Monday, October 26, 2009

दरभंगा महाराज की तिजोरी खुली


मंत्रिमंडल सचिवालय विभाग की टीम के सामने चार घंटे की कड़ी मशक्‍अकत से गुरूवार को महाराजाधिराज रामेश्‍वर सिंह अभिलेखागार में रखी तिजोरी खोली गई ।
तिजोरी से १८वीं सदी में लिखा १२ खंड में अकबरनामा, राज घराने की २१ पीढ़ियों की वंशावली की मूल कापी, १९वीं सदी के कांग्रेसी नेताओं को लिखे पत्र, अंग्रेजों व राज घराने के बीच हुए इकरारनामे के कागजात समेत कई महत्वपूर्ण दस्तावेज मिले हैं । ये दस्तावेज काफी महत्वपूर्ण बताए जा रहे हैं, जिसकी छानबीन की जा रही है । ब्रिटेन में १८वीं सदी की चब कंपनी द्वारा निर्मित तिजोरी खोलने की कोशिश दिन के १०.४५ बजे शुरू हुई, २.४५ बजे इसे खोलने में सफलता मिली । इस समय बिहार राज्य अभिलेखागार निदेशालय के अभिलेख निदेशक डा. विजय कुमार सहायक निदेशक रवीन्द्र नाथ बैठा, स्थापना पदाधिकारी डा. बादशाह चौबे, पटना के खुदा बख्श लाइब्रेरी के पाण्डुलिपि विशेषज्ञ शकील अहमद शम्शी एवं स्थानीय क्षेत्रीय अभिलेखागार के पूरा अभिलेखापाल संजय खान के अलावा दंडाधिकारी सदर एसडीओ संजय कुमार सिंह मौजूद थे । इस मौके पर राज घराने के प्रबंधक अरूण कुमार, उनके प्रतिनिधि व पूर्व विधायक नीतीश्‍वर प्रसाद सिंह ने बताया कि १७३३ ईसवी में आलाउद्दीन नामक कातिब द्वारा लिखे गए १२ अंकों में अकबरनामा की मूल प्रति भी तिजोरी से मिली है । इसके अलावा सन १२०० ई. से दरभंगा राजघराने की २१ पीढियों की वंशावली के अलावा क्वीन विक्टोरिया ने महाराजाधिकाराज लक्ष्मेश्‍वर सिंह को जो ग्रेंड कमांडर आफ द आर्डर आफ ब्रिटिश एम्पायर की उपाधि दी थी, उस प्रशस्ति पत्र की मूल कापी भी टीम के हाथ लगी है । महाराजा महेश्‍वर सिंह की मृत्यु के बाद १८६२ में कोर्ट आफ वार्ड व राजघराने के बीच हुए महत्वपूर्ण इकरारनामे का दस्तावेज भी बरामद हुआ है । इस इकरारनामे में कहा गया था कि फिलहाल महाराजा लक्ष्मेश्‍वर सिंह नाबालिग हैं, इस कारण सारी संपत्ति की देखभाल कोर्ट आफ वार्ड करेगा । सिंह के बालिग होते ही पुनः सारी जायदाद घराने को सौंप दी जाएगी । १८७९ में यानी १७ वर्षों बाद कोर्ट ने इकरारनामा के मुताबिक ही काम किया । इसके अलावा मुगल बादशाह आलमगीर द्वितीय का फारसी में लिखा शाही फरमान का कागजात भी मिला है । महत्वपूर्ण दस्तावेजों में राजघराने द्वारा १९वीं शताब्दी की अगली पंक्‍ति के कांग्रेसी नेताओं को लिखे पत्रों की मूल कापी भी शामिल है । कांग्रेस पार्टी को घराने द्वारा दिए जा रहे आर्थिक सहयोग की चर्चा भी कई दस्तावेजों में मिली है ।

हमारा संकल्प



हमारा संकल्प (लक्ष्य) जो हिमालय की ऊंचाइयों से भी ऊँचा और बुलंद है, जहां हमें आज से काफी पहले पहुँच जाना था, परन्तु हम अपनी मनोकामनाओं की वजह से उसे पाने में असफल रहे । जिसका सारा श्रेय हमी को जाता है, और सिर्फ हमी को । जिसका परिणाम यह है कि हमारे पास हजारों मुश्किलें वही बनी हुई हैं । हम उन मुश्किलों में कमी लाने के बजाय और बढ़ा चुके हैं, तो प्रश्न यह उठता है, कि क्या हम अपने अतीत को भुलाकर एक नये भविष्य की नीव रखें, या उन घटनाओं से सबक लें जो अतीत में घटित हुईं । मेरा मानना है, कि नहीं हम एक नये भविष्य की बुनियाद तो जरूर रखेंगे, मगर अतीत की घटनाओं से जो परिणाम निकले, उसको भी दिमाग में रखेंगे । हम आज फिर वो गलतियां दोहराने की कोशिश कदापि नही करेंगे जो पहले हुईं । हम फिर से जयचंद को अवसर ही नही देगें, जो हमारी बर्बादी, हमारी संस्कृति की बर्बादी का कारण बन सके । हम ऐसे लोगों को भी अवसर नहीं देंगे, जो आजाद रहने पर सत्ता की बागडोर संभालते हैं । और गुलाम होने पर उनके सहकर्मी बन जाते हैं । हमें और इस देश को, इस समाज को ऐसे महानायकों की जरूरत है, ऐसे युवाओं की जरूरत है जो, अनुकूल और विपरीत परिस्थितियों में धैर्य के साथ, देश व समाज के विकास के प्रति स्थिर व क्रियाशील रह सकें । हम आज एक नई दुनिया (राष्ट्र) की बुनियाद रखेंगे, जिसमें नींव से लेकर गुम्बद तक की हर ईंट, हर वो कण कर्तव्यनिष्ठ, कर्मठी व ईमानदार होगा । यही होगा “हमारा संकल्प” राष्ट्र उत्थान का सामाजिक विकास व समन्वय का ।
हमारा संकल्प यह तय करेगा की, इसका नेतृत्व कौन करेगा ? कौन इसके सपनों को मंजिलों में तब्दील करेगा । हमारा संकल्प तब तक पूरा नहीं होगा जब तक इस समाज से, इस देश से उन लोगों का सफाया नहीं हो जाता । जो सत्ता लौलुपता की वजह से हमें तथा इस समाज व देश को बर्बाद करते जा रहे हैं । हमें रोकना है, उन सारे नेताओं को जो देश की सुरक्षा, व्यवस्था के बजाय अपनी सुरक्षा को ज्यादा महत्व देते हैं । जो हमारे आपके सहनशीलता व सांस्कृतिक होने का गलत इस्तेमाल करते हैं । हमारा संकल्प तब तक पूरा नहीं हो सकता, जब तक हम और आप उन लोगों को अवसर देना बन्द नहीं करते । हम सब कुछ जानते हुए भी शांत बने हुए हैं आज हमारे द्वारा चुने गए राजनेता हमें ही पशु ठहराते हैं, हमारी सहनशीलता को हमारी कायरता समझते हैं । हमारे आपके आमदनी की कटौती से अपनी सुविधाओं के लिए खर्च करते हैं । और हम उसे चुपचाप सहन कर जाते हैं, अगर नहीं सह सके तो दो चार गाली देकर दिल को तसल्ली दिला लेते हैं । अगर हमें अपना संकल्प पूरा करना है, तो हमें अपने आप में बदलाव लाना ही होगा । हमें अपनी जिम्मेदारियों को निभाना ही होगा । किसी महान विचारक ने इस प्रजातंत्र की व्याख्या इस प्रकार से की है -
प्रजातंत्र का अर्थ है, - हजार, लाखों, विद्वानों का नेतृत्व एक मूर्ख के हाथ में होना, जो आज सिद्ध होती दिख रही है । आज हम सारे नौजवान दोस्त जो, किसी न किसी कार्य में निपुण हैं, हम राजनीति, कानून, विज्ञान, सूचना, प्रौद्योगिकी, साहित्य बल, साहस में कुशल होते हुए भी, उन सारे लालची मुर्खों के नेतृत्व में हैं ।
अगर हमारा नेता मूर्ख है, तो इसका अर्थ यह है, की हम सारे लोग इसके लिए जिम्मेदार हैं, क्योंकि उसे अवसर हमने दिया है- एक छोटे उदाहरण से ये सारी बातें और भी स्पष्ट हो जाती हैं, वो है चुनाव ।
चुनाव चाहे सांसद का हो, विधायक का हो या ग्राम प्रधान का ही क्यों न हो, हम उसमें बिल्कुल दिलचस्पी नहीं रखते, हम अर्थात वो सारे लोग, जो चाहे नौजवान हो चाहे बुजुर्ग । जो कैरियर, सेवा, शिक्षा या किसी अन्य कारण की वजह से अपने-अपने क्षेत्रों से बाहर रहते हैं, उनके लिये यह चुनाव कोई मायने नहीं रखता, उनके लिए मायने रखता पर्व-त्यौहार जिसमें वो अपने-आप को उन अवसरों भर पर मनाते हैं । वो वोट को उन पर्व त्यौहारों से ज्यादा महत्व नहीं देते हैं । फिर परिणाम क्या होगा, वही लोग अवसर पायेंगे जो देश को खरीद-फरोख्त से लेकर इसके दामन में दाग लगायेंगे ।
अगर हमें अपने इस संकल्प को पूरा करना है, तो हमें चेतना लानी होगी उन सभी लोगों में । हमने कुछ दिन पहले अखबार में पढ़ा था, कि लालू यादव से प्रेस कान्फ्रेंस में पूछा गया कि आपके कारनामे अखबार में छपे हैं । इस पर आपके वोटरों पर क्या प्रभाव पड़ेगा ? तो उन्होंने जवाब में कहा था कि- हमारी वोटर तो वो जनता है, जो अखबार ही नहीं पढ़ती । आप स्वयं इसका आकलन कर सकते हैं, कि ऐसे राजनेता जनता को किस रूप में देखना चाहते हैं । ऐसे राजनेता हमें तथा उन जनता को शिक्षित भी नहीं देखना चाहते तो वो देश, राज्य व समाज का क्या विकास कर सकते है ः-
ऐसे हमारे और आपके बीच हजारों घटनाओं के उदाहरण अवश्य होगें ।
हमारी संकल्पना एक ऐसे निश्‍चय के रूप में होना चाहिये जिसमें हम किसी के साथ किसी भी प्रकार का समझौता न करें । हम अपने और गैर में फर्क न महसूस कर सकें क्योंकि आज का जो समय है, वह फिर नहीं आने वाला है ।
जीने के लिये मौत से सौदा नहीं करते,
नजदीकियों का भ्रम न हो, लग जायें पालने,
ये सोचकर लो गैर से पर्दा नहीं करते ।
जाते हुए समय ने यह कहकर विदा ली,
लौटेंगे इसी मोड़ पर वादा नहीं करते ॥
फिर भी हम आज जहां हैं, जिस स्थिति में हैं, वह अधिक संतोषजनक तो नहीं, परन्तु हम इसे कुछ समय के लिये संतोषजनक अवश्य समझ सकते हैं, क्योंकि हमारे ही देश के कुछ भागों में इसकी शुरूआत तो हो चुकी है, -
कोई भी देश, कोई भी समाज बेहतर नहीं होता है । उसे बेहतर बनाया जाता है । और बेहतर होते हैं, वहां के लोग । जो उसे बेहतर बनाते हैं । आज दुनिया में काफी बदलाव आ चुका है । हमें बदलाव के साथ अपने समाज को, देश को नयी दिशा देनी होगी , एक नई क्रांति लानी होगी जिससे देश को इन परिस्थितियों से उबार सकें । और विश्‍व पटल पर वर्चस्व स्थापित करें ।
इसको पाने के लिए हमें भले ही शांति ही भंग क्यों न करनी पड़े । हमें बुद्ध और गाँधी के वचनों को झुठलाना ही क्यों न पड़े । आज जरूरत है, देश को हमारी, और हम उम्मीद करते हैं, कि आप और हम एकजुट होकर तैयार हैं, इसके संकल्प को पूरा करने के लिए । अगर ऐसा हुआ तो, मैं उम्मीद करता हूँ की जो हमारे देश से वो सारी समस्यायें अवश्य दूर हो जायेंगी, चाहे वह भ्रष्टाचार का हो या आतंकवाद का, अशिक्षा का हो या भुखमरी का । वास्तव में देखा जाय तो सारी समस्याओं की जड़ है, कि कौन शुरूआत करे ? सबके अंदर एक उबाल है, जैसे लगता है कि एक बीमारी से सब पीड़ित हैं । सबकी स्थिति ठीक वैसे ही है -
“सीने में जलन आँखों में तूफान सा क्यों है,
इस शहर में हर शख्स परेशान सा क्यूं है? ”
जरूरत है, मार्गदर्शक की, कौन पहले उठे कौन दिशा निर्देश दे, कि हमें क्या करना चाहिए ?
अगर हमें अपना संकल्प पूरा करना है तो हम सबको आगे आना ही होगा । नींव की ईंट तो बननी ही पड़ेगी । क्योंकि बिना उस ईंट की इमारत मैं उम्मीद तो नहीं हो सकती । मैं उम्मीद करता हूँ, आप सभी से की आपमें से हर व्यक्‍ति जरूर तैयार होगा नींव की ईंट बनने के लिए । क्योंकि पूजन तो उसी ईंट की होता है, जो सबसे पहले इमारत में लगती है । बलिदान तो उसी का महत्वपूर्ण होता है । यह तो अलग ही बात है, कि उस पर नकासी नहीं होती उस पर सजावटें नहीं होतीं ।
मैं उम्मीद करता हूँ कि हमारा संकल्प एक ऐसा स्वप्न है, जो रात में सोने के वक्‍त नहीं देखा गया, बल्कि वो स्वप्न है जिसकी वजह से हम रात को सो नहीं पाते हैं । हमारा संकल्प एक ऐसी उम्मीद है, जिसको हमें हर कीमत पर सत्यार्थ करना ही होगा । इसको पाने के लिये हमें साहस, धैर्य, बलिदान व त्याग की जरुरत है । हमें अपने अन्दर से कायरता, द्वेष को नष्ट करना पड़ेगा । ” हमें अपने आप को खुद बदलना होगा, क्योंकि हम किसी दूसरे महापुरूष का अनुसरण तो दूर उसमें दिलचस्पी भी नहीं रखते । अगर ऐसा नहीं होता तो, गीता, कुरान पढ़कर महात्मा बुद्ध, गाँधी का अनुसरण करके आज हम कहाँ होते । मगर हम सिर्फ समस्याओं को समाप्त करने के बजाय दूसरे को जिम्मेदारी कहकर टालते चले जाते हैं । जिसका परिणाम हमें प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों ही रूपों में कहीं न कहीं अवश्य दिखता है । आज जरूरत है, हर व्यक्‍ति को कि वो समस्याओं से लड़े वह खुद ही गाँधी भी है, सुभाष भी है, और स्वयं गीता और कुरान का प्रतिनिधि भी, क्योंकि जब तक हम अपनी शक्‍तियों को अपने विद्वता को खुद नहीं समझेंगे, उस पर विश्‍वास नहीं करेंगे तब तक हम किसी समस्या का समाधान क्या किसी छोटे से कार्य को भी नहीं कर सकते ! स्वयं स्वामी जी ने कहा है,
``you can not believe God,
until you believe in yourself ''

तो जरूरत है । अपने आत्मविश्‍वास को जगाने की और लोगों में एक नयी-चेतना लाने की, जिससे हर व्यक्‍ति अपनी जिम्मेदारियों को समझते हुए, अपने कर्तव्य का पालन करे । तो वह दिन दूर नहीं होगा जिस दिन हमारा संकल्प पूरा होगा हमारी मंजिल हमें मिलेगी ।
जब एक छोटे से कार्य में परेशानियाँ आ सकती हैं, तो हम तो बहुत बड़े ही अभियान की शुरूआत करने जा रहे हैं तो, हमें परेशानियां तो अवश्य मिलेंगी । मगर उससे हमें विचलित नहीं होना चाहिए । और अन्त में मैं सिर्फ इतना ही कहूँगा -
मुश्किलें दिल के इरादे आजमाती हैं,
स्वप्न के वादे निगाहों से हटाती हैं,
हैं, सलामत हार , गिर कर ओ मुसाफिर
ठोकरें इंसान को चलना सिखाती हैं ।

अमेरिका में भारत, बिहार और मिथिला को प्रतिष्ठित किया संजय झा ने


बिहार के मधुबनी जिले में १९६३ में जन्मे संजय झा अमेरिका में सबसे ज्यादा वेतन पाने वाले मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) हैं । इंजीनियरिंग में बीएसपी की डिग्री ब्रिटेन के लीवरपूल विश्‍वविद्यालय से हासिल करने वाले झा ने अपनी बौद्धिक कुशलता के बल पर स्कॉटलैंड से इलेक्ट्रॉनिक एंड इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में ही पीएचडी की उपाधि प्राप्त की । इंजीनियरिंग कंपनी क्वालकॉम में १९९४ से अपने जीवन कार्य की शुरूआत करने वाले झा ने कंपनी के लिए आधुनिक मॉडेम व सेल साइट चिपसेट तैयार करने में प्रमुख भूमिका निभाई । अभियांत्रिकी सोच के अद्‌भुत धनी झा २००५ में सेमीकंडक्टर इंडस्ट्री एसोसिएशन के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स चुने गए ।
संजय झा ने फेबलेस सेमीकंडक्टर एसोसिएशन के वाईस चेयरमैन के रूप में भी कार्य कर अपनी क्षमता का परिचय दिया । झा ने प्रारंभ में सेन डिएगो में बुक ट्री कॉर्पोरेशन और जीईसी रिसर्च लैब लंदन में भी कार्य किया है । परन्तु इनकी अभियांत्रिकी प्रतिभा में असली निखार तो क्वालकॉम जैसी कंपनी में कार्य करके ही आया ।
संजय झा सीईओ, मोटोरोला
मोटोरोला में अपने कदम रखने से पहले झा क्वालकॉम के सीईओ पद पर नियुक्‍त थे । मोटोरोला में को-सीईओ तथा मोबाइल डिवाइस बिजनेस के सीईओ के रूप में वर्तमान में कार्य कर रहे झा को २००८ में, 10,44,45,529 डॉलर का वार्षिक वेतन प्राप्त हुआ । इतना बड़ा वेतन ही इनको विश्‍व के जनमंच में एक अलग व विशिष्ट स्थान दिलाता है । उनके वेतन का आंकड़ा यह भी बताता है कि अमेरिका के विकास में भारतीयों का योगदान उल्लेखनीय है । झा की तरह ही कई अन्य भारतीय भी अमेरिका में अपनी बौद्धिक कला कौशल का परिचय दे रहे हैं । भारतीय रूपए के हिसाब से झा के वेतन का आंकड़ा प्रतिवर्ष लगभग ५०० करोड़ बैठता है । झा का विवाह १९९१ में हुआ और वर्तमान में इनके तीन बेटे हैं । बिहार से निकलकर अमेरिका के व्यवसाय जगत की बुलंदियों पर पहुंचकर झा ने जो मुकाम हासिल किया है, वह औरों के लिए एक प्रेरणा हो सकती है ।
- शरद मिश्र

दलितराज में दलित की हत्या

आज दलित सत्तासीन ही अनुसूचित ज़ाति जनजाति अधिनियम को ख़तम करने, रिज़र्वेशन खत्म करने हेतु निजीकरण को बढावा दे रहे हैं । निजीकरण का अर्थ है जो रिज़र्वेशन का लाभ सरकारी संस्था से मिलता है वह निजी संस्था से नहीं मिलेगा । जनसंख्या दिन पर दिन बढ़ रही है । निजीकरण भी तेजी से हो रहा है तथा विभागीय पदों की संख्या घटा‌ई जा रही है । इसका सीधा प्रभाव दलित समाज पर पद रहा है । संवैधानिक अधिकारों का हनन हो रहा है । लोकतंत्र अब राजतन्त्र से भी बदतर हो गया है । आज समाज में दलितों, पिछडो, अल्पसंख्यकों तथा गरीबों को तिरस्कृत जीवन जीने हेतु विवस होना पड़ रहा है। कैसे पुन: बाबा साहब द्वारा निर्मित संविधान पर आधारित लोकतंत्र को और दलितों के अधिकारों को बचाया जा‌ए? कैसे दलित आन्दोलन को पुनर्जीवित किया जा‌ए ? बाबा साहब डॉ . बी०आर० आंबेडकर जी द्वारा अछूत एवं शूद्र कहलाने वाली जिन जातियों को एक शब्द में दलित समाज कहकर उनके समान विकास के लि‌ए जिस दलित आन्दोलन कि आधारशिला रखी गयी थी, वह दलित आन्दोलन आज कमजोर हो रहा है । कुछ स्वार्थवादी और मनुवादी विचारधारा रखने वाले दलित सत्तासीन नेता‌ओ जिन्होंने बाबा साहब की विचारधारा और उनके बौद्ध धर्म दर्शन का उपभोग कर सत्ता पा‌ई है , के दलित समाज से मुहं फेर लेने और मनुवादियों के साथ हाथ मिला कर दलितों के अधिकारों और उनके लि‌ए बने कानून का धीरे-धीरे अंत किये जाने के कारण दलित समाज घोर निराशा और पीड़ा के साथ फिर से अपना अस्तित्व अलग- अलग बिखेर कर ढूंढ़ रहा है।
जैसा कि डॉ . आंबेडकर ने दलितों को संगठित रहने को कहा था , ऐसे में दलित संगठन का टूटना दलित समाज के लि‌ए ही नहीं बाबा साहब द्वारा निर्मित संविधान और उसपर आधारित लोकतंत्र को भी खतरा पैदा कर देगा । संगठन से ही दलितों ने अपनी सत्ता हासिल की है । यह और बात है कि वह सत्ता दलित समाज के काम की नहीं रही। यदि व्यक्ति का एक हाथ काम करने योग्य न रहे तो व्यक्ति अपने दूसरे हाथ पर दोनों हाथों दायित्व डाल देता है ताकि उसे किसी की दया का पात्र न बनना पड़े, वह स्व आश्रित रहे अर्थात यदि एक दलित नेता ने समाज को धोखा दिया है और बाबा साहब का कद कम करने का प्रयास किया हैं सो समाज को समाज का दूसरा नेतृत्व खोजना चाहि‌ए न कि किसी दूसरे मनुवादी की स्वीकारनी चाहि‌ए । आज दलित सत्तासीन ही अनुसूचित ज़ाति जनजाति अधिनियम को ख़तम करने, रिज़र्वेशन खत्म करने हेतु निजीकरण को बढावा दे रहे हैं । निजीकरण का अर्थ है जो रिज़र्वेशन का लाभ सरकारी संस्था से मिलता है वह निजी संस्था से नहीं मिलेगा और जनसंख्या दिन पर दिन बढ़ रही है निजीकरण भी तेजी से हो रहा है तथा विभागीय पदों की संख्या घटा‌ई जा रही है । इसका सीधा प्रभाव दलित समाज पर पड़ रहा है और संवैधानिक अधिकारों का हनन और लोकतंत्र का बनता राजतन्त्र आज समाज में दलितों, पिछडो, अल्पसंख्यकों तथा गरीबों को तिरस्कृत जीवन जीने हेतु विवश कर रहा है । कैसे पुन: बाबा साहब द्वारा निर्मित संविधान पर आधारित लोकतंत्र को और दलितों के अधिकारो को पुनर्जीवित किया जा‌ए । "शिक्षित बनो संगठित रहो, और संघर्ष करो" : राजनीति ही हर विकास की कुंजी है । एकता की सोच के साथ जन संगठन क्या संभव नही कर सकता?
बहादुर सोनकर एक दलित अनुसूचित ज़ाति खटीक से सम्बन्ध रखते थे जिनकी निर्मम हत्या एक कटीले पेड़ से टांग कर की गयी । शहीद बहादुर सोनकर का गुनाह इतना था कि उन्होंने बाबा साहब डॉ. बी. आर. अम्बेडकर जी से मिली शिक्षा पर चलते हु‌ए दलित समाज का प्रतिनिधित लोक सभा द्वारा करने कि राह पकड़ जौनपुर लोकसभा सीट से प्रत्याशी के रूप में नामांकन किया था जो दलित राज में दलितों को ही रास न आया और खुद को अम्बेडकरवादी कह कर पूरे दलित समाज को मूर्ख बनाने वाले लोगो ने मनुवादियों के साथ मिल कर जातिवादी मानसिकता में एक दलित श्री बहादुर कि ही हत्या करवा दी । कटीले पेड़ पर टांग कर पूरे दलित समाज को सन्देश दिया कि दलित अब दलितों के ही गुलाम होंगे । शहीद बहादुर सोनकर हत्या मामले में क‌ई बार सरकार से मांग किये जाने के बाद भी कार्यवाही नहीं हु‌ई उनके परिवार के लि‌ए किसी धनराशि दि‌ए जाने की भी घोषणा नहीं हु‌ई जबकि एक रैली में मरने वाले को 5 लाख दि‌ए जाते रहे हैं । शहीद बहादुर खटीक के परिवार में उनके ०७ बच्चे हैं । सबसे बड़ा बेटा पोलियो ग्रस्त है जिसकी उम्र लगभग १८ साल होगी। उच्च न्यायालय में उनकी हत्या को आत्म हत्या सिद्ध करने के खिलाफ़ लडा‌ई डॉ. उदित राज और इंडियन जस्टिस पार्टी लड़ रही है।
for help State Bank of India Account of The All India Confederation of SC/ST Organisations no-30899921752

-गोपाल प्रसाद

Friday, October 2, 2009

आधुनिकता की होड़ में विलुप्त होते संस्कार

आज के भौतिकवादी परिवेश में हमारी महत्वाकांक्षाएँ भावनात्मक एवं प्राकृतिक कम आधुनिक एवं भौतिकवादी ज्यादा हो गयी है । ऐसा नहीं है कि हम आज भावुक नहीं है, पर ऐसा भी नहीं है कि हम अपने देश, धर्म, जाति और अपने सम्बन्धों से लगाव नहीं रखते, पर इन सबसे बढ़ करके हमारी प्राथमिकता भौतिक सफलता पर टिक गई है । इसका मुख्य कारण दो है -
(१) हमारे इर्द-गिर्द यह चमकती दुनियां और प्रत्यक्ष रूप से भौतिक आधार पर सफल दिखाई देने वाले लोग भौतिकता की चादर ओढ़े अपने को सफल व मजबूत साबित करते हुए हमें बार-बार अपनी तुलना में असफल और अयोग्य साबित करने का प्रयास करते हैं, जिसके कारण हमारे अन्दर जो वास्तविक भावनायें हैं वह दबी की दबी रह जाती हैं और इनके समक्ष हमारे अन्दर एक झूठी हीनता का जन्म होता है और इस हीनता की समाप्ति के लिए हम अनावश्यक एक झूठे चमक-दमक भरी भौतिकता की अंधी दौड़ में शामिल हो जाते हैं और इसके पीछे छोड़ देते उन वास्तविक भावनाओं को जो हमारे सम्बन्धों हमारी और देश के लिए हैं । हम उससे अलग इसी दौड़ में शामिल होकर अपने को सबसे अलग साबित करने में लगे रहते हैं, पर हमारी अन्तरात्मा इस अंधी दौड़ से कैसे तृप्त हो सकती है । आखिर वह कौन सी सफलता पा लेगी, जिससे उसे तृप्ति मिलेगी, क्योंकि इस अंधी दौड़ में हम शायद पैसा, चकाचौंध तो इकट्‌ठा कर लेंगे । लेकिन वह सम्बन्धों की एकता व पड़ोसियों का आपस के सुख-दुःख में शामिल होना व देश के लिए जान न्यौछावर करना, तथा सब कुछ खो देने के बावजूद भी भावनात्मक सुख पाना यह सब इस अंधी दौड़ से कैसे पायेंगे ? क्योंकि एक बात तो शाश्‍वत सत्य है कि इस दुनिया में सारे जीवमात्र भावनात्मक मिट्टी से बनते है और सभी को भावनात्मक तृप्ति की आवश्यकता है । यह बात दीगर है कि हमारी आधुनिकता की होड़ हमारी महत्वकाक्षाएँ औए एक-दूसरे से प्रतिद्वंद्विता हमारे सम्बन्धों के भावनात्मक बंधन को कमजोर करता है और आस-पास सभी रिश्तों में हमें प्रतिद्वंद्विता दिखाई देती है, क्योंकि हमारे मन मस्तिष्क में यह रहता है कि यदि हम भौतिक आधार पर सफल व सर्वोपरि, रहेंगे तो ही हमारी महत्ता रहेगी, अन्यथा हमारी उपेक्षा होने लगेगी ।
वास्तविकता में हम धैर्यहीन हो चुके हैं और त्याग की भावना खो चुके हैं इस भावना से हमें दूसरों की सफलता से खुशी नहीं मिलती क्योंकि अपने निकटस्थ सम्बन्धों की सफलता से ही पूर्णतः खुश नहीं होते हैं । ऐसा नहीं है कि हमारी महत्ता हमारी भौतिक सफलता में ही छिपी है । बल्कि हमारी महत्ता अपने सम्बन्धों में मधुर वाणी, प्यार के प्रदर्शन और अपने को दुख पहुँचाकर भी दूसरों को सुख देने में हैं, क्योंकि यह तो शा‍श्‍वत सत्य है कि प्यार के बदले प्यार ही मिलता है । यदि दुश्मन को भी प्रणाम करें तो वह आर्शीवाद नहीं देगा तो गाली भी नहीं देगी । यदि बार-बार प्रणाम करते रहोंगे तो धीरे-धीरे उसके मन की कटुता भी प्यार में तब्दील होने लगेगी लेकिन इसके लिए धैर्य रखते हुए प्रेम से ओत-प्रोत करना होगा ताकि कोई द्वेष अहम न रहे और तभी हम सच्ची तृप्ति व भावनात्मक सुख और इसके साथ ही ही मिलने वाली सफलताओं के सुखकामी एहसास कर पायेंगे नहीं तो इस आधुनिकता की होड़ में हम मशीन बनकर भावना रहित होकर एज-दूसरे से प्रतिद्वद्विता साबित करते रहेंगे और जब कभी थक जायेंगे तो अपने आपको अकेला और खाली जैसे जीवन को उद्देश्यहीन बिता देंगे ऐसा प्रतीत होगा, जैसे सब कुछ पा करके भी कुछ नहीं पाया और इस आधुनिकता की होड़ में अकेले तो हैं ही साथ ही साथ अपनी आने वाली नस्लों को भारतीय तहजीव व संस्कार भी नहीं दे पायेंगे जिसके आधार पर हमारे आजादी के स्वतंत्रता सेनानी अपने सुखों को भुलाकर त्याग की मिसाल कायम किये हैं वह तहजीब नहीं दे पायेगे जिसमें पूरा गांव एक-दूसरे के दुख-दुख में एक साथ खड़ा होता चला आयेगा । वह तहजीव नहीं दे पायेंगे जिसमें हिन्दू मुस्लिम एक साथ होली व ईद मनाया करते थे । आज जरूरत है हम सबको इस आधुनिकता की होड़ से निकलकर इन बातों पर सोचने की आज जरूरत है हम सबको उन तहजीबों को अपनी जिन्दगी में शामिल करने की, जिन्हें हम पीछे छोड़ते आए हैं । हमे जरूरत हैं महापुरूषों के जीवन में झाँकने की जिससे हमारी संस्कृतिक, सभ्यता भावनाएँ फिर से जिन्दा हो सकें ।
-कृष्णगोपाल मिश्रा

क्या रावण जल गया ?

अधर्म पर धर्म की विजय के रूप में प्रत्येक वर्ष विजयादशमी का त्यौहार मनाया जाता है । दुर्गा पूजा के अंतिम दिन अर्थात विजयादशमी को रावण का पुतला जलाया जाता है । संपूर्ण भारत में विजयादशमी का यह त्यौहार संपन्‍न हो गया परन्तु जाते-जाते कुछ संदेश भी छोड़ गया जिस पर गहन चिंतन की आवश्यकता है । १९८९ में केन्द्र सरकार के खिलाफ शुरू हुए विद्रोह के बाद पलायन के २० वर्षों तक कश्मीरी पंडितों को दशहरा मनाने का सिलसिला रूक सा गया था, परन्तु इस बार उन्हें कश्मीर में दशहरा मनाने को मंजूरी मिली । आतंकवाद के बावजूद कश्मीर न छोड़नेवाले ३२६५ कश्मीरी पंडितो के हितों के लिए संघर्षरत कश्मीरी पंडित संघर्ष समिति (केपीएसएस) ने इस साल विजयादशमी पर कश्मीर में रावण, मेघनाथ, कुंभकर्ण जलाने का फैसला किया था ।
राजौरी में रूखसाना नामक लड़की ने शक्‍तिरूपा दुर्गा का रूप धारण कर आतंकवादियों का बहादुरी से मुकाबला किया । साधारण गाँव की इस लड़की के घर में नवमी के रात्रि में तीन आतंकवादी घुस आए थे । इन आतंकवादियों ने रूखसाना के अपहरण करने की कोशिश की थी । रूखसाना दो साल पहले १० वीं में फेल होने के बाद से पढ़ाई छोड़ चुकी थी और साधारण स्थित अपने घर में रहती थी । पुलिस सूत्रों के अनुसार घर में घुसने के बाद आतंकवादियों ने रूखसाना को सौंपने की माँग की । रूखसाना के पिता नूर हुसैन, माँ राशिदा और भाई इजाज ने इसका विरोध करने पर आतंकवादी उन्हें राइफल की बट से मारने लगे । इससे गुस्साई रूखसाना ने कुल्हाड़ी उठाई और एक आतंकवादी को ढेर कर दिया, जो लश्कर-ए-तैबा का अबू ओसामा था । रूखसाना के वार से दूसरा आतंकवादी घायल हो गया । डीजीपी ने रूखसाना को इनाम देने का ऐलान किया है । इस घटना ने साबित कर दिया कि वास्तव में रावण को खत्म करने के लिए साहस और पराक्रम होना चाहिए । सभी नागरिकों में यह भावना जागृत होनी चाहिए । यहाँ एक रावण क्या करोड़ों रावण हैं । क्या सब रावण जल गया ? इंदौर में रावण का पारंपरिक पुतला न बनाकर इसे मुंबई हमलों में पकड़े गए आतंकवादी अजमल कसाब का रूप दिया । दशहरा उत्सव आयोजकों के अनुसार आज आतंकवाद हमारा सबसे बड़ा दुश्मन है । इसलिए हमने फैसला किया कि रावण की जगह पाकिस्तानी आतंकवादी कसाब का पुतला जलाया जाय । सरकार तो कसाब को सजा नहीं दे पाई लेकिन इस तरह हम अपनी भावनाएँ जता रहे हैं । ”
कसाब रूपी रावण का पुतला जलाया जाना इस बात का प्रतीक है कि आक्रोशित जनता की अभिव्यक्‍ति क्या रूप ले सकती है । दशहरा के मौके पर हरियाणा के बराड़ा कस्बे में दुनियाँ के सबसे लंबे रावण के १७५ फुट के पुतले को आग लगाई गई जिसे खड़ा करने में ही १२० फुट लंबी क्रेन की मदद लेनी पड़ी । स्थानीय रामलीला क्लब के अध्यक्ष तेजिन्द्र राणा के अनुसार जैसे-जैसे समाज में बुराईयाँ बढ़ रही हैं, वैसे-वैसे रावण का पुतला भी बड़ा किया जा रहा है ।
इधर कानुपर में दलितों ने रावण का पुतला जलाने के विरोध में रावण मेले का आयोजन किया और रावण की पूजा की । प्रश्न यह उठता है कि दलितों ने रावण को जलाने के बजाय रावण की पूजा क्यों की? यह शोध का विषय है कि अत्याचार, शोषण, भ्रष्टाचार और आतंकवाद के प्रतीक रावण को यहाँ महिमामंडित क्यों किया गया ? देश के रहनुमाओं, चिंतकों, समाजशास्त्रियों एवं इतिहासकारों को रावण के इर्द-गिर्द के तमाम प्रश्नों के हल तलाशने होंगे क्योंकि इन प्रश्नों के उत्तर एवं समाधान का सीधा संबंध हमारे राष्ट्र की एकता, अखंडता एवं संप्रभुता से है । रावण के पुतले को जलाने का सही और सापेक्ष संदेश समाज में अगर नहीं जा रहा है तो यह गंभीर चिंता का विषय है । पद, प्रतिष्ठा और पावर वाले व्यक्‍ति खुद को देश, कानून और उपर समझने लगता है । पावर का दुरूपयोग खबर तब बनती है जब आम जनता या तो बहुत अधिक सताई जाए या फिर पावर बनाम पावर का गेम खुलकर सामने आए । समय दर्पण परिवार की ओर से सभी को दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएँ ।
-GOPAL PRASAD : 09211309569

Thursday, October 1, 2009

शाबास युगरत्ना, देश को नाज है तुम पर

अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा से मिलने की युगरत्‍ना श्रीवास्तव की हसरत भले ही पूरी नहीं हो सकी परन्तु उसने अपने पिता डॉ० आलोक श्रीवास्तव को न्यूयॉर्क से लखनऊ फोन करके कहा- “पापा, एक दिन जरूर ऐसा आएगा जब जलवायु परिवर्त्तन की मेरी थ्योरी थीसिस वर्ल्ड के लोग सहमत होंगे । डॉ. श्रीवास्तव ने मोबाईल पर अपनी बिटिया की हौसला आफजाई की । उसके भाषण को सेंट फेडरिल विद्यालय के शिक्षकों और उसके सहपाठियों ने भी सुना । विद्यालय की शिक्षिका डेजी प्रसाद के अनुसार युगरत्‍ना इतनी ज्यादा प्रतिभाशाली है, यह हमें अब मालूम पड़ा । लखनऊ में कई संस्थाओं ने युगरत्‍ना को सम्मानित करने का निर्णय किया है । मात्र १३ साल की उम्र में संयुक्‍त राष्ट्र (यूएन) सम्मेलन को संबोधित करनेवाली युगरत्‍ना को उत्तरप्रदेश सरकार सम्मानित करेगी । राज्य के उच्च शिक्षा मंत्री डॉ. राकेशघर त्रिपाठी ने कहा है कि बालिका और उसके माता-पिता को सम्मानित किया जाएगा । उन्होंने कहा कि युगरत्‍ना ने देश, प्रदेश और लखनऊ का गौरव बढ़ाया है । युगरत्‍ना के पिता आलोक श्रीवास्तव लखनऊ के अलीगंज स्थित सुभाष चंद बोस पोस्टगेजुएट कॉलेज में वनस्पतिशास्त्र के रीड़र है । तेरह साल की भारतीय बालिका युगरत्‍ना ने दुनियाँ के तीन अरब बच्चों की ओर से आवाज उठाते हुए विश्‍व नेताओं से जलवायु परिवर्त्तन पर तुरंत कदम उठाने की अपील की है । जूनियर बोर्ड रिप्रेजेन्टेटिव के तौर पर युगरत्‍ना ने न्यूयॉर्क में संयुक्‍त राष्ट्र के सम्मेलन के उद्‌घाटन सत्र को संबोधित कर इतिहास रच दिया । जलवायु परिवर्त्तन के मुद्‌दे पर विचार करने के लिए जुटे दुनियाँ भर के नेताओं को भारत की १३ वर्षीय लड़की युगरत्‍ना श्रीवास्तव ने संबोधित किया । विश्‍व के तीन अरब बच्चों का प्रतिनिधित्व करते हुए युगरत्‍ना ने कहा “वैश्‍विक रूप में एक हरित कार्यकर्त्ता के रूप में जो जलवायु परिवर्त्तन और सतत विकास के बारे में जागरूकता फैलाने के लिए प्रयासरत हूँ । मैं जलवायु परिवर्त्तन को लेकर बेहद चिंतित हूँ । आज समय आ गया है कि ठोस कदम उठाए जाएँ और कोपेनहेगेन में एक संधि पर सहमत बनाई जाए क्योंकि मैं नहीं चाहती कि आनेवाली पीढ़ी वही प्रश्न पूछे जो आज मैं आपसे कर रही हूँ ।
युगरत्‍ना के पास विश्‍व के नेताओं से पूछने के लिए कई सवाल थे । उसने कहा, हिमालय की बर्फीली चोटियाँ पिघलती जा रही है । ध्रुवीय भालुओं की जान पर खतरा बढ़ता जा रहा है । हर पाँच में से दो लोगों को पीने का साफ पानी नहीं मिलता । धरती का तापमान बढ़ रहा है । फसलों की उत्पादन क्षमता में लगाकर कमी आ रही है । प्रशांत महासागर के जलस्तर में वृद्धि हो रही है । क्या हम आनेवाली पीढ़ी को ये समस्याएँ भेंट में देना चाहते हैं ? लखनऊ के एक स्कूल में कक्षा नौ की छात्रा युगरत्‍ना ने जोश और आत्मविश्‍वास से भरी जब भाषण दे रही थी तब खचाखच भरे सदन में मौजूद १०० से ज्त्यादा देशों के प्रतिनिधियों में सन्नाटा व्याप्त था । इस मौके पर यूएन महासचिव बान की मून, अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा, चीन के राष्ट्रपति हू जिंताओं, भारत के विदेशमंत्री एस. एम. कृष्णा सहित कई अन्य नेता मौजूद थे ।
एस्ट्रोफिजिक्स में कैरियर बनाना चाहती है युगरत्‍ना ः
न्यूयॉर्क में संयुक्‍त राष्ट्र महासभा के सम्मेलन में ग्लोबल क्लाइमेंट पर भाषण देनेवाली युगरत्‍ना एस्ट्रोफिजिक्स में कैरियर बनाना चाहती है । उसके पिता डॉ. आलोक श्रीवास्तव को बेटी की इस उपलब्धि पर गर्व है, लेकिन उनका कहना है कि पर्यावरण पर काम करना, भाषण देना यह सब उसकी एकस्ट्रा एक्टिविटी में शामिल है । उसके पसंदीदा विषय है कंप्यूटर और गणित । उन्होंने बताया कि युगरत्ना हमेशा से टॉपर रही है लेकिन न्यूयॉर्क में भाषण देने के लिए जब न्योता आया तो युगरत्‍ना को नवीं कक्षा की पाँच परीक्षाएँ छोड़नी पड़ी । यह अलग बात है कि सेंट फेडलिस स्कूल ने उसके लिए अलग से परीक्षा कराने की छूट दे दी है । वास्तव में युगरत्‍ना ने देश, प्रदेश एवं लखनऊ का ही नहीं बल्कि तमाम युवावर्ग व महिला वर्ग तथा प्रतिभाशाली व्यक्‍तित्व का नेतृत्व किया है । अतः इन सबों की ओर से उन्हें कोटिशः बधाई ।
(- गोपाल प्रसाद )