पिछले दिनों जापान में आई भीषण त्रासदी सुनामी व भूकंप के रूप में प्रकृति का एक खौफनाक चेहरा उभरकर आया है । अलबत्ता इसे बहुत से लोग १९ तारीख की रात्रि को आने वाली पूर्णिमा से जोड़ रहे हैं, जिसमें चन्द्रमा पृथ्वी से काफी निकट कहा जायेगा । बहुत से ज्योतिष व खगोलविद भी इस बात की चर्चा कर रहे हैं, लेकिन देखा जाये तो ये भयानक त्रासदी पूर्णिमा से ९, १० दिन पहले घटित हुई है । चंद्रमा २७ दिन ३ घंटे में पृथ्वी का एक चक्कर लगा लेता है और पूर्णिमा के १० दिन पहले चंद्रमा और पृथ्वी की दूरी सामान्य तौर पर ही थी इस घटना का चंद्रमा से या पूर्णिमा से पृथ्वी पर कोई भी भौगोलिक परिवर्तन का आधार ज्योतिषीय ढंग से नहीं साबित होता है । यह बात अवश्य है, कि पूर्णिमा के समय में समुद्र में ज्वार-भाटा उत्पन्न होना संवेदनशील प्राणियों में संवेदना के वेग का बढ़ना आदि नजर आता है । पर इतनी बड़ी घटना को पूर्णिमा से जोड़े जाने का कहीं से भी औचित्य नहीं बनता ।
संसार तीन तरह की शक्तियों के संयुक्त बन्धन से संचालित हो रहा है, जिसको स्थूल रूप से तीन वर्गों में बाँट कर समझ सकते हैं, पहला भौतिक आधार पर वात, पित्त और कफ आध्यात्मिक आधार पर ब्रम्हा, विष्णु और महेश और वैज्ञानिक रूप से प्रोटान, इलेक्टॉन, व न्यूट्रॉन की बाइन्डिंग एनर्जी इन्हीं के आधार पर यह सृष्टि पदार्थ रूप में साकार दिखाई देती है । इन तीनों शक्तियों में जब संतुलन बिगड़ता है, तो प्रकृति की अप्राकृतिक आपदाएं होती हैं । वर्तमान समय में गोचर के ग्रहों की व्याख्या करेंगे तो हम पायेंगे कि कुंभ राशि में ही गुरू व मंगल का एक साथ मजबूत होना तथा शनि का मंगल व सूर्य से षडाष्टक योग बनाना एक भौगोलिक असंतुलन का तो सूचक है ही साथ ही साथ २०१० में जब सूर्य की मेष संक्रान्ति हुई थी उस समय ग्रह स्थिति के कारण जैसे मेष लग्न का शुक्र लग्न में पाया जाना साथ ही छठें घर में शनि की वक्रीय स्थिति शुक्र, शनि के साथ षडाष्टक योग बनाते हुए अकारक योग का सूचक है । और ऐसे में मंगल लग्नाधिपति जो पृथ्वी का बड़ा ही कारक ग्रह माना जाता है । उसका नीच राशि कर्क में कमजोर होना तथा उसके साथ चन्द्रमा का मीन राशि में मूलत्रिकोण का संबंध बनाना एक भारी प्राकृतिक आपदा विशेषकर सुनामी व भूंकप का असंतुलन तो दिखाई दे रहा है, साथ ही इस चक्र के नवमांश को ध्यान से देखें तो वृश्चिक लग्न राशि का नवमांश बन रहा है । चतुर्थ भाव में शनि व चन्द्रमा तथा द्वादश भाव में सूर्य, मंगल व राहु एक प्राकृतिक आपदा का सूचक है ।
इस चक्र के मुद्दा दशा में ध्यान दें तो जापान की यह घटना शनि की मुद्दा शुक्र की अन्तर मुददा में घटी है, यानि यहां पर हम स्पष्ट रूप से कह सकते हैं कि २०१० के सूर्य के मेष संक्रान्ति में बने चक्र के अनुसार अकारक कफ़स ग्रह काफी मजबूत अवश्था में है । और आग्नेय तत्व के कारक ग्रह सूर्य, मंगल व वृहस्पति जो कि बचाव ग्रह में है, काफी कमजोर स्थिति में दिखाई दे रहे हैं इस कारण यह घटना घटी । साथ ही साथ उस समय की मंगल की स्थिति से घटना के मंगल की स्थिति आठवें स्थान की है, जो कि और ज्यादा खराब बनती है । इस कारण से यह घटना ग्रहों के असंतुलन के कारण घटी है, ना कि चन्द्रमा के निकटता के कारण घटी है । अलबत्ता इस घटना को घटाने में चन्द्रमा एक कारक ग्रह हो सकता है, लेकिन सारा दोष चन्द्रमा का नहीं है । इसमें मुख्य दोष मंगल का दिखाई दे रहा है । भूकंप तथा प्राकृतिक आपदाएं २०११ में पुनः एक बार २६ दिसम्बर २०११ से १३ अप्रैल २०१२ के बाद पुनः प्राकृतिक आपदाओं के लक्षण दिखाई दे रहे हैं । यह सर्वाधिक खराब समय ४ जनवरी २०१२ से १२ जनवरी २०१२ के बीच में ३ मार्च से १२ मार्च के बीच दिखाई दे रहा है ।
यह एशियाई देशों में विशेषकर मुस्लिम बस्तियों में तनाव, युद्ध के कारण कुछ घटनाएं तो घटेंगी साथ ही कुछ अप्रत्याशित घटनाएं घट सकती हैं । विश्व में दो जगह विशेष सावधानी बरतनी चाहिए । पहला तो पश्चिम उत्तर के कुछ देशों में, दूसरा दक्षिण पूर्वी कुछ देशों को शांति व धैर्यपूर्वक इस घटना के ना घटने का उपाय करना चाहिये ।
Saturday, March 19, 2011
Friday, March 4, 2011
Saturday, October 9, 2010
मेरा दिल है बड़ा उदास

मेरा दिल है बड़ा उदास.
आओ पापा मेरे पास
मेरा दिल है बड़ा उदास
मम्मी की भी याद सताती
भैया को मैं भूल न पाती.
तुमसे मैं कुछ न मांगूगी
पढने मे प्रथम आउंगी
रखो मुझको अपने पास
मेरा दिल है बड़ा उदास.
नहीं सहेली संग खेलूंगी
गुडिया को भी बंद कर दूंगी
बैठूंगी भैया के पास
मेरा दिल है बड़ा उदास.
जाओगे जब कल्ब मे आप
मम्मी को ले कर के साथ
रह लुंगी दादी के पास
मेरा दिल है बड़ा उदास.
नहीं चाहिए चोकलेट टाफी
नहीं चाहिए मुझको फ्राक
मम्मी पापा मुझे चाहिए
मेरा दिल है बड़ा उदास.
राजा रानी के किस्से
भगवान की प्यारी बात
दादी हमको रोज सुनाती
आती मुझको उनकी याद.
बुआ से छोटी करवाना
चाचा के संग बाज़ार जाना
जिद नहीं मैं कभी करुँगी
पापा मुझको घर ले जाना.
कहना मानूँ दूध पियूंगी
घर की छत पर नहीं चढूँगी
घर ले जाओ मुझको पापा
हॉस्टल मे मैं नहीं पढूंगी.
Monday, September 27, 2010
सुर साम्राज्ञी की 81 वीं सालगिरह
लता मंगेशकर जिन्हें हम सुर की साम्राज्ञी के नाम से जानते हैं प्यार से लोग इन्हें दीदी बुलाते हैं । कहा जाता है कि सरस्वती इनके गले में विराजमान हैं । इनका जन्म 28 सितंबर 1929 को पिता- दीनानाथ मंगेशकर के घर इंदौर में हुआ था । लता जी चार बहन और एक भाई हैं । इन्हें क्रिकेट देखना और खाने में मछली एवं कोल्हापुरी मटन पसंद है । इन्हें डायमंड एवं सफेद छींटेदार साड़ी पहनना ज्यादा अच्छा लगता है । इनका जीवन काफी संघर्षपूर्ण रहा है । १९४२ में पिता की मृत्यु के पश्चात् मात्र १३ साल की उम्र में ही इनपर घर की जिम्मेवारी आ गई । उस समय लता जी की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी, सो घर की जरूरतों को पूरा करने के लिए इन्होंने फिल्मों की तरफ रूख किया और गायकी को अपना पेशा बनाया ।
कैरियर के शुरूआती दौर में सबसे पहले इन्हें मराठी फिल्म में गाने का मौका मिला, लेकिन इन्हें पहचान मिली 1945 में महल फिल्म के गीत... ‘आयेगा आनेवाला’, से फिर इन्होंने पीछे पलटकर नहीं देखा और एक से बढ़कर एक गीत गाए ।
इन्होंने इस दौर के प्रमुख संगीतकार मदन मोहन, सलिल चौधरी, एस.डी. बर्मन, नौशाद, आर.डी.बर्मन, लक्ष्मीकांत प्यारेलाल से लेकर वर्तमान के संगीतकार अनु मलिक, जतिन ललित, ए.आर.रहमान, नदीम श्रवण के साथ गीत गाये हैं । लगभग सात दशक तक २० भाषाओं में ४० हजार गीत गाकर इन्होंने एक अलग कीर्तिमान स्थापित कर लिया है । कहा जाता है कि अपने समय की मशहूर नायिका मधुबाला लता जी के गायिकी की इतनी दीवानी थीं कि अपने फिल्म डॉयरेक्टर से कांटेक्ट में लिखवाती थी कि लता जी ही मेरे लिए गायेंगी । लता जी ने पुणे में अपने पिता के नाम से हॉस्पिटल बनवा रखा है, और वर्तमान में एक और कैंसर अस्पताल बनवा रही हैं जहाँ गरीबों का कम फीस पर इलाज किया जाता है । इससे पता चलता है कि लता जी समाज सेविका भी हैं ।
फिल्मी जगत का शायद ही कोई पुरस्कार है, जो इन्हें ना मिला हो, इन्हें नेशनल पुरस्कार, फिल्मफेयर पुरस्कार, पद्म भूषण पुरस्कार, दादा साहेब फालके पुरस्कार, भारत रत्न, महाराष्ट्र रत्न, राजीव गाँधी पुरस्कार, लाईफ टाईम अचीवमेंट पुरस्कार, गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड में सबसे ज्यादा गीत गाने के लिए नाम रेकॉर्ड, आदि तमाम पुरस्कार इनको मिल चुके हैं । गायकी को अपना जीवन समझने वाली लता जी आज भी गाये जा रहे गानों में अपनी आवाज दे रही हैं । अभी हाल ही में इन्होंने ‘जेल’ एवं ‘रब ने बना दी जोड़ी’ के लिए अपनी आवाज दी और उम्मीद है कि आगे भी गाती रहेंगी ।
लता जी को जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएँ.......................।
Friday, September 24, 2010
जीवन एक अनंत धरातल
जीवन एक अनंत धरातल
हम है इसका एक छोटा तल
कभी है अवतल कभी है उत्तल
कभी अभिन्न इसी सा समतल
जीवन एक अनंत धरातल
कभी बहुत आनंद समेटे
कभी दर्द की आहट लेके
आता जाता आज और कल
जीवन एक अनंत धरातल
जो बिक जाये दाम उसीका
झूठा जो है नाम उसीका
जो न बिका बेकार है यहाँ
मिथ्या सब संसार है यहाँ
क्या ये सूखे सूखे उपवन
क्या ये बहती नदिया कल-कल
जीवन एक अनंत धरातल
जीवन एक अनंत धरातल
हम है इसका एक छोटा तल
कभी है अवतल कभी है उत्तल
कभी अभिन्न इसी सा समतल
जीवन एक अनंत धरातल
कभी बहुत आनंद समेटे
कभी दर्द की आहट लेके
आता जाता आज और कल
जीवन एक अनंत धरातल
जो बिक जाये दाम उसीका
झूठा जो है नाम उसीका
जो न बिका बेकार है यहाँ
मिथ्या सब संसार है यहाँ
क्या ये सूखे सूखे उपवन
क्या ये बहती नदिया कल-कल
जीवन एक अनंत धरातल
जीवन एक अनंत धरातल
Wednesday, September 22, 2010
किसका वजूद कितना पक्का राममंदिर या बाबरी मस्जिद का?

एक बार फिर से हमारा देश भारत अपने आप को इतने विकास और उत्थान के बावजूद भी भावनात्मक विवादों की लड़ाइयों के आगे अपने आप को उबार नहीं सकेगा ?
क्योंकि यह एक ऐसा मुद्दा है, जिसमें कुछ भी टिप्पणी करना आसान नहीं होगा । हम आज जिस फैसले का इंतजार कर रहे हैं, वो वास्तव में क्या दोनों के वजूद को साबित करने के लिए पुख्ता है? अगर नहीं तो ऐसे मामले न्यायालयों में या संगठनों के सहयोग या सलाह से नहीं सुलझाए जा सकते?
सबसे बड़ा सवाल इस मुद्दे का यह है कि अयोध्या का नाम अगर आज भी अयोध्या है, तो वह एक इत्तफ़ाक नहीं हो सकता । अगर वास्तव में बाबर ने वहां मंदिर न तोड़कर वहां मस्जिद का नये रूप से निर्माण करवाया तो उस पर विवाद कैसा? अगर उस मस्जिद पर विवाद है? तो और मस्जिदों और मंदिरों पर क्यूं नहीं?
आज सब लोग जो चाहें हिन्दू सम्प्रदाय से जुड़े हों या मुस्लिम समुदाय से, इन सब चीजों को मुद्दा बनाना महज एक समुदाय का दूसरे समुदाय के प्रति घृणा पैदा करना है, न कि किसी का हित सोचना क्योंकि न तो हिन्दू समुदाय के हितकारी उसे मंदिर ही बनने देना चाहते न ही मुस्लिम समुदाय के वादी प्रतिवादी उसे मस्जिद ही रहने देना चाहते हैं । सबसे बड़ा प्रश्न यह भी है, कि हम आज भी इतिहास को कुरेदने की कोशिशों में लगे हुए हैं, जिससे भारतीय हमेशा आहत हुए हैं ।
हमारे ही कुछ लोग इस मुद्दे को हिन्दू और मुसलमानों के वजूद की लड़ाई से भी जोड़ने का प्रयास करते हैं, क्योंकि ये वो भली-भाँति जानते हैं, कि अगर हम इसे संप्रदाय से जोड़ते हैं तो हमारा लाभ अवश्य निकल आयेगा ।
बात वजूद की निकली है, तो किसका वजूद कितना पक्का है आप स्वयं इसका आंकलन कर सकते हैं? क्योंकि भारत जब मुगलों के द्वारा आहत हुआ तो न जाने कितने मंदिर टूटे होंगे, कितनी मस्जिदें बनी होंगी, पर उनमें से केवल अयोध्या में ही किसी मस्जिद का नाम बाबरी मस्जिद क्यूं है? अगर भारत का इतिहास और इतिहासकार इस बात की पुष्टि करते हैं, कि पहले मुगल भारत पर आक्रमण करने आये । और न जाने कितनी बार यहां के लोगों पर अत्याचार किया और इसे बार-बार लूटा । उन सारे मुगलों का एक ही मकसद था लूटना और यहां से धन चुराकर अपने प्रदेश वापस चले जाना । परन्तु इतिहास के पन्नों में बाबर एक ऐसा हमलावरी था जिसने अपना साम्राज्य यहां स्थापित किया । जिससे एक बात तो स्पष्ट हो ही चुकी कि वजूद पुराना बाबर का है, या भारत का?
उस भारत का जहां की सभ्यता दुनिया के अन्य देशों से काफी विकसित थी । उस भारत का जहां न कोई सम्प्रदाय हुआ करता था, न ही आपसी कोई टकराव । मुगलों से पहले का भारत और मुगलों के बाद का भारत काफी बदल चुका था । क्योंकि उससे पहले न कोई धर्म परिवर्तन ही हुआ था ना ही मस्जिदें तोड़कर मंदिर ही बने थे । हां ऐसा अवश्य होता था कि राम और रहीम सबके दिलों में होते थे न कोई राम और रहीम को अलग समझा, न ही रहीम या राम के नाम पर ईर्ष्या की ।
हम सब जानते हैं, पूरी दुनिया जानती है, कि अयोध्या राम की जन्म भूमि थी, और है । परन्तु इस तथ्य का न ही कोई सबूत है, न ही दिया जा सकता है? इस बात से मुस्लिम समुदाय जो इस मुद्दे में प्रतिवादी और वादी के रूप मे न्यायालयों में गुहार लगा रहे हैं, वह भी इस बात से इनकर नहीं करते कि अयोध्या ही राम की जन्मभूमि है, और आज की तारीख में अयोध्या ही दुनिया का एक मात्र ऐसा नगर है, जहां हर घर में राम-जानकी का मंदिर है ।
तो एक बात और स्पष्ट हो ही जाती है कि अयोध्या में मंदिर था या नहीं? हाँ विवाद यह है, जिसमें हिन्दू समुदाय बाबरी मस्जिद को ही राम मंदिर मानते हैं और उनके अनुसार प्राचीन राम मंदिर को तोड़कर बाबर ने बाबरी मस्जिद का प्रारूप दिया था, जबकि मुस्लिम समुदाय इस बात को मानने से बिल्कुल इन्कार करते हैं । तथा वो इस मस्जिद के बारे में यह बताते हैं, कि बाबरी मस्जिद का निर्माण बाबर ने नये रूप से खाली जगह में कराया था । जहां पर कोई भी मंदिर नहीं था । ना ही कोई मंदिर तोड़कर उसे मस्जिद बनाया गया ।

अगर विवाद के इतिहास पर नजर डालें तो इसको ६१ साल लगभग हो चुके हैं । विवाद की शुरूआत २२-२३ दिसम्बर १९४९ से हुई थी, जिसके तहत मस्जिद के अंदर चोरी छिपे मूर्तियां रखने से कथित तौर पर हुआ । और अब यह मुद्दा काफी तूल पकड़ चुका है, जिसका निर्णय उच्च न्यायालय के हाथ में है । अगर देखा जाय तो दर्जनों वाद बिंदुओं पर फैसला आना है, लेकिन मुख्य मुद्दा ये है, कि वहां पहले राम मंदिर था या बाबर ने मस्जिद रिक्त जगह में बनवायी थी ।
बाबरी मस्जिद और विवादित घटना क्रम ः
१ * मस्जिद के अन्दर मूर्तियां रखने का मुकदमा पुलिस ने अपनी तरफ से करवाया जिसकी वजह से २९ दिसम्बर १९४९ में मस्जिद के कुर्की के बाद ताला लगा दिया गया और तत्कालीन नगरपालिका अध्यक्ष प्रिय दत्त राम के देख-रेख में मूर्तियों की पूजा की जिम्मेदारी दे दी गयी ।
२ * १६ जनवरी १९५० में हिंदू महासभा के कार्यकारी गोपाल सिंह विशारद ने मूर्तियों की पूजा के लिए सिविल कोर्ट में अर्जी दायर की जिसके फलस्वरूप सिविल कोर्ट ने पूजा आदि के लिए रिसीवर व्यवस्था बहाल रखी ।
३ * १९५९ में निर्मोही अखाड़ा ने अदालत में तीसरा मुकदमा दर्ज किया जिसमें कोर्ट से यह अपील थी कि उस स्थान पर हमेशा से राम जन्म स्थान मंदिर था, और वह निर्मोही अखाड़ा की संपत्ति है ।
४ * १९६१ में सुन्नी बम्फ बोर्ड और कुछ स्थानीय मुसलमानों ने चौथा मुकदमा दायर किया जिसमें यह जिक्र था कि बाबर ने १५२८ में यह मस्जिद बनवायी जो १९४९, २२/२३ दिसम्बर तक यहां नमाज अदा किया गया है ।
५ * मुस्लिम पक्ष का तर्क यह था कि निर्मोही अखाड़ा ने १८८५ के अपने मुकदमे में केवल राम चबूतरे का दावा किया था न कि मस्जिद पर जिससे मुस्लिम पक्ष राम चबूतरे पर हिंदुओं के कब्जे और दावे को स्वीकार करता है ।
६ * और मुस्लिम पक्ष यह भी मानता है कि अयोध्या राम की जन्मभूमि भी है । परन्तु बाबरी मस्जिद खाली जगह पर बनायी गयी थी न की तोड़कर ।
७ * लगभग ४० सालों तक यह विवाद लखनऊ तक ही था, परन्तु १९८४ में विश्व हिन्दू परिषद और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सहयोग से राम जन्मभूमि मुक्ति यज्ञ समिति ने इसे राष्ट्रीय मंच पर एक अभियान की तरह ला खड़ा किया ।
८ * १९८६ में स्थानीय वकील उमेश चन्द्र पाण्डेय की दरख्वास्त पर जिला जज फैजाबाद के.एम. पाण्डेय ने विवादित परिसर खोलने को एकतरफा आदेश दे दिया, जिसकी तीखी प्रतिक्रिया मुस्लिम समुदाय के तरफ से हुई ।
९ * फरवरी १९८६ में बावरी मस्जिद संघर्ष समिति का गठन हुआ और मुस्लिम समुदाय ने संघर्ष शुरू कर दिया ।
१० * १९८९ में राजीव गाँधी ने चुनावी रैली को संबोधित किया जिसमें उन्होंने वहां की जनता को फिर से रामराज्य के सपने दिखाये । उसी समय विश्व हिन्दू परिषद ने वहां मंदिर का शिलान्यास भी कराया ।
११ * ९० के दशक में यह मुद्दा राजनीतिक मोड़ ले चुका था जिसमें राजीव गाँधी ने तथा अन्य पार्टियां जैसे भारतीय जनता पार्टी ने भी इसे राजनीतिक हवा देने की कोशिश की ।
१२ * १९९० में कुछ राम भक्तों ने मस्जिद पर धावा भी बोला जिससे मस्जिद कुछ आहत भी हुआ ।
१३ * ६ दिसंबर १९९२ में देशव्यापी हिंन्दुओं ने बढ़-चढ़कर भाग लिया तथा मस्जिद के गुबंद को ध्वस्त कर दिया, जिसके फलस्वरूप जगह-जगह पर दंगे हुए, जिसमें काफी लोग मारे भी गये ।
१४ * २००२ में एक बार फिर से देशव्यापी कार सेवकों ने अयोध्या चलो आंदोलन के तहत भाग लिया । परन्तु साधन व्यवस्था और सरकार के प्रयास से अयोध्या में कोई विवाद नहीं हुआ लेकिन गुजरात की तरफ लौटने वाले कार सेवकों को मुस्लिम समुदाय के हमले का शिकार होना पड़ा ।

इन सारी घटनाओं से यही निष्कर्ष निकलता है, कि यह मुद्दा न तो ६१ साल पुराना है, न ही किसी समुदाय के पक्ष का न ही विपक्ष का और ना ही किसी का वजूद ही पक्का होना है । हां एक बात तो अवश्य तय है, कि निर्णय किसी के भी पक्ष में क्यों न जाये, इसे न तो वहां मस्जिद बनना है, न ही मंदिर ।
क्योंकि अगर फैसला मस्जिद के पक्ष में जाता है, तो हिन्दू समुदाय उस फैसले को स्वीकार नहीं करेगा, और अगर फैसला हिंदू समुदाय के पक्ष में जाता है, तो मुस्लिम समुदाय उसे नहीं स्वीकार करेगा । क्योंकि ये ऐसे मुद्दे हैं जिसका फैसला वहां के लोग करेंगे, इस देश की जनता करेगी, और जनता सिर्फ शांति चाहती है । न तो वह दंगा चाहती है, न ही एक समुदाय का दूसरे समुदाय से घृणा ही जानती है । और हम तो उस देश के रहने वाले हैं, जहां पर हमारे लिए प्रेम ही सबकुछ है? हम उस मंदिर और मस्जिद के लिए क्यों लड़ें, जो हमारे अपनों के ही कब्र के ऊपर बनी हो? हम ऐसे उस राम और रहीम को उन मंदिर मस्जिदों से मुक्त कर देना चाहते हैं, जो कि विवादित ढांचों में बसते हैं ।
हम उस राम, रहीम को अपने हर भाईयों के हृदय में देखना चाहते हैं, जहां एक ही हृदय में मंहिर भी हो, मस्जिद भी, गिरजा घर और गुरूद्वारा भी-
क्योंकि मंदिर और मस्जिद का वजूद हमारे और आपसे है । हम रहेंगे तो मंदिर में भी नमाज अदा कर लेंगे, हम रहेंगे तो मस्जिद में भी दीप जला लेंगे और हमारे राम रहीम भी तो यही कहते हैं-
“मोको कहाँ ढूंढ़े है बंदे, मैं तो मेरे पास में.........”
Tuesday, September 21, 2010
उद्घाटन से पहले टूटा पुल

उद्घाटन से पहले टूटा पुल
लाखों का निकला टेंडर और जेबें हो गयीं फुल
उद्घाटन से पहले देखो टूट गया था पुल
जनता के मेहनत की कमाई इस पुल में हुई बर्बाद
पर किसी के घर बन गये कोई हुआ आबाद
लाखों का निकला टेंडर और जेबें हो गयीं फुल
उद्घाटन से पहले देखो टूट गया था पुल
जनता के मेहनत की कमाई इस पुल में हुई बर्बाद
पर किसी के घर बन गये कोई हुआ आबाद
पुल से नदी पार करने का सपना मन में थे संजोए
सोच रहे थे उनकी ख़ुशियों को किनकी लग गई हाए
नहीं पता इन्हें की क्या टूटे पुल की कहानी
घटिया सा सामान लगाया खूब करी मनमानी
सोच रहे थे उनकी ख़ुशियों को किनकी लग गई हाए
नहीं पता इन्हें की क्या टूटे पुल की कहानी
घटिया सा सामान लगाया खूब करी मनमानी
पुल से ज़्यादा इनको चिंता कमीशन की सताई
सोच रहे थे ज़्यादा से ज़्यादा इससे करो कमाई
बना के तैयार कर दी इन्होंने जिंदा लाश
पैसे देकर आकाओं से पुल कराया पास
सोच रहे थे ज़्यादा से ज़्यादा इससे करो कमाई
बना के तैयार कर दी इन्होंने जिंदा लाश
पैसे देकर आकाओं से पुल कराया पास
सजी खूब महफ़िल थी उस दिन हाउस हुआ था फुल
नेता जी फीता काटें उससे पहले टूटा पुल
सभी के सपने ऐसे टूटे जैसे टूटे काँच
नेता जी कह के चल दिए की कराओ इसकी जाँच
जनता को दे जाँच का लॉलीपाप मामला किया था गुल
देशद्रोही फिर मिल बैठे बनाने को नया पुल
सोच रहा राजीव की ऊपर वाले ने किया एहसान
जो पुल टूटता बाद में तो जाती कितनी जान
नेता जी फीता काटें उससे पहले टूटा पुल
सभी के सपने ऐसे टूटे जैसे टूटे काँच
नेता जी कह के चल दिए की कराओ इसकी जाँच
जनता को दे जाँच का लॉलीपाप मामला किया था गुल
देशद्रोही फिर मिल बैठे बनाने को नया पुल
सोच रहा राजीव की ऊपर वाले ने किया एहसान
जो पुल टूटता बाद में तो जाती कितनी जान
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