेवालों को चमचमाती कार की चाबी सौंपकर दी है । नैनो की लॉटरी खुलने से न जाने कितने साधारण लोगों की आबरू बढ़ गई है । फरीदाबाद के चंद्रभान गुप्ता जो साईकिल मे पंक्चर लगाने का कार्य करते हैं । जैसे लोगों का सपना हकीकत में बदल चुका है । ध्यान देने योग्य बात यह है कि सपना केवल साधारण लोगों का ही पूरा नहीं हुआ बल्कि भारतीय उद्योगजगत की एक बहुप्रतिष्ठित हस्ती का भी पूरा हुआ है । रतन टाटा ने स्कूटर पर सफर करते एक परिवार को बारिश में भीगते देखने के बाद यह सपना बुना था । अब उनका सपना लाखों सपनों की आधारशिला बन गई है । अतीत के आईने में कई उद्योगपतियों का चेहरा देख सकते हैं जिन्होंने यह सिद्ध किया है कि पूँजीपति भी राष्ट्रनायक और स्वप्नदर्शी हो सकते हैं । सर्वाधिक बहुमत के साथ सत्ता में आनेवाले युवा प्रधानमंत्री स्व० राजीव गाँधी ने साहसिक निर्णय लेकर सी-डॉट और फिर राष्ट्रीय टेक्नॉलजी मिशन के प्रमुख के रूप में सैम पित्रोदा की नियुक्‍ति की थी । सौ से भी अधिक तकनीकी पेटेंट धारी सैम अमेरिका में अपना जमा-जमाया उद्यम छोड़कर स्व० राजीव गाँधी के आग्रह पर देश लौट आए थे । आज देश में आई दूरसंचार क्रांति की नींव रखनेवालों में उनका नाम लिया जाता है । उन्होंने पिछड़ेपन और यथास्थितिवाद में सुकून तलाशने वाली आम भारतीय मनःस्थिति को बदलने में योगदान दिया तथा यकीन दिलाया कि सूचना प्रौद्योगिकी तथा दूरसंचार जैसी तकनीकी परिघटनाएँ सिर्फ पश्‍चिमी विश्‍व के लिए ही नहीं है बल्कि उनमे हमारी भी कोई न कोई भूमिका है । राष्ट्रीय पहचानपत्र प्राधिकरण के प्रमुख के रूप में नंदन नीलेकणी की नियुक्‍ति बदलते हुए भारत के संदर्भ में कई महत्वपूर्ण संकेत देती है । इंफोसिस के सह-संस्थापक और सह-मालिक के रूप में वे दसियों हजार करोड़ रूपए के वित्तीय साम्राज्य के अभिभावक की श्रेणी में थे । वहाँ वे बेहद सुरक्षित एवं पेशेवर माहौल में अपने दृष्टिकोण और योजनाओं पर अमल करवाना उनके लिए अपेक्षाकृत आसान था परन्तु उन सबको त्यागकर सरकारी दायित्व को स्वीकार किया । क्या यह छोटी सी बात है? आज कितने ऐसे लोग हैं जो राष्ट्र को सर्वोपरि मानकर अपना भविष्य न्यौछावर करने को तैयार रहते है? हालांकि वे जानते हैं कि सरकारी भवनों की चारदीवारी के भीतरी जंग लगी मानसिकता वाले अधिकारियों की फौज से उनका सामना होगा लेकिन उस चुनौती से निपटने के लिए वे तैयार हैं । ऐसे स्वप्नदर्शी एवं प्रेरक व्यक्‍तित्व निम्नलिखित पंक्‍तियों की लीक पर कार्य करते है ः- “भँवर से लड़ों, तुम लहरों से उलझो कहाँ तक चलोगे तुम किनारे-किनारे । ” शुरूआती दौर में सैम पित्रोदा को अंग्रेजी मानसिकता और हवा-हवाई अफसर कहकर काफी लोगों ने मजाक उड़ाया था परन्तु यह भी एक धुव सत्य है कि एसटीडी क्रांति के माध्यम से टेलीफोन को देश के कोने-कोने तक पहुँचाने वाले पित्रोदा ने महीनों तक छोटे-छोटे गाँवों का दौरा कर जमीनी हकीकत को समझा था । वैसे उनके मन में कई बार यह प्रश्न अवश्य कौंधा होगा कि जो लोग अपने रोटियों के लिए ही संघर्ष कर रहा है उन्हें टेलीफोन की क्या आवश्यकता है, परंतु कहीं न कहीं उनके दिल में यह भावना भी पैढ कर गई थी कि शिक्षा, विज्ञान और तकनीक के आपसी सामंजस्य से रोटी की समस्या भी हल हो सकती है । आज यदि यह प्रश्न उठे कि “क्या भारत में कोई ऐसा विभाग, कार्यक्रम या परियोजना ऐसी है जो देश के हर व्यक्‍ति से जुड़ा हो, तो निश्‍चित रूप से नंदन नीलेकणी जैसे शख्सियत का नाम उभर कर सामने आएगा । एक ऐसी परियोजना जिससे आमूलचूल परिवर्त्तन होगा जो स्वयं अपने आप में संयुक्‍त रूप से अबलंबित है । भारत के हर व्यक्‍ति को एक अद्वितीय आंकिक पहचान दे जाएगी जिसका इस्तेमाल न केवल स्थायी पहचानपत्र बल्कि विभिन्‍न परियोजनाओं के सटीक क्रियान्वयन, राष्ट्रीय सुरक्षा संबंधी आवश्यकताओं को पूरा करने और ढेर सारे पहचान पत्रों की जरूरत खत्म करने में भी किया जाएगा । आजादी के बाद प्रथम बार ऐसे बहुउद्देश्यीय कार्य योजना का क्रियान्वयन संपादित हो रहा है जिसकी सबों को प्रतीक्षा थी । आखिर मतदाता परिचय पत्र से लेकर राशन कार्ड तक, पैन कार्ड से लेकर पासपोर्ट तक और ड्राइविंग लाइसेंस से लेकर शिक्षा के प्रमाणपत्रों तक न जाने कितने दस्तावेजों का प्रयोग हम अपनी पहचान सिद्ध करने के लिए कर रहे है । उसके बाद भी सारी प्रक्रिया में जालसाजी, धोखाधड़ी, भ्रष्टाचार, अनियमितता के साथ-साथ मानवीय व मशीनी त्रुटियाँ आज भी देखने को मिल रहे हैं । समय की माँग है कि ऑल इन वन तथा आसान प्रक्रिया अपनाई जाए जो जनोपयोगी होने के साथ-साथ त्वरित भी हो । हर कार्य के लिए सिर्फ एक पहचान पत्र के होने से, संबंधित समस्याओं और अपराधों का ग्राफ निश्‍चित रूप से कम कर देगा । अब सरकार के पास देश के हर व्यक्‍ति का डिजिटल रिकॉर्ड होगा जिसमें लगभग १५ सूचनाएँ मौजूद होगी । अमेरिका के साथ-साथ विदेशों में कई जगह इस प्रकार की आइडेंटिटी विभिन्‍न रूपों में मौजूद है । दुःख की बात यह है कि हम विदेशों से अच्छी चीजों का अनुकरण नहीं कर पाते बल्कि बेकार और कुप्रभावी चीजों का नकल करने में आगे रहते है । आखिर स्वाधीनता प्राप्ति के अब तक हमारी सरकार ने इस तरह की महत्वाकांक्षी योजना की परिकल्पना क्यों नहीं की थी? हमारे नीतिनिर्माता कहाँ सोए थे? क्या उनकी सोंच में नई परिकल्पनाएँ तो दूर औरों के परिकल्पनाओं से सीख लेने की दृष्टि का भी अभाव है? बहुउद्देश्यीय पहचान पत्र का प्रयोग बैंक खाता खोलने से लेकर मोबाईल फोन लेने तक और कर्ज लेने से लेकर पासपोर्ट बनवाने तक में किया जाएगा । इससे सेवा लेने वाले और देने वाले दोनों ही लाभान्वित हो सकेंगे और इसके साथ ही अपराधियों एवं भ्रष्ट तत्वों पर अंकुश लग सकेगा । परन्तु क्या यह आसान कार्य है? कई दशकों के बाद भी हम अपने तमाम नागरिकों को पहचानपत्र नहीं दे पाए हैं । वहीं जो नागरिक नहीं हैं उन्होंने पहचानपत्र बनवाने में सफलता प्राप्त कर ली है । त्रुटीहीन पैन कार्ड देने में, हम नाकाम ही सिद्ध हुए हैं । राष्ट्रीय निलेकणी के पदभार ग्रहण करने से पूर्व पहचान पत्र परियोजना ने अपने छः साल के कार्यकाल में मात्र ३१ लाख पहचानपत्र बनाए हैं । अगले तीन साल में उसका तीन सौ गुनाकाम किया जाना संभव नहीं दिखता, परन्तु नवीनतम तकनीक से यह असंभव भी नहीं है । सवाल यह उठता है कि सरकार की ओर से नंदन नीलेकणी की टीम चुनने की आजादी और मनचाहे ढंग से कार्य करने की माँग पूरी की जा सकेगी क्योंकि हमारा पुराना अनुभव बड़ा ही कटु रहा है । आईटी शक्‍ति में इतनी ताकत है कि सुनियोजित योजना को समय के अंतराल में ही पूरा कर दे यह सब कुछ विधिवत प्रशिक्षण से संभव है । डेढ लाख करोड़ के खर्चवाली परियोजना को मात्र तीन वर्षों में पूरा करने की जिम्मेवारी वही व्यक्‍ति ले सकता है जो सूचना प्रौद्येगिकी का बादशाह होने के साथ-साथ प्रबंधन में भी माहिर हो एवं इस सबके अतिरिक्‍त उनमें राष्ट्रीय फर्ज पूरा करने की प्रतिबद्धता भी हो । शायद नंदन नीलेकणी के रूप में सरकार की तलाश पूरी हो चुकी है । राष्ट्रीय उद्देश्यों के प्रति समर्पण अन्य प्रतिशाली औद्योगिक नेताओं को भी प्रेरणा दे सकता है । राशि थरूर के बाद नंदन नीलकेणी संप्रग सरकार के नवरत्‍न कहे जा सकते हैं, जो हमारे लिए गौरव की बात है । अतीत में पूर्व राष्ट्रपति डॉ० ए० पी० जे० अब्दुल कलाम, डॉ० राजा रमन्‍ना एम. एस. स्वामीनाथन, सैम पित्रोदा आदि भी राष्ट्र के नीति निर्माताओं की करात में अग्रणी रहे हैं । प्रो० यशपाल, ड~० कुरियन, टी० एन. शोषन, वाई० के० अलघ, मोंटेक सिंह अहलुवालिया आदि ने भी उपरिक्‍त श्रेणी में आने के लिए जी-तोड़ मेहनत की है । आज इन जैसे महान हस्तियों पर गर्व करने से काम नहीं चलेगा बल्कि हम सभी नागरिकों कापुनीत कर्तव्य है कि राष्ट्रीय उत्तरदायित्व की भावना का कद्र करेंं तथा राष्ट्रनिर्माण में अपनी भूमिका निर्धारित करें । एक सर्वे रिपोर्ट के मुताबिक एशिया प्रशांत के अधिकांश कर्मचारी मानते हैं कि नए तकनीकी उपकरणों जैसे स्मार्टफोन और लैपटॉप से उनके कार्य करने की क्षमता में बढ़ोत्तरी हुई है । कर्मचारियों से संबंधित सॉल्यूशंस मुहैया करानेवाली वैश्‍विक फर्म केली सर्विसेज की सर्वे रिपोर्ट के अनुसार ६२ फीसदी कर्मचारियों ने कहा कि उनकी काम करने की क्षमता (प्रोडक्टिविटी) में लैपटॉप आदि तकनीकी उपकरणों से काफी ज्यादा बढ़ोत्तरी हुई है । वही २४ प्रतिशत का मानना है कि इन उपकरणों की मदद से उनकी कार्यक्षमता में मामूली बढोत्तरी हुई है । वास्तव में “स्पिरिचुअल मैन डिजिटल सोसाइटी” स्लोगन का आशय यही है कि समय की माँग के अनुसार विकसित होने हेतु सभी क्षेत्रों, सभी विभागों को डिजिटल की जाने की व्यवस्था हो जिससे समाज पूर्णतः डिजिटल सोसाइटी के रूप में परिवर्त्तित हो जाय । संभावित खतरों से निबटने के लिए भारतीय संस्कृति का मूलधार आध्यात्मिकता का निर्वहन तो अपनाना ही पड़ेगा जिससे शांति सौहार्द्र बनी रहे ।

प्रगति मैदान के प्रगति की गाथा


एक बार फ़िर से प्रगति मैदान में ऎसी चीज प्रस्तुत की जा रही है जो पूरे एशिया महाद्वीप भर के किसी भी अन्य प्रदर्शनी क्षेत्र में नहीं की जा सकती । भारत अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार मेला ( आई आई टी एफ़ ) की गणना भारत में आयोजित होने वाले अन्तर्राष्ट्रीय स्तर के गिने-चुने व्यापार मेलों में की जाती है । यह मेला विश्‍व के सामने भारत की अनेकता में एकता विशेषता की झांकी प्रस्तुत करता है- यह विश्‍व में आर्थिक महाशक्ति के रूप में ही नहीं उभर रहा है अपितु अत्यन्त सुसंस्कृत, सहशील, शान्ति प्रिय एवं सार्वभौ‍मिक देश है । भारतीय अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार मेले का आयोजन इण्डिया ट्रेड प्रमोशन आर्गनाइजेशन ( आई टी पी ओ ) द्वारा १४ से २७ नवम्बर २००९ तक प्रगति मैदान में किया जाएगा । यह मेला बड़ी तीव्र गति से बदलते नये भारत की भव्य झांकी है । यह एक ऎसे भारत की तस्वीर है जो बहुत आश्‍वस्त है तथा बड़े गौरव एवं महत्वाकांक्षा के साथ तेजी से प्रगति कर रहा है । विश्‍व शान्ति एवं अहिंसा के बारे में गांधी दर्शन के सच्चे अनुयायी- भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू के जन्म दिवस से शुरू हो रहा ये मेला एक माननीय और सजग समाज के अन्तर्गत अपने पडोसी राष्ट्रों के लिए भी प्रगतिशील एवं दीर्घकालिक सामाजिक- आर्थिक विकास का सुनिश्‍चित करने वाले सिद्घान्त के अनुपालनार्थ भारत की बचनबद्घता की दृढ़ अभिव्यक्ति है । इस मेले की थीम - का यथोचित रूप में प्रदर्शन थीम मण्डपों के अलावा राज्यों एवं केन्द्ग शासित प्रदेशों के मण्डपों में भी किया जाता है । इस बर के २९ वें मेले का थीम "सेवाओं का निर्यात" है। यह मेला विभिन्न देशों के लिए अन्तरक्षेत्रीय व्यापार एवं वाणिज्यिक सहयोग पूर्ण सम्बन्ध बनाने के उदेश्य से और भी महत्वपूर्ण हो गया है। हर वर्ष इस मेले में एक प्रदेश को ‘ साझेदार राज्य’ तथा एक अन्य के ‘फ़ोकस राज्य’ का दर्जा मिला है। यूनियन फ़ोयर्स डी- इण्टरनेशनले डी पेरिस ( यू.एफ़ ) आई. द्घारा अनुमोदित यह मेला नयी और अत्यधिक तीव्र गति से विकसित हो रहे विदेशी बाजार में पांव जमाने के इच्छुक भारत के उद्योगों के लिए स्प्रिंग बोर्ड का काम करता है । राजनेता, निर्णायक, प्रौद्योगिकीविद और व्यापारी वर्ग जानकारी प्राप्त करने तथा सम्पर्क बढाने और बाजार में पैठ बनाने के प्रयोजन से आई आई टी एफ़ को एक अद्घितीय मौके के रूप में मानते हैं ।यह मेला पिछले अठाईस वर्षो से लेकर अब तक लगातार आयोजित होता ही नहीं आया है अपितु अपने ग्राहकों एवं भागीदारों- प्रदर्शकों की मौलिक आवश्यकताओं एवं हितों को प्रतिबिम्बित करने वाली सुस्पष्ट रणनीति के साथ एक प्रगतिशील एवं नवीनतापरक कार्यक्रम के रूप में विकसित हो चुका है । इस तरह से मेला सामान्यतः व्यापारिक ट्रेण्डों का मापक ( बैरोमीटर ) अथवा उद्योगों एवं व्यापारी वर्ग के विश्‍वस्तरीय मंच के रूप में जाना जाने लगा है । इसमें सक्रियता पूर्वक लेन-देन एवं विचार विनिमय को प्रोत्साहन मिलत है जिससे आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक विकास के निर्धारण में मदद मिलती हैं । यह मेला अपनी शुरूआत से ही व्यापारी वर्ग को परस्पर मिलाने तथा मांग और पूर्ति के मिलन स्थल के रूप में कार्य करने के अपने मूल एवं महत्वपूर्ण लक्ष्य को पूरा करने के अलावा भी उपयोगी भूमिका निभायी है । व्यापार एवं वाणिज्य जगत में उत्प्रेरक की भूमिका अदा करने के अलावा यह मेला गरीबी दूर करने, स्वास्थ्य की देखभाल, शिक्षा एवं सफ़ाई सहित प्रमुख महत्वपूर्ण विषयों से सम्बन्धित गैर- सरकारी एजेंसियों तथा केन्द्ग एवं राज्य सरकारों के कार्यो का सच्चा आत्मनिरीक्षण करने का माध्यम है । विभिन्न राज्यों/ केन्द्ग शासित क्षेत्रों में ई-गवर्नेंस की अत्यधिक प्रगति को दर्शाते हुए मेले में सूचना प्रौद्योगिकी सेवा, बिजनेस प्रौसेस आउटसोर्सिग ( बीपीओ ) और नवीनतम नाँलिज पौसेस आउटसोर्सिग ( केपी ओ ) जैसी नई भावी प्रवृत्तियों को दर्शाया गया है । अन्य प्रवृतियां जो मेले में दर्शाई गई हैं उनमें विश्‍व अर्थव्यवस्था का एशियाई महाद्वीप की ओर झुकाव के कारण विदेशी नागरिकों द्वारा भारत में नौकरियों के लिए आगमन, विदेशों में रह रहे भारतीय मूल के व्यक्तियों द्वारा इस विश्‍व स्तर प्रमुख उद्यमियों के रूप में आनिर्माण, खुदरा व्यापार में आई क्रान्ति और कुशल संचार एवं परिवहन साधनों के कारण घटती दूरियां शामिल हैं और जिन्होनें शहरी क्षेत्रों के उच्च श्रेणी के निर्माण उद्योगों और सेवा उद्योगों से लेकर ग्रामीण क्षेत्रों में परम्परागत शिल्पकार तक सम्पूर्ण अर्थव्यवस्था को समृद्घ किया है । मेले में सामान्य व्यापारिक वातावरण को सही रूप में दर्शाया गया है और उसने बाजार में पुनजीर्वित करने के लिए भी योगदान किया है । भारतीय अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार मेला २००७ सम्भवतः पिछले एक दशक के दौरान आई टी पी ओ द्घारा शुरू किया गया सर्वाधिक विशाल और महत्वपूर्ण मेला है । शहरी विकास के अलावा मेले में राज्य सरकारॊं और केन्द्गीय सरकार की एजेन्सियों द्घारा निचले स्तर पर ग्राम परिषदों, पंचायतों के माध्यम से गरीब व्यक्तियों को शक्ति प्रदान करने के लिए चलाये जा रहे कार्यक्रमों पर भी फ़ोकस किया गया है । राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने पंचायतों को ग्राम स्वराज नाम दिया था और जिसे अब संवैधानिक दर्जा प्रदान किया गया है तथा जिसमें महिलाओं और अनुसूचित जातियों तथा अनुसूचित जनजतियों के सदस्यों एवं समाज के अन्य वंचित वर्गो को न्यूनतम प्रतिनिधित्व प्रदान किया गया है ।
इसलिए, आप सभी मेलें में आयें और असली भारत की तस्वीर को देखें---मेले में स्थित राज्य मण्डपों और संघ राज्य क्षेत्रों का मण्ड़पों में जीवन्त पतिदृश्य दर्शक देख सकते हैं, जिनमें पिछले वर्ष की तुलना में अधिक प्रभावी प्रदर्शन किया गया है और उदारीकरण के बाद की भारत की अर्थव्यवस्था के निरन्तर विकास को प्रदर्शित किया गया है । इन मण्डपों में एक ऎसा गतिशील मंच प्रस्तुत किया गया है जिसके माध्यम से भारतीय और अन्तर्राष्ट्रीय जगत की विराट जनसंख्या तक एक ओर उच्च तकनीकी सेवाओं के माध्यम से और दूसरी ओर अन्य परम्परागत उपकरणों के माध्यम से व्यापक औद्योगिक परिदृश्य को दर्शाने वाली भारत की पहली सक्षम प्रदर्शन के माध्यम से अन्य परम्परागत उपकरणों को दर्शाया गया है । इसके अलावा रत्न और आभूषणों के अमूल्य संकलन का व्यापक प्रदर्शन किया गया है । इसके अलावा ऎतिहासिक महत्व के आश्‍चर्यजन्क स्थलों, विराट हिमालय पर्वत की श्रृंखलाओं, भव्य पर्वतीय पर्यटन स्थलों, शान्त समुद्ग तटीय विश्राम स्थलों, जीवन्त त्यौहारों विशाल वन्य जीवन जीवन्त शहरों, घने उष्णकटिबंधीय जंगलों, कालातीत मरूस्थलों, रोमांचकारी साहसिक क्रीड़ाओं, भिन्न-भिन्न देशों के हस्तशिल्प असंख्य स्वादिष्ट व्यंजनों का आनन्द ले सकते हैं । इसके अलावा भी बहुत कुछ है ........
मेला है एक आदर्श स्थल ........प्रगति मैदान ने अपने पूरे इतिहास से यह साबित किया है कि वह बाजार की जरूरतों और मांगों के प्रति संवेदनशील रहा है और इस उसने प्रबन्धन और सगंठन के उन उच्च व्यावसायिक मानदण्डों को स्थापित किया है जिनसे आई टी पी ओ विश्‍वव्यापी ख्याति और सराहना प्राप्त हूई । आई टी पी उत्कृष्ट प्रदर्शन के निरन्तर प्रयासरत है । प्रदर्शकों और दर्शकों के सम्बन्धों और सेवाओं के सुधार की ओर विशेष ध्यान दिया जाता है, जो कि कारपोरेट जगत का एक महत्वपूर्ण लक्ष्य है ।
आई टी पी ओ में एक विशाल आधारभूत ढ़ाचा तथा विपणन और सूचना सुविधायें उपलब्ध हैं जिनका आयातक और निर्यातक समान रूप से उपयोग करते हैं । आई टी पी ओ के विदेश स्थित कार्यालय भारत से उत्पादों की उपलब्धता जानकारी प्राप्त करने में क्रेताओं की सहायता करते हैं ।
आई टी पी ओ के न्यूयार्क, फ़ैंकफ़र्ट, टोकियों, मास्को, और साओ पोलो स्थित विदेश कार्यालय निवेश के सुअवसर बढ़ाने के साथ साथ भारत से निर्यात बढ़ाने के लिए आवश्यक कार्यकलापों में कार्यरत हैं
इसी प्रकार बंगलौर, चेन्नई, कोलकत्ता और मुम्बई स्थित आई टी पी ओ के क्षेत्रीय कार्यालय अपनी विभिन्न गतिविधियों के माध्यम से देश भर में एक समेकित और सम्न्वित व्यापार संवर्धन अभियान चलाये जाने को सुनिश्‍चित करते हैं ।
आई टी पी ओ में प्रगति मैदान के अन्दर आवश्यक व्यापार सुचना के लिए भण्डार और आदर्श व्यापारिक परिदृश्य है । भारत का पहला व्यापार पोर्टल www.tradeportalofindia.com के माध्यम से आफ़ लाईन और लाईन दोनों प्रकार से विश्‍वसनीय जानकारी का व्यापक भण्डार प्रस्तुत किया गया है ।
जनवरी २००१ में दि स्टेट आफ़ दि आर्ट चेन्नई व्यापार केन्द्ग और अभी पिछलें दिनों व्यापार केन्द्ग बंगलौर को चालू करने के साथ ही आई टी पी ओ ने दिल्ली के बाहर आधुनिक प्रदर्शनी सुविधाओं को स्थापित करने का पहला चरण सफ़लतापूर्वक पूरा कर लिया है । चेन्नई व्यापार केन्द्ग जो तमिलनाडु में एक स्थायी और आधुनिक प्रदर्शनी स्थल की लम्बे समय से महसूस की जा रही जरूरत की पूर्ति करता है , इस क्षेत्र में व्यापार से संबंधित गतिविधियों के एक केन्द्ग के रूप में पहले ही उभर चुका है ।
इसी प्रकार व्यापार केन्द्ग ट्रेड सेन्टर बंगलौर, जो आई टी पी ओ और कर्नाटक राज्य ओद्योगिक क्षेत्र विकास बोर्ड का संयुक्त प्रयास है, से राज्य में मेलों, प्रदर्शनियों और अन्य संबंधित गतिविधियों के माध्यम से व्यापार संवर्धन को बड़ी गति मिलने की संभावना है ।
इसके अतिरिक्त एक अन्य संयुक्त प्रयास पश्‍चिम बंगाल ओद्योगिक विकास निगम डब्त्यू बी आई डी और कोलकत्ता नगर निगम के साथ एक सुपर लक्जरी होटल आई टी सी सोनार बांगला के निकट कोलकत्ता में किया गया है जहां कोलकत्ता ट्रेड सेन्टर ( के टी सी ) की आधार शिला का अभी पिछले दिनों अनावरण किया गया है ।
आई टी पी ओ के मुख्य कार्यकलापों और सेवाओं का संक्षेप में नीचे उल्लेख किया जा रहा है ः-
. दिल्ली के ह्‍दय स्थल में प्रगति मैदान में विशाल व्यापार मेला-परिसर का प्रबन्ध करना .. प्रगति मैदान प्रदर्शनी- परिसर में तथा भारत के विभिन्न केन्द्गों में विभिन्न व्यापार मेलों/प्रदर्शनी का आयोजन करना ।. भारत एवं विदेशों के अन्य मेला- आयोजकों को व्यापार मेलों/ प्रदर्शनियों के आयोजन के लिए प्रगति मैदान में स्थान उपलब्ध कराना ।. विक्रेताओं की पहचान करने, भ्रमण- सूची तैयार करने, लोगों से मिलने का कार्यक्रम निर्धारित करने और जरूरत पड़ने पर उनके साथ जाने में विदेशी विक्रेताओं को तथासमय और कुशल सेवाएं उपलब्ध कराना ।. भारतीय आपूर्तिकर्ताओं और विदेशी खरीददारों के बाच में स्थायी दीर्घकालीन संबंध कायम करवाना ।. खरीददारों की अपेक्षाओं के अनुरूप उत्पादों के विकास व अनुकूल में भारतीय कम्पनियों की सहायता करना ।. क्रेताओं और विक्रेताओं को पास लाने की दृष्टि दे क्रेता-विक्रेता बैठकों तथा एकल भारतीय प्रदर्शनियों का आयोजन करना ।. विदेशों में विभागीय भंडारों तथा मेल आर्डर हाउसों के माध्यम से भारतीय उत्पादों का संवर्धन करना ।. विदेशी मेलों/ प्रदशनियों में भागीदारी करना ।. आगन्तुक विदेशी क्रेताओं हेतु य्त्पाद प्रदर्शन का प्रबन्ध करना ।. सेमिनारों/ संगोष्ठीयों/ कार्यशालाओं आदि का आयोजन करना ।. निर्यात संवर्धन प्रयासों में लघु एवं मझौली इकाइयों को प्रोत्साहन देना तथा उनको शामिल करना ।. व्यापार व निर्यात संवर्धन से संबंधित इन-हाउस प्रशिक्षण एवं आवश्यकता आधारित अनुसंधान का प्रबन्ध करना ।. भारत का विदेश व्यापार बढ़ाने में राज्य सरकारों की भागीदारी और सहयोग विश्‍चित करना ।. व्यापार सूचना केन्द्ग पर इलेक्ट्रानिक सुगमता के माध्यम से व्यापार सूचना सेवाएं उपलब्ध कराना ।
एक प्राथमिकता वाला स्थल है प्रगति मैदान ......इण्डिया ट्रेड प्रमोशन आर्गनाइजेशन का मुख्यालय - प्रगति मैदान भारत का प्रमुख प्रदर्शनी परिसर के अलावा भी कुछ है । अपने नाम-“ प्रगति मैदान” के अनुरूप यह व्यापार के माध्यम से विकास एवं प्रगति को द्योषित करता है ।भारत में विश्‍व स्तर का सबसे बड़ा प्रदर्शनी स्थल होने एवं भारत में आधुनिक मेला संस्कृति का प्रतीक होने के नाते प्रगति मैदान, यहां आयोजित किये जाने वाले मेलों के साथ-साथ विस्तार एवं आयाम- दोनों में बढा है । इस प्रदर्शनी स्थल का विकास किये जाने से पूर्व इसी प्रदर्शनी परिसर का उपयोग भारत में रेलवे की शताब्दी ‘मनाने हेतु १९५२ में रेलवे प्रदर्शनी लगाने हेतु किया गया था । इसके बाद १९५५ में अन्तरराष्टीय ग्राफ़िक्स आर्ट एवं प्रिन्टिंग मशीनरी प्रदर्शनी, १९६० में विश्‍व कृषि मेला तथा १९६१ में भारतीय ओद्योगिक प्रदर्शनी लगायी गयी थी । किन्तु बिखरे हुए परिसर से वर्ष १९५८ में यह अपने सही रूप में अस्तित्व में आया । सार के दशक में भारत की स्वतंत्रता की रजत जयन्ती के साथ-साथ तीसरे एशिया अन्तरराष्टीय व्यापार मेला- एशिया ७२ के आयोजन के साथ ही इस मेला परिसर तथा मेले के स्वरूप में दोनों में ही महत्वपूर्ण परिवर्तन आये । यह एक महत्वपूर्ण घटना थी क्योकि इससे भारतीय व्यापारी समुदाय व्यापार मेलोंं की (व्यापार) संवधर्नात्मक क्षमता को समझ पाये । इन प्रदर्शनी परिसर को “प्रगति मैदान” नाम दिया गया । इन व्यापार मेलों एवं महत्व स्पष्टतः स्वीकार करके व्यापार मेलों का आयोजन करने के ंमुख्य उदेश्य से भारतीय व्यापार मेले एवं प्रदर्शनी परिषद, वाणिज्य मंत्रालय के अन्तर्गत एवं वाणिज्यिक प्रचार निदेशालय तथा भारतीय अन्तरराष्टीय व्यापार मेला संगठन- तीनों निकायों का विलय करके संसद के एक अधिनियम द्घारा १अप्रैल १९७७ को ट्रेड फ़ेयर अथारिटी आफ़ इण्डिया ( टी एफ़ ए आई ) का गठन किया गया था ।
इण्डिया ट्रेड प्रमोशन आर्गनाइजेशन ( आई टी पी ओ ) की स्थापना एक जनवरी १९९२ के बाद भूतपूर्व ट्रेड डेवलेपमेंट अथारिटी ( टी डी ए ) के टी एफ़ ए आई के साथ विलय करके की गई थी । (टी डी ए की स्थापना वाणिज्य मंत्रालय के अधीन पंजीकृत सोसाइटी के रूप में १९७० में की गई थी ) । भारत के अग्रणी प्रदर्शनी परिसर का व्यावसायिक ढंग से प्रबन्धन करने वाले आई टी पी ओ ने भारत सरकार की प्रमुख व्यापार संवर्धन एजेन्सी के रूप में भूमिका का निर्वाह करते हुए विगत वर्षो से अनेक महत्वपूर्ण उपलब्धियां हासिल की हैं ।अक्टूबर १९९४ में प्रगति मैदान में आई टी पी ओ और नेशनल इन्फ़ार्मेटिक्स सेन्टर (एन आई सी) भारत सरकार द्घारा संयुक्त रूप से राष्ट्रीय व्यापार सूचना केन्द्ग (एन सी टी आई) की स्थापना करके उत्पादों एवं बाजारों से संबंधित अपना डाटा बेस तैयार करने के अलावा आई टी पी ओ अपना सूचना आधार बढाने के लिए एन सी टी आई के साथ नियमित रूप से विचार- विमर्श करता है । निष्कर्षतः प्रगति मैदान में ऎसा व्यापारिक वातावरण मिलता है जो चुनौतियों को सुअवसरों के रुप में परिणत कर देता है । प्रगति मैदान में व्यापार में उद्योग जगत के प्रतिनिधि एवं प्रमुख पधारते हैं और विशाल भारतीय बाजार की अपेक्षाओं को पूरा करते हैं ।

आध्यात्मिकता को जीवनशैली में शामिल करने की आवश्यकता

धर्म ईश्‍वर के प्रति आस्था रखनेवाले लाखों लोगों के धार्मिक संगठनों एवं पूजा स्थलों के प्रति आकर्षण क्या वाकई फायदेमंद है? दस वर्षों से धर्म और स्वास्थ्य के आपसी संबंध पर शोध कर रहे मियामी विश्‍वविद्यालय में मनोविज्ञान के प्राध्यापक एवं अनुसंधानकर्त्ता माइकेल मैक्‍कलो के अनुसार धर्म को अपेक्षाकृत कम आँकना काफी मुश्किल है । उनके निष्कर्षों के उपरान्त मनुष्य के स्वास्थ्य पर धर्म के असर को लेकर अच्छी सारी बहस छिड़ चुकी है । प्रोफेसर मैक्‍कलो ने प्रयोगिक तौर पर अपने विश्‍वविद्यालय कोरल गैंबल्स कैंपस में अलग-अलग पृष्ठभूमि वाले सैकड़ों लोगों की क्षमताशीलता और अहसास मानने की प्रवृत्ति को विशेष रूप से दर्ज किया और इसे उनके सामान्य स्वास्थ्य, अवसाद की स्थितियों और नशे की आदतों से जोड़कर देखा । इस परिप्रेक्ष्य में वे सबसे एक ही सवाल करते रहे “क्या आप ईश्‍वर में विश्‍वास रखते है, और हाँ तो कितना? मैक्‍कलो के शोध से पता चला है कि चाहे वे किसी भी धर्म के हो, आस्तिक लोग नास्तिक के बजाय पढ़ने-लिखने में आगे रहने, दीर्घायु एवं सफल वैवाहिक जीवन के स्वामी होते है । उक्‍त विषय पर मैक्‍कलो एक दर्जन से भी अधिक ‘स्टडी रिपोर्ट’ तैयार कर चुके हैं । इनमें साइकोलॉजिकल बुलेटिन में प्रकाशित ताजा रिपोर्ट भी शामिल है जिसमें कहा गया है कि अगर आप धूमपान छोड़ना चाहते हैं तो आपको धार्मिकता की शरण में आना चाहिये । इसी तरह ‘जर्नल ऑफ ड्रग इश्यूज’ में उन्होंने लिखा है कि शराबखोरी के शिकार मोहल्ले में चर्च खोल देने का चमत्कारिक असर देखने को मिला । ऐसा इसलिए कि धार्मिक आस्था रहने वाले लोगों में आत्मनियंत्रण की क्षमता दूसरों के मुकाबले ज्यादा होता है । यही कारण है कि धार्मिक लोग शरीर और मन से फिट रहने के अलावा ज्यादा संपन्‍न भी होते हैं । अमेरिकन ह्‍यूमैनिस्ट एसोसिएशन वॉशिंगटन डीसी के अध्यक्ष डेविड नियोस मानव कल्याण के वास्ते नैतिक जीवन जीने की वकालत करते है । प्रोफेसर मानसिक स्वास्थ्य के लिए कर्मकांड ःप्रोफेसर मैक्‍कलो धर्म का इस तस्वीर का एक पहलू मानते हैं । इसके साथ ही व्यक्‍ति की नस्ल, उम्र और वर्ग का भी उसके शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर काफी असर पड़ता है । उनके जीवन की विशेषताओं पर इनका अच्छा प्रभाव पड़ता है । वे यह भी कहते है कि धर्म के मामले में कुछ खामियाँ भी है । जैसे कि आस्तिक व्यक्‍ति में खुद पर काबू रखने की जो विशेष कूवत नशे की लत तक छुड़ा देती है वहीं दूसरी ओर फिदायीन आतंकवादी भी बना सकती है । मैक्‍कलो कहते हैं कि होली कम्युनियन, संडे प्रेयर्स, भजन संध्या, सत्संग, रात्रि जागरण, भंडारा आदि का भी जबरदस्त सकारात्मक मनोवैज्ञानिक प्रभाव पड़ता है । यह अलग बात है कि उनके द्वारा किए गए अध्ययन मेंज्यादातर पात्र इसाई थे मगर उनका कहना है कि यह निष्कर्ष हर धर्म के अनुयायियों पर लागू होता है । वास्तव में अपने धर्म में निर्धारित दायरों को समझते हुए नैतिकता, अहंकार और जिम्मेदारी की हदों का ध्यान रखकर स्वयं का ही बल्कि पूरे समाज को शारिक और भावनात्मक तौर पर उत्कृष्ट बनाया जा सकता है । पूजा एवं प्रार्थना का महत्व ःप्रो० मैक्‍कलो कहते हैं कि प्रार्थना और पूजा में गजब की ताकत होती है । जब वैज्ञानिकों ने पूजा के दौरान इंसानी दिमाग की तस्वीरों का मिलान अपने प्रियपात्र से मिलकर बहुत खुश और स्वस्थ महसूस कर रहे लोगों की तस्वीरों से किया तो उन्होंने पाया कि उनमें काफी समानताएं है । इसका तात्पर्य है कि अगर हमारी आस्था सच्ची और गहरी है तो हमारी स्वास्थ्य पर भी इसका अवश्य प्रभाव पडेगा । बेशक आप इसलिए धार्मिक होते हैं । कि अपने परिवार को निराश नहीं करना चाहते अथवा फिर किसी वजह से स्वयं को दोषी महसूस कर रहे हों । उनका मानना है कि जीवन में काफी देर से धार्मिक बनने या धर्म बदलने वाले लोग इसका सबसे ज्यादा फायदा उठाते हैं । नास्तिक या धर्म विमुख लोगों का धर्म के जुड़ाव के बाद इस भावना का संचार होता है कि वे स्वयं के लिए नहीं बल्कि ईश्‍वरीय सत्ता के लिए जी रहे हैं । अपने से विराट किसी शक्‍ति में आस्था रखने से आत्मनियंत्रण और ज्यादा मजबूत हो जाता है । अपने प्रयोगों के माध्यम से मैक्‍कलों ने इसे सिद्ध किया है । उदाहरण स्वरूप कुछ लोगों ने पूछा कि अधिक राशि? इसके उत्तर में अधिकतर आस्थावान लोगों ने बड़ी राशि पाने हेतु एक महीने की प्रतीक्षा का संतोष दिखाया । उनका मानना है कि धार्मिक प्रवृत्ति के लोग कानून की आवहेलना कम करते है, अवैध संबंधों से परहेज तथा नशे की आदत के भी वे कम शिकार होते हैं । सवा लाख लोगों पर किए सर्वेक्षण के परिणाम के अनुसार धार्मिक लोगों का जीवनकाल अन्य के बनिस्पत २९ प्रतिशत अधिक होती है । सहनशक्‍ति का स्त्रोत ः“जर्नल ऑफ क्लिनिकल एंड सोशल साइक्लोजी” में प्रकाशित मैक्‍कलो के अध्ययन में ६४ केस स्टडीज को शामिल किया गया था, जिसमें धर्म के साथ हाइपर-टेंशन और हार्ट‍अटैक जैसे स्वास्थ्य के मुद्‌दों का रिश्ता को केंद्रविंदु में रखा गया था । इससे पता चला कि अन्य लोगों के बनिस्पत प्रतिदिन पूजा-पाठ और सत्संग करनेवाले ज्यादातर लोगों को ऐसी कोई समस्या नहीं थी । इतना ही नहीं धार्मिक लोगों में मानसिक और शारीरिक कष्ट सहने की क्षमता भी अपेक्षाकृत ज्यादा पाई गई । यूरोलोजिस्ट डॉ० मैन्युअन पैड्रन का कहना था कि ईश्‍वर में आस्था रखनेवाले उनके ज्यादातर मरीज किसी भी तकलीफ को झेलने में ज्यादा परेशान नहीं आए बल्कि हर परिस्थिति में दृढ़ रहे और वे डगमगाए नहीं । इसी प्रकार अहसान मानने का माद्‌दा भी आस्तिकों में ही ज्यादा देखने को मिलता है । मैक्‍कलो का मानना है कि इससे उनके जीवन में अन्य लोगों की तुलना में २५ प्रतिशत खुशियों की बढ़ोत्तरी हो जाती है । मंत्रोच्चारण से लहलहाएंगी फसलें ःकृषि विश्‍वविद्यालय पालमपुर के वैज्ञानिक इन दिनों वैदिक मंत्रोच्चारण से खेती करने के अनूठे शोध में जुटे हुए है । इनका मानना है कि वह दिन दूर नहीं जब खेतों में लहलहाने वाली फसलें वैदिक मंत्रों से शुद्ध होंगी और उनमें कई बीमारियों को ठीक करने की खासियत भी होगी । हरि क्रांति के नाम पर रासयनिक खेती के दुष्परिणामों से किसानों को निजात दिलाने के लिए कृषि विश्‍वविद्यालय पालमपुर के मॉडल ऑर्गेनिक फोम और एग्रो फॉरेस्ट्री विभाग के वैज्ञानिकों ने पुरातन पद्धति पर शोध कर इसमें कामयाबी हासिल की है । सूर्योदय से शुरूआत ः फसल की पैदावार के समय रोज सुबह सूर्योदय के साथ मंत्रोचारण होता है ताकि फसलों को नया जीवन और शुद्धि मिले, इसके बाद हवन कुंड में औषधीय जड़ी-बूटियों की आहूति दी जाती है । ब्राजील में पहला प्रयोग ःब्राजील के जंगलों में केले की फसल तबाह होने के बाद वैज्ञानिकों ने सर्वप्रथम इस विधि का सफल प्रयोग किया था । कृषि वैज्ञानिक डॉ० वाईएस पाल के मुताबिक इससे जहां पर्यावरण शुद्ध होता है वहीं प्राकृतिक आपदाओं से भी निजात मिलती है । विश्‍वविद्यालय के २० वैज्ञानिक और चार छात्र आजकल इस विधि पर रिसर्च कर रहे है । यहां विभिन्‍न प्रकार के मंत्रों से वातावरण, मिट्‌टी, कीट, जानवरों और हवन कुंड की राख पर असर को डाटा के रूप में जमा किया जा रहा है । सुबह-सुबह कृषि विभाग के हॉल में मंत्रोचारण होता है । इसी शोध में भाग ले रही छात्रा रूचि शर्मा का कहना है कि यह किसी खास फसल के लिए लाभदायक है । फसले भी मानव की तरह सजीव है । वातावरण में लगातार हो रहे बदलाव का उन पर व्यापक असर होता है । कुल मिलाकर देखा जाय तो आध्यात्मिकता को आत्मसात्‌ कर हम अपने जीवन को खुशियों से लबरेज कर तरो-ताज कर सकते हैं । तनाव और पदूषण भरे इस माहौल में आज इसी की आवश्यकता है । आध्यात्मिकता को जीवनशैली का अंग हमें बनाना ही पड़ेगा ।

भारत और पाकिस्तान :क्या पाया, क्या खोया ?

पाकिस्तान और भारत एक साथ आजाद हुए लेकिन दोनों ने अब तक क्या खोया क्या पाया? दोनो देशों के अलग हो जाने के बाद भी भारत अग्रज की भूमिका में है। वह पाकिस्तान के घुड़कियों को सहने का आदी हो चुका है । भारत के हाथों पराजित होने के बावजूद वह अपनी धरती का इस्तेमाल भारत विरोधी गतिविधियों में ही करता है । उसने सर्वाधिक सहायता देने वाला अमेरिका की राशि का उपयोग आतंकवाद से लोहा लेने के बजाय नकारात्मक मानसिकता के कारण भारत के खिलाफ कर रहा है । वार्त्ताओं के इतने दौर के बाद स्थिति ऐसी बन चुकी है कि वार्त्ता शब्द अब अनुपयोगी हो चुका है । भारतीय संसादों के दल ने भी ओबामा प्रशासन से यह सुनिश्‍चित करने को कहा कि पाकिस्तान अमेरिकी सहायता का उपयोग अपने बलों के निर्माण में न करे । प्रतिनिधिमंडल के अध्यक्ष और कांग्रेस सांसद अभिषेक मनु सिंघवी के अनुसार सांसदों ने दृढ़ता से एक स्वर में समकालीन स्थिति में भारत की चिंताओं को व्यक्‍त किया । अफगान पाकिस्तान नीति आवश्यक रूप से सुरक्षा उपाय घटक के रूप में तैयार की जानी चाहिए ताकि अमेरिका की ओर से दी जानेवाली भारी सहायता को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से संभवतः भारत विरोधी गतिविधियों के रूप में इस्तेमाल होने से रोका जा सके । सासंदों ने अमेरिकी अधिकारियों और सांसदों को बताया कि वे पकिस्तान की मदद का स्वागत करते हैं लेकिन उन्हें सुनिश्‍चित करना होगा कि इसका भारत के खिलाफ उपयोग न हो । भारत के विदेश सचिव शिवशंकर मेनन के अनुसार मिस्त्र में निर्गुट शिखर सम्मेलन के दौरान उनकी मुलाकात पाकिस्तानी विदेश सचिव सलमान बशीर के साथ होगी । पिछले दिनों रूस में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और राष्ट्रपति जरदारी की मुलाकात के दौरान दोनों देशों के सचिवों के बीच बैठक करने का फैसला किया गया था । मिस्त्र में होने वाली मुलाकात के दौरान चर्चाका विषय केवल आतंकवाद रहेगा । इसी संदर्भ में मुंबई हमलों के दोषियों के खिलाफ जाँच आगे बढ़ाने के मसले पर भी बातचीत की जाएगी । इस बैठक के लिए दोनों देशों के विदेश मंत्रालयों के बीच कई दौर की बातचीत हुई और आखिर में की ओर से यह बैठक जुलाई के प्रथम सप्ताह में नई दिल्ली में करने का प्रस्ताव किया गया था परन्तु पाकिस्तान ने कहा कि यह बैठक केवल आतंकवाद के मसले पर नहीं होगी, जबकि मनमोहन जरदारी बैठक में यही तय किया गया था । पाकिस्तान ने विदेश सचिवों की बैठक में जम्मू-कश्मीर और अन्य मसलों को भी पाकिस्तान को सबसे पहले यह वादा करना होगा कि अपनी धरती से भारत विरोधी आतंकवादी हरकतें नहीं होने देंगे । मिस्त्र में निर्गुट शिखर बैठक १५ और १६ जुलाई को होगी जिसमें पाकिस्तान की ओर से राष्ट्रपति जरदारी ने भाग लेने की ईच्छा व्यक्‍त की थी किंतु बाद में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री गिलानी के भाग लेने की घोषणा की गई । इधर अमेरिकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन का वक्‍तव्य अपने आप में काफी महत्वपूर्ण है । साथ ही उनके संतुलिन बयान एक कड़वी सच्चाई को बयान करती है । उन्होंने कहा कि “पाकिस्तान कीम अमेरिकी नीति एक कदम आगे और दो कदम पीछे ही रही है । यह कदम ठीक होगा कि आज उस क्षेत्र में हम जिन समस्याओं से निअपट रहे हैं, वे अमेरिकी नीति का नतीजा है । ” हिलेरी क्लिंटन ने अमेरिकी प्रशासन की पिछली तीस वर्षों की नीति में काफी दोष निकाला, लेकिन वही गलती दोहराई जा रही है । आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई के लिए पाकिस्तान ने अमेरिका से पिछले सात वर्षों में जितनी सहायता (१८ हजार करोड़ रूपए) ली । उसका कोई सद्‌परिणाम देखने को ही मिला । इसके बावजूद अमेरिका पाकिस्तान को बिना शर्त मदद प्रदान कर रहा है । आखिर इसका मकसद क्या है? वास्तव में अमेरिका भारत के उभरते शक्‍ति से भयभीत हो चुका है । उसे यह समझ आ चुका है कि हम भारत के साथ प्रत्यक्ष नहीं बल्कि अप्रत्यक्ष जंग ही लड़ सकते हैं क्योंकि अमेरिकी शक्‍ति भारत की अस्थिर और उलझाए रखने की नीति में ही अपनी जीत मानता है । दूसरी तरफ उसे यह भी मान है कि इस सबके बाद भी भारत सारे पारिस्थितियों का मुकाबला कर ले और आगे हो जाय तब क्या होगा? यही वह शंका है जिसके कारण वह भारत के साथ अच्छे संबंध भी चाहता है । भारतीय प्रक्रिया का लोहा मानता है । अपने अधिकांश पदो पर भारतीय मूल के व्यक्‍तियों की नियुक्‍ति प्रतिभा के बलबूते ही उन्होंने की है । पाकिस्तान के मुद्‌दे पर अमेरिकी उच्चाधिकारियों, मंत्रियों एवं खुद राष्ट्रपति तक के बदलते बयानों के निहितार्थ आखिर क्या है? भारत की मजबूरी यह है कि अमेरिका को ईट का जबाब पत्थर से तो नहीं दे सकती है परन्तु अप्रत्यक्ष रूप से उसने अमेरिका को हस्तक्षेप करने के दायरे से अवगत करा दिया है । भारत ने ति वैश्‍विक आर्थिक मंदी में भी विकल्पों के बलबूते एवं परिश्रम, लगनशीलता के संयुक्‍त शक्‍ति के बदौलत देश को विकट स्थिति से बचा लिया परन्तु पाकिस्तान की स्थिति ऐसी नहीं है । वहाँ यदि अमेरिकी सहायता ना मिले तो विद्रोह की आग पूरे देश में फैल जाएगी जिसका पहला निशाना भारत नहीं बल्कि अमेरिका होगा । पाकिस्तान को दी जा रही सहायता से जुड़े “पीस एक्ट २००९” से भारत का जिक्र ओबामा प्रशासन ने हटवाकर पड़ोसी देश कर दिया है । संभवतया पाकिस्तान के दबाब में एक्ट की भाषा बदल दी गई । अमेरिका ने भी अपनी परमाणु नीति के चोले को एक तरफ रखकर परमाणु सामग्री की तस्करी करनेवाले वैज्ञानिक अब्दुल कादिर खान ने पूछताछ करने की भी जरूरत नहीं समझी । इस एक्ट के द्वारा पाकिस्तान को दी जानेवाली वित्तीय सहायता राशि में तीन गुणा बढ़ोत्तरी कर डेढ़ अरब डॉलर हिलेरी क्लिंटन ने कहा कि पाकिस्तान का परमाणु शास्त्र भंडार काफी विशाल पारंपरिक सेना को पृष्ठभूमि प्रदान करने के लिए ही है । इसके पहले अमेरिकी सीनेटरों ने शंका जाहिर की थी कि पाकिस्तान को अमेरिकी मदद का दुरूप्रयोग परमाणु भंडार को बढ़ाने के लिए ही किया जा रहा है । अमेरिकी सुरक्षा सहायता की शर्त्तों में कहा गया है कि पाकिस्तान परमाणु प्रसार से जुड़े पाकिस्तानी नागरिकों से पूछ्ताछ की सुविधा देगा । पाकिस्तान ने कहा था कि जिस तरह हमें परमाणु प्रसार और सीमा पार आतंकवाद के लिए जिम्मेदार ठहराया जाता है उससे हम अपमानित महसूस करते हैं । पाकिस्तान के साथ सांसद ने कहा था कि पाकिस्तान को मदद चाहिए परन्तु सम्मान के साथ । रिपब्लिकन सांसद एड रायस ने कहा था कि पाकिस्तान आतंकवाद से लड़ने के लिए मदद लेता है लेकिन अपनी सेना को भारत के खिलाफ खड़ा रखता है । उन्होंने कहा कि पाकिस्तान के संदर्भ में अमेरिकी कांग्रेस को अपना लक्ष्य स्पष्ट करना पड़ेगा । अमेरिकी कांगेस की एक रिपोर्ट भारत के लिए चिंता का सबस है । इसमें कहा गया है कि पड़ोसी देश पाकिस्तान के पास करीब ६० परमाणु बम है और इनमें से ज्यादातर का निशाना भारत की ओर रखा गया है । पाकिस्तान बम बनाने के लिए लगातार विखंडनीय सामग्री की उत्पादन कर रहा है । अमेरिकी कांग्रेस की रिसर्च शाखा ‘कांग्रेसनल रिसर्च सर्विस’ (सीआरएस) ने अपनी ताजा रिपोर्ट में यह खुलासा किया है । उसकी यह रिपोर्ट हाल ही दिए गए इन बयानों और मीडीया रिपोर्टो की पुष्टि करती है कि पाकिस्तान लगातार अपने परमाणु हथियारों का जखीरा बढ़ाने में लगा हुआ है । सीआरएस ने ‘पाकिस्तान हथियार प्रसार और सुरक्षा से जुड़े मुद्दे’ शीर्षक से तैयार अपनी रिपोर्ट में कहा है- ‘पाकिस्तान के पास इस समय लगभग ६० परमाणु बम हैं । वह और परमाणु बम बनाने के लिए लगातार विखंडनीय सामग्री की उत्पादन किए जा रहा है । ’ अमेरिकी जॉईटं चीफ ऑफ स्टाफ के चेयमैन एडमिरल माइक मुलेन ने भी १४७ मई को कांग्रेस के समक्ष जानकारी दी थी कि अमेरिका के पास प्रमाण हैं कि पाकिस्तान अपने परमाणु हथियारों के भंडार में निरंतर वृद्धि कर रहा है । ऐसी ही एक रिपोर्ट इस महीने के शुरू में न्यू यॉर्क टाइम्स में भी प्रकाशित हुई थी । सीआरएस की रिपोर्ट कहती है कि पाकिस्तान के पास कोई घोषित न्यूक्लियर पॉलिसी नहीं हैं । लेकिन उसके पास ‘भरोसेमंद न्यूनतम प्रतिरोध क्षमता’ है । रिपोर्ट में कहा गया है कि पाकिस्तान के परमआणु हथियारों की यकनीक कई स्त्रोतों से हासिल की गई है । उसने यूरोप से एनरिचमेंट की तकनीक ली है, जबकि छोटे न्यूक्लियर हथियारों और मिसाइलों की टेक्नॉलजी उसे चीन से मिली है । पाकिस्तान के परमाणु बमों में बेहद परिष्कृत यूरेनियम के ठोस कोर के साथ इम्प्लोजन (अंदरूनी विस्फोट) डिजाइन का इस्तेमाल किया गया है । प्रत्येक परमाणु बम १५-२० किलोटन का है । इस्लामाबाद यहीं रूका है । वह और परमाणु बम बनाने के लिए हर साल करीब १०० किलोग्राम बेहद परिष्कृत यूरेनियम का उत्पादन कर रहा है । रिपोर्ट में उसके खुशाब प्लूटोनियम प्रॉडक्शन रिएक्टर के विस्तार का जिक्र किया गया है, जिसमें चीन की मदद से दो अतिरिक्‍त हैवी वॉटर रिएक्टर लगे हैं । सीआरएस के अनुसार पाकिस्तान ने परमाणु हथियार पहले इस्तेमाल न करने की बात तो कही है, लेकिन परमाणु हथियारों से लैस हमलावर देश (जैसे भारत) पर एटम बम का पहले इस्तेमाल न करने की गारंटी नहीं दी है । पाकिस्तान में लंबे समय से जारी अस्थिरता और तालिबान के खिलाफ उसके अभियान से इन आशंकाओं को बल मिला है कि उसके परमाणु हथियार आतंकवादियों के हाथ लग सकते हैं या फिर पाकिस्तान सरकार में मौजूद तत्व उनका इस्तेमाल कर सकते हैं । सीआरएस ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि पाक में फैली अस्थिरता परमाणु हथियारों के लिए खतरा बन सकती है । इसके अनुसार कुछ पर्यवेक्षकों को आशंका है कि सरकार में कट्टरपंथियों के आ जाने या पाकिस्तान के परमाणु कारोबार से जुड़े लोगों में उनके प्रति सहानुभूति रखने वाले इसका प्रसार कर सकते हैं । माना जाता है कि पाकिस्तान ने अपने परमाणु हथियारों को एक जगह नहीं बल्कि अलग-अलग जगहों पर रखा है । सवाल यह उठता है कि पाकिस्तान की मंशा अगर साफ है तो उसे उक्‍त वादा करने में क्या दिक्‍कत है? फिर पाकिस्तानी नेताओं के अलग-अलग सुर क्यों है? इतना तो तय है कि यह समस्याओं को सुलझाने के बजाय उलझाने में शायद अपनी भलाई समझता है । “कैसे सुलझेंगी हालात की गुत्थी लोगों अहलेदानिश ने बड़ी सोंच के उलझाई है । ”

कैसे चुनें , किसको चुनें ?

राष्ट्रभाषा हिन्दी में समय दर्पण का अंक आपके समक्ष है । लोकसभा चुनाव का शंखनाद हो चुका है । हमारी कोशिश रही है कि समयानुकूल सामग्री अपने पाठकों को परोसी जाए । इसलिए प्रस्तुत अंक लोकसभा चुनाव विशेषांक है । यह अंक राजनीति खबरों से लबरेज है । देश के विभिन्‍न क्षेत्रों, विभिन्‍न पार्टियों एवं विभिन्‍न वर्गों से संबंधित खबरों का समागम इसमें मिलेगा । ऐसा लगता है कि अमेरिकी हाईटेक चुनाव प्रचार पद्धति का विशेष प्रभाव भारत में इस बार के लोकसभा चुनाव प्रचार पर विशेष रूप से पड़ेगा । आईटी का जलवा चुनाव प्रचार में दिख रहा है । सभी दलों ने युवा शक्‍ति के महत्व को समझना है । जहाँ-जहाँ युवा शक्‍ति को कमतर आँकने की कोशिश की गई वहाँ युवा शक्‍ति अपने मतों से निर्णायक जबाबदेने की तैयारी मे है । अब तक महिला आरक्षण बिल पास न होने का मलाल देश की आधी आबादी को है । किसी भी दम ने महिला आरक्षण के अनुपात में टिकट नहीं दी है । यदि सुरक्षित सीट की परंपरा नहीं होती तो दलितों की उपेक्षा कर देना कोई आश्‍चर्यजनक बात नहीं होती इस चुनाव में जनजागरण भी जोरों पर है । व्यक्‍तिविशेष संस्थाओं एवं मीडिया द्वारा सुप्त मतदाताओं को जागृत किया जा रहा है । सबसे महत्वपूर्ण बात भाजपा का फिल्मी सितारों से मोहभंग होना, यूपीए का बिखराव एवं इंटरनेट के माध्यम से चुनाव प्रचार है । इन्हीं कारणों से हमने राजनीति एवं सूचना तकनीक को मुख्य स्थान दिया है । प्रसिद्ध योगाचार्य स्वामी रामदेव विमल जालान टी० एन० शेषण के साथ-साथ विभिन्‍न कार्टूनिस्ट एवं चुनाव आयुक्‍तों ने आम लोगों से अपील की है कि वे देश के व्यापक हित में साफ सुथरे छवि के सुयोग्य उम्मीदवारओं को चुनकर भेजें । सही सोच के प्रति समर्पण ही था कि उम्मीदवार का प्रचार करने कार्यकर्त्ता भुने चने खाकर गाँव-गाँव घूमा करते थे । कहीं-कहीं पैदल और कहीं-कहीं साईकिल एवं बैलगाड़ी से प्रचार किया जाता था । उस वक्‍त चुनाव और उम्मीदवार दोनों आदर्श होते थे । उम्मीदवार और मतदाता के बीच पारिवारिक सदस्य जैसा रिश्ता होता था । पहले चुनाव लड़ने वाले जानते थे कि उनको समाज के लिए क्या करना है । मतदान के दिन उत्साह दिखाई पड़ता था । आज की बदली परिस्थिति में चुनाव खर्चीला एवं हाइटेक हो चुका है । आज अपराधी चुनाव में खड़े हो रहे हैं जिससे मन खिन्‍न हो चुका है । बूथ लूटनेवाले बदमाश आज खुद नेता बन बैठे हैं । पिछले जमाने में मतदाता जागरूक और संगठित होते थे । आज आम नागरिकों में वैसी समझ नहीं दिखाई देती है । भाजपा की राष्ट्रीय सचिव अमरजीत कौर एवं वरिष्ठ साहित्यकार राजेन्द्र यादव का राजनीति में फिल्मी हस्तियों के प्रवेश पर जो वक्‍तव्य दिए हैं वह काफी काबिलेगौर है । सुश्री अमरजीत कौर ने कहा कि- “ मुझे इस पर एतराज नहीं कि फिल्मी अभिनेता चुनावी राजनीति में आए लेकिन टिकट देने से पहले देखा जाना चाहिये कि उसने जनता के बीच काम किया है या नहीं । वह अभिनेता या खिलाड़ी कुछ लोगों में मशहूर है सिर्फ इसलिए उसे लोकसभा के चुनाव में नहीं उतारा जाना चाहिए । इससे साबित होता है कि राजनीतिक दल अपनी भूमिका को गंभीरता से नहीं ले रहे यह समाज और राजनीति को हल्के ढ़ंग से लेने की मनसिकता को दर्शाता है । राजनीतिक दलों की जिम्मेदारी है कि वे तपे हुए लोगों को ही मैदान में उतारे । वरिष्ठ साहित्यकार राजेन्द्र यादव सवाल उठाते हैं कि “क्या ये फिल्मी और क्रिकेट के सितारे राजनीति के बारे में कुछ जानते भी है या नहीं ? जिंदगी भर दूसरों की भाषा बोलने वाले इन सितारों के पास अपनी भाषा भी नहीं है । राजनेताओं को ऐसे आर्ची डॉल्स यानी बोलनेवाले कठपुतलियों की बेहद जरूरत है । जो अपनी मौजूदगी से भीड़ खींचे और फिर वही बोले जो नेता बताए । मदारी के बंदरों की तरह इन्हें भीड़ इकट्‌ठा करने के लिए नचाया जाता है । जबसे संसद के दोनों सदनों ने बुद्धिजीवियों का बहिष्कार किया है तब से ऐसे ही सितारे वहाँ की सीटें भरने का काम कर रहे हैं । ” देश में युवा मतदाताओं की संख्या लगतार बढ़्ती जा रही है । अधिकांश युवाओं के अनुसार उन्हें ऐसा सांसद चाहिए जो लोगों की समस्याओं पर सोचे तथा देश को विकास की रह पर ले जा सके । नई उम्र, नया काम और नई सोंच, फिर क्यों न उसे प्रतिनिधि चुने । जब विकल्प के रूप में युवा उम्मीदवार हो तो किसी ऐसे नेता को क्यों चुने जिसकी छवि खराब हो । इसमें उम्र के साथ-साथ वैचारिक सोंच को भी प्रधानता देनी चाहिए । जब सरकारी नौकरी से सेवानिवृत होने की आयु सीमा ६० वर्ष है तो फिर राजनीति में क्यों नहीं । सरकारी नौकरी में निर्धारित इस आयुसीमा से स्पष्ट है कि इस उम्र के बाद इंसान के अंदर नेतृत्व क्षमता खत्म हो जाती है । अटलबिहारी बाजपेयी और जॉर्ज फर्नाण्डीस इसके प्रत्यक्ष उदाहरण है । समाज के ईमानदार और पढ़े-लिखे लोगों को राजनीति से परहेज नहीं करना चाहिये । राजनीति की गंदगी को दूर करने का एकमात्र रास्ता है कि इसमें अच्छे लोग शामिल हों । राजनीति में युवाओ, उद्यमशीलों एवं संस्कृतिकर्मियों, विद्वानों की भागीदारी बढ़नी चाहिये । मशल्स पावर पर काफी हद तक लगाम लग चुका है, परंतु मनी पावर को रोकने में मीडिया का सहयोग अति आवश्यक है ।मेरे विचार से भाजपा के बड़े दिग्गजों (राजनाथ-जेटली) के अहं, वरूण गाँधी प्रकरण एवं आम नागरिक की मूलभूत आवश्यकताओं को किनारे कर धार्मिक भावनाएँ आहत करने के साथ-साथ ड्गुलमुल रवैया से ऐसा लगता है कि यह पार्टी दो कदम आगे और चार कदम पीछे के सिद्धांत पर चल रही है । क्या प्रचार में अव्वल रहकर ही चुनाव जीत लेने की मंशा पाल लेना दिवास्वप्न नहीं तो और क्या है ? आज सभी को रोजगार, विकास, शांति और सुरक्षा चाहिये । । बसपा ने इस लोकसभा चुनाव से पहले पिछले विधानसभा चुनाव में ही बहुजन समाज से एक कदम आगे सर्वसमाज की परिकल्पना पर कार्य किया जिसका सुंदर परिणाम आया । उ० प्र० के विगत विधानसभा चुनाव में पूर्ण बहुमत के साथ उसने अपने बलबूते पर सरकार बनाई । डपोरशंखी और खयाली पुलाव पकानेवाले राजनीतिक पंडितों की उसने हवा निकाल दी । उसने अपने अहमियत को सिद्ध कर दिखाया है । कहावत है- “युद्ध और राजनीति मे सब कुछ जायज है ।” बसपा ने इस कहावत को अपने राजनैतिक शैली में पूर्णतः चरितार्थ किया है । इसमें कोई आश्‍चर्य नहीं कि गठबंधन की वर्तमान राजनीति में अपने अपेक्षित परिणाम और जिद की बदौलत मायावती प्रधानमंत्री बन जाए । बसपा, के बाद मैं काग्रेस की चर्चा करना चाहूँगा । राहुल गाँधी के हाथ में चुनावी कमान संभालने एवं दलित प्रेम के दिखावे का श्रेय उसे अवश्य मिलेगा । लेकिन बिना तैयारी के बिहार और उ० प्र० में आयाराम-गयाराम को ट्कट से नवाजकर उसने भारी भूल की है । गठबंधन के अतिविश्‍वसनीय घटक दल राजद और लोजपा ने अंतिम समय में उनसे किनारा कर अपनी अलग राजनीति अपनाई और कांग्रेस को बेचारा बनाकर छोड़ दिया । पंचमढ़ी सम्मेलन के निर्णय को एक तरफ रखकर उसने चुनाव किए है , वह उसके हित में कत्तई नहीं हो सकता है । चुनाव परिणाम में क्षेत्रीय दलों की भूमिका ही निर्णायक होगी । भयमुक्‍त होकर मतदान में जनता को अवश्य भाग लेना चाहिए । इस बार निश्‍चित रूप से मतदान प्रतिशत बढ़ने की उम्मीद है । लोकसभा में सुचारू, ईमानदार और बेदाग प्रतिनिधियों के आने से राजनीति में शुचिता और पारदशिता आएगी । स्वस्थ लोकतंत्र के लिए यह अत्यावश्यक है । इसलिए हम सबों के यह जिम्मेदारी बनती है, कि इस चुनावी महापर्व में अवश्य शामिल हों तथा अन्य को भी मतदान देतु उत्प्रेरित करें । अपने कर्तव्य को जिम्मेदारीपूर्वक वहन करके ही हम सशक्‍त एवं विकसित राष्ट्र की परिकल्पना कर सकते हैं ।