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Friday, December 4, 2009

साहित्य अकादेमी द्वारा आयोजित साहित्य मंच से अनुभूति की कविताओं की बारिश


साहित्य अकादेमी द्वारा आयोजित पुस्तक प्रदर्शनी के दौरान २ दिसंबर को रविन्द्र भवन प्रांगण में कवियों ने कविताओं की बारिश की . इस काव्यपाठ में गगन गिल(हिन्दी), अनुभूति चतुर्वेदी (हिन्दी), शाहीना खान (अंग्रेजी),नुसरत जहीर(उर्दू) ने भाग लिया .गगनजी की "थोडी सी उम्मीद चाहिये" ,शाहीना खान की मानवाधिकार पर अंग्रेजी कविता तथा नुसरत जहीद की गजल और नज्म "शाखों पर दरख्तों को कुर्बान नहीं करते" , "ख्वाबों में ही कुछ शक्ल आए तो आ जाए", " "मोहब्बत अब नही होगी"को सराहना मिली .
सबसे अंत में हिन्दी कवियित्री अनुभूति चतुर्वेदी की कविताओं ने ऐसा शमाँ बाँधा कि श्रोतागण भावविभोर हो गए .अनुभूति ने कहा कि मैं ऐसी कविता सुनाउँगी जो गरमी पैदा कर दे .उनकी कविता " वर्तमान राजनीति के संदर्भ में"-
"बरगद उग आए हैं /पूरे शहर को ढक लिया है/बर्षों से जी रहे हैं /फिर भी जीना चहते हैं और /जडें पाताल तक पहुँच गई हैं /डालें लटक गई हैं झुककर /पत्ते झड गए हैं /पीली पडती टहनियाँ /उनकी बीमारियों का खुला दस्तावेज है /न जाने कितनों ने अभी तक ,गिद्ध और चीलें पाली हुई हैं / अपनी हवस से यह ताजे उगते हरे पेडों को भी /मुरझा देना चाहते हैं / इन्हें हरी नरम पत्तियाँ /बहुत पसंद हैं/ खास तौर पर एकदम मुलायम/अभी -अभी खिली कलियाँ /कलियाँ तो क्या / पूरे शहर को ही लील जाना चाहते हैं /भूखे भेडिए.
संबंध पर यथार्थ चित्रण " पिता और उनके मित्र" कविता में ----
घर फोन किया था -पिता के स्वास्थ्य के लिए / भाभी ने बताया /थीक तो हैं लेकिन अभी भी कुछ -कुछ भूल जाते हैं / माँ भी अस्वस्थ रहती हैं -मैने पूछा/ क्या फोन आते हैं? /भाभी ने कहा ,थोडे-बहुत/ यों भी हमने फ़ोन कमरे से हटा दिया है/अच्छा किया ? / और ये फोन कम कैसे हो गए- मैंने पूछा/ भाभी बोली..../सभी ने पापा से अपने काम निकाल लिए / सारे रहस्य जान लिए मित्र बनकर/ अब उनको क्या लेना देना उनके स्वास्थ्य से / बात कितनी सही कही भाभी ने / सच है कि स्वार्थ का ही दूसरा रूप / रह गए हैं संबंध।
नए युग का विद्रूप चेहरा कुछ इस तरह प्रस्तुत किया अनुभूति ने-
दस्तक:इक्कीसवीं सदी
इक्कीसवी सदी की घोषणा /किसी बिगुल से नहीं /किसी नगाडे की थाप से नहीं /केवल जलती हुइ आग / बिषैला एटमी धुआँ /बिलखते भूखंड /स्वागत करते हुए उपस्थित हुए / एक कारवाँ इंटरनेट और/ परमाणुओं का / जाल की तरह बिछ गया / युद्ध के मौके का फायदा ले / किए दनादन वार/ खत्म हुए नगर के नगर / हरी -भरी बस्तियाँ ,जंगल/ कब्रिस्तान में बदल गए / किस्मत से एक बूढा बच गया / अचरज से देखने लगा / यह सभी दृश्य / और सहसा बोल उठा ../सचमुच मैं नरक में हूँ।
अनुभूति ने विदूषक को काव्य रूप में इस तरह प्रस्तुत किया--
तेवर क्यों बदल रहे हो ?/ क्यों अपने आप को मथ रहे हो?/मथ लो तब तक / जब तक कि जड ना हो जाओ/ एक बिदूषक से लग रहे हो / इन बदलती मुद्राओं में/ अब तो मैं सभी नाटकीय मुद्राओं का / आनंद लेती हूँ ।
अपनी कविता के माध्यम से सूर्य को आगाज किया अनुभूति ने-
यह भीगी हुई चादर हटाकर /अपनी प्रचंड उष्मा के साथ सामने आओ/ हे सूर्य! /और मुझे आलिंगनबद्ध कर लो /विश्व ने कब गर्भ दिया है / किसी वसुन्धरा को / सिर्फ छला है , बाँटा है ,रौंदा है/बीघा-बीघा मूल्य ,बीघा- बीघा स्वामित्व/ ये व्यापारी , ये ग्राहक क्या मुझे प्रेम देंगे? / हे सूर्य, बाहर निकलो इन श्रावणी परदों से / और अपने प्रचंड प्रकाश में / मुझे रोम - रोम नहला दो / छुओ मुझे अपनी प्रेम उष्मा से /और पूरे विश्व के सामने /अंकुरित करो मेरे स्वप्न शिशु।
अनुभूति की कविता " बेटे के लिए "
बेटा बोलने लगा है / बात करता है इस नए संसार की / जिसे वह धीरे -धीरे समझ रहा है/ पूछता है सवाल / फ़ुटबॉल, कुश्ती, समाज, कंप्यूटर/और आतंकवाद के संबंध में / इतनी कम उम्र में वयस्कों सी बुद्धि/ क्या वह उम्र से बहुत पहले ही , सब कुछ परखना चाहता है? / उसको जबाब न देने पर / और अपनी व्यस्तताओं में / मैं भूल जाती हूँ कि वह गुस्से में तोड फोड कर / फर्श को तोड- मरोड देगा/ फौलादी बन रहा है बेटा !
अनुभूति ने "सृजन" शक्ति को अनोखे रूप में प्रस्तुत कर वाहवाही बटोरी-
हजारों खून के कतरे गिरकर/ बनते हैं शब्द/और एक खूनी नदी में / मथकर / डूबकर / होता है सृजन।
संक्षेप में कहा जाय तो " अनुभूति ने अपनी कव्य प्रतिभा से सबों को प्रभावित किया क्योंकि उन्होने समसामयिक विषयों को बखूबी रूप में प्रस्तुत किया । अनुभूति चतुर्वेदी का सीधा सरोकार साहित्य और संस्कृति से रहा है । वह हिन्दी के विख्यात कवि , लेखक पद्मश्री जगदीश चतुर्वेदी की सुपुत्री हैं। अनुभूति साहित्य जगत में विगत ३० बर्षों से लिख रही हैं । उनके चार कविता संग्रह, एक कहानी संग्रह , एक उपन्यास हैं । उनकी कृतियों पर कई राष्ट्रीय, अन्तर्राष्ट्रीय सम्मान मिल चुके हैं ।अपनी संसथा पल्लवी आर्ट्र्स के द्वारा अनेक कवि , लेखक ,पत्रकार , चित्रकार, नर्तक, गायक , मूर्तिकार के कई पीढियों को जोडने का काम कर रही हैं । इसके अतिरिक्त ओडिसी में पिछले २२ बर्षों से वह साधनारत हैं । अपने नृत्य का उन्होने देश- विदेशों में सफल प्रदर्शन किया है । इराक के बेबिलोन सम्मेलन में चित्रकार ,कवियों को लेकर वह भरत का प्रतिनिधित्व कर चुकी हैं । लंदन में दो बार भारत के साहित्य , संस्कृति का प्रतिनिधित्व किया है ।

गोपाल प्रसाद
संपादक, समय दर्पण
mob:9289723145
gopal.eshakti@gmail.com

Friday, November 6, 2009

वेबसाईट तो है पर देखेगा कौन?

सूचना तकनीक का प्रभाव तेजी से बढ़ रहा है । सब कुछ हाईटेक होता जा रहा है । सरकारी एवं गैरसरकारी सभी विभागों को धीरे-धीरे कम्प्यूटराईज्ड किया जा रहा है ताकि समन्वय और पारदर्शिता कायम हो सके । आज अपने या अपने विभाग/कंपनी के बारे में हर कोई वेबसाईट के माध्यम से भी जानकारी दे रहा है ताकि उससे संबंधित जानकारी कोई भी प्राप्त कर सके, परन्तु क्या केवल वेबसाईट बना देने भर से काम समाप्त हो जाएगा? सर्च इंजन काफी वेबसाईटों को नहीं दिखा पाते या सबसे अंत में दिखाते हैं । अगर आप चाहते हैं कि आपके बेवसाईट को दिखाने में सर्च इंजन प्राथमिकता दें तो आपको कुछ और भी तैयारी करनी पड़ेगी । अपने वेबसाईट पर ज्यादा से ज्यादा हिट्‌‍स बढ़वाने हेतु आपको बल्क एस.एम.एस. और बल्क ईमेल प्रोग्राम से जुड़ना पड़ेगा ताकि अधिकतम लोगों तक आप अपने बेवसाईट की उपयोगिता के बारे में बता सकें । इस प्रचार में सोशल कम्युनिटी की वेबसाईट (ऑर्कुट, फेसबुक, ट्विटर, नेटलॉग आदि) भी काफी उपयोगी हो सकता है । आपकी ड्रॉफ्टिंग काफी सरल एवं संक्षिप्त हो यह अवश्य ध्यान दिया जाना चाहिए । इसके साथ ही अलग-अलग लिंक को कॉपी पेस्ट कर भी ड्राफ्ट नोट में शामिल करें ताकि कोई भी लिंक पर क्लिक करके आपके वेबसाईट पर आसानी से पहुँच सके ।

युवा जगत ही नहीं अन्य वर्गों में भी सोशल कम्युनिटी वेबसाईटों का आकर्षण बढ़ा है । सर्वप्रथम अपना आकर्षक और वास्तविक संक्षिप्त प्रोफाइल बनाकर सोशल कम्युनिटी वेबसाईट‌स से जुड़ें और अपने दोस्तों की श्रृंखला तैयार करें । यही कनेक्टिविटी आपके बातों को दूर तक पहुँचाने में मददगार होगी । इसके माध्यम से शिक्षा-कैरियर, शादी, व्यापार, मनोरंजन समाजसेवा व ज्ञानवर्द्धक जानकारियों का आदान-प्रदान सरल हो जाता हैऔर आपके दायरे का विस्तार होता है । आज ब्लॉगिंग पत्रकारिता की नई विधा के रूप में उभर चुका है । सभी क्षेत्र से जुड़े लोग ब्लॉगिंग करते हैं । ब्लॉगिंग वास्तव में अपनी अभिव्यक्‍ति का एक स्वतंत्र माध्यम है । पत्रकारिता क्षेत्र से जुड़े अधिकांश व्यक्‍तियों के ब्लॉग हैं । आज किसान, व्यापारी, वकील, राजनीतिज्ञ, खिलाड़ी, प्रोफेसर, डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक आदि लोगों के भी अपने-अपने ब्लॉग हैं । ब्लॉगिंग के माध्यम से संपर्क, समन्वय, आदान-प्रदान तथा अपनी कमजोरी की जानकारी व आत्मशक्‍ति के स्त्रोत में बढोत्तरी ही होती है । आपकी बात वैश्‍विक पैमाने पर अभिव्यक्‍त होने से अधिक से अधिक लोगों को तो लाभ मिलता ही है, साथ ही नई-नई जानकारियाँ भी प्राप्त होती हैं । लालकृष्ण आडवाणी, शशि थरूर, अमिताभ बच्चन, शाहरूख खान आदि भी ब्लॉगिंग हेतु समय निकाल ही लेते हैं । समय के अनुसार हर कुछ बदलता रहता है । मीडिया के पूर्णरूपेण व्यावसायिक होने तथा जनसरोकारों से कुछ मायनों में किनारा करने के कारण तो ब्लॉगिंग का महत्व और अधिक बढ़ गया है । डोमेन रजिस्ट्रेशन में हिंदी के जुड़ जाने से हिन्दी ब्लॉगरों का महत्व काफी तेजी से बढ़ेगा क्योंकि हिंदी जानने वाले इंटरनेट उपयोगकर्ताओं की संख्या अंग्रेजी की तुलना में कई गुना ज्यादा है । अतः समय की माँग है कि आप अपनी बात रखने हेतु केवल वेबसाईट ही नहीं बल्कि ब्लॉग पर भी रखें । इससे आपके संपर्क का दायरा और अधिक विस्तृत होगा ।

आईटी जगत के बहुत सारी कंपनी आपके वेबसाईटों को प्रचार-प्रसार के लिए ही काम करती है ताकि सर्च इंजन आप वेबसाईट को दिखाने में प्राथमिकता दें । उदाहरणस्वरूप : दिल्ली स्थित प्रमुख आईटी कंपनी “नर्मदा क्रिएटिव प्रा० लि०” आपके वेबसाईट पर ट्रैफिक बढ़ाने हेतु दृढ़ संकल्पित है । नए वेबसाईट बनाने, वेबसाईट के मेंटनेंस व वेबसाईटों के प्रचार-प्रसार व वेबसाईट कंटेट राइटिंग के क्षेत्र में यह कंपनी तेजी के साथ आगे बढ़ रही है । हिंदी या अंग्रेजी दोनों भाषाओं में वेबसाईटों पर कंटेट राइटिंग के लिए आप इस कंपनी www.narmadacreative.com पर संपर्क कर सकते हैं । इस कंपनी द्वारा समय दर्पण नामक हिंदी मासिक पत्रिका www.samaydarpan.com पर पढ़ सकते हैं । वैचारिक क्रांति हेतु अग्रसर 9 अंकों के सफल प्रकाशन के साथ यह पत्रिका अपनी लोकप्रियता के नए कीर्तिमान स्थापित कर रही है । आज इस पत्रिका पर करोड़ों हिट्‌स हो चुके हैं क्योंकि हजारों मेल आईडी पर इसके प्रकाशन की सूचना नियमित भेजी जाती है ।

कहने का तात्पर्य यह है कि वेबसाईट के क्षेत्र में सुविचारित योजना एवं तंत्र विकसित करते हुए वेब प्रमोशन हेतु तत्पर रहते हैं तभी पूर्ण सफलता की कामना कर सकते हैं । अपनी बात रखने हेतु आपका प्रजेन्टेशन, अधिकाधिक लोगों तक पहुँच, ईमेल आईडी का संग्रह, नियमित संवाद व क्वालिटी में दम रहने की अनिवार्यता के नियमों का यदि आप पालन करें तभी आपके वेबसाईट की सही मायने में उपयोगिता कही जाएगी । प्रायः यह देखा जाता है कि लोग बेवसाईट तो बना लेते हैं मगर वह वेबसाईट बहुत रूक-रूक कर चलता है या उसके कई लिंक काम ही नहीं करते हैं जिससे उपयोगकर्त्ता के मन में खिन्‍नता हो जाती है और वह उस वेबसाईट पर रहना समय की बर्बादी मानने लगता है । सबसे महत्वपूर्ण बात यह भी है कि उस वेबसाईट पर इंफॉमेर्टिंक क्या है और उसके कंटेट राइट‍अप में कितना दम है । यदि कंटेट में दम रहेगा तभी आकर्षण रहेगा ।
-गोपाल प्रसाद

Monday, November 2, 2009

ईमानदार एक क्यों नहीं हो सकते?




बी.आर.एस.पी. भारतीय राष्ट्रवादी समानता पार्टी तमाम छोटे-छोटे दलों को एकीकृत कर सांझा मंच बनाने में जुट गई हैं । साझे राजनैतिक कार्यक्रम पर आम सहमति बनाकर आनेवाले समय में आम लोगों के हित में चलाए जाने वाले जन आन्दोलन या आम चुनाव (लोकसभा/विधानसभा/नगर निगम) में एक साझे प्लेटफॉर्म से उनमें हिस्सा लेने की है । यह सपना दिल्ली राज्य तक ही सीमित नहीं है, बल्कि हर प्रान्त की राजधानी में पहुँचकर पूरे देश की राजनैतिक पार्टियों (जो हजारों में होगी) को जोड़ना है ताकि आगे होने वाले चुनावों में आम लोगों के मतों का विभाजन न होने पाए । इसी विभाजन का लाभ सत्ताधारी दल अक्सर उठाते हैं और आम जनता की आवाज तूती की आवाज बनकर रह जाती हैं ।
इसके तहत आपस में मिलकर आम राय के द्वारा एक कार्यक्रम निश्‍चित करके समन्वय की भावना से साझा उम्मीदवार तय करने की योजना है । भारतीय राष्ट्रवादी समानता पार्टी के राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष एवं संयोजक अवतार सिंह के अनुसार उनके इस अभियान को काफी समर्थन मिला है । बी. आर. एस. पी. के सदस्यों की क्षमता, व प्रतिभा अद्वितीय है । सभी सदस्य स्वेच्छा से पार्टी से जुड़े हैं । सभी सक्षम हैं, देशभक्‍त हैं और सभी व्यवस्था में बदलाव भी चाहते हैं । श्री सिंह ने कहा हम यह बदलाव शिक्षा व न्याय द्वारा लाएँगे । सर्वविदित है कि योग गुरू स्वामी रामदेवजी ने इस पार्टी के विचारधारा एवं संगठनशक्‍ति से प्रभावित होकर मार्गदर्शन एवं समर्थन देने का निश्‍चय किया है जो काफी महत्वपूर्ण है । भ्रष्टाचार के खिलाफ शंखनाद एवं राजनीति में शुद्धता के लिए बाबा रामदेव काफी चर्चित रहे हैं । इस संदर्भ में इन जैसे हस्ती का समर्थन मिलने से युवाओं का तेजी से जुड़ाव होना शुरू हो गया है क्योंकि युवाओं के नजर में आज बाबा रामदेव एक रोल मॉडल हैं ।
भारतीय राष्ट्रवादी समानता पार्टी के मुख्य संरक्षक रमेश अग्रवाल कहते हैं कि बी.आर.एस.पी. का जन्म दुष्ट निवारण और शिष्ट परिपालन के लिए हुआ है । जातिगत आरक्षण का विरोध करते हुए पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष कर्नल तेजेन्द्र पाल त्यागी ने सरकार की तरफ इशारा करते हुए कहा कि “क्या समझते हैं ये लोग कि ये जुल्म करते रहेंगे और हम चुपचाप सहते रहेंगे? हमने भारतीय राष्ट्रवादी समानता पार्टी को इसलिए बनाया है कि आम आदमी को न्याय, इज्जत एवं सुरक्षा देने के लिए बनाया है । हम बेरोजगार युवकों की सहकारी समिति बनाकर बेरोजगारी दूर करेंगे और हर समय व हर जगह कृषि व किसानों को प्राथमिकता दी जाएगी । वे व्यंग्य भरे लहजे में कहते हैं- “कमाल का लोकतंत्र है यहाँ, किसान का बेटा तो मजदूर हो गया और घुटभईयों के बेटे राजनेता हो गए । ”
पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष कर्नल तेजेन्द्र पाल त्यागी के अनुसार “ बी.आए.एस.पी का भविष्य सभी पार्टियों से बेहतर है क्योंकि इस पार्टी के राष्ट्रीय प्रशासनिक सदस्य बाबा रामदेव से आशीर्वाद लेकर आए हैं । यह पार्टी एक राष्ट्रीय आंदोलन है । पार्टी के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष शिव खेड़ा के अनुसार- “अन्याय सहना, अन्याय करने से बड़ा पाप है । ” जिंदगी जीने की कीमत तो हर तरह चुकानी पड़ती है । घुटने टेककर भी और सर उठाकर भी । स्वाभिमान चाहते हैं तो हमारे साथ चलें । आज आवश्यकता राजनीति के समाजीकरण की है ना कि समाज के राजनीतिकरण की । हम जो साँस ले रहे हैं उसमें भी राजनीति है, इसलिए इससे बचा नहीं जा सकता । उन्होंने युवाओं को आह्वान करते हुआ कहा कि वो संगठित होकर सामूहिक समर्थन उस व्यक्‍ति को दें जो देशभक्‍त, पुरूषार्थी और ईमानदार हो । जब हमारा देश जवान है तो नेता भी जवान होने चाहिए । यदि ६० वर्षों में आरक्षण से समस्याओं का समाधान नहीं हुआ तो अब क्या होगा? संविधान सभा की १३ सदस्यों की कोर कमिटी में सभी ब्राह्मण थे । यदि उनके मन में जात-पात होती तो वे भीमराव अंबेडकर के बजाय माणिक लाल या वी.एन. राव को ड्राफ्टिंग कमिटी का चेयरमैन बनाते ।
सर्वसम्मति से हमलोगों ने सभी सदस्यों के लिए नैतिक मानदंड स्थापित किए हैं, जिसके तहत “आपसी अभिवादन में जय हिंद बोलना और बुलवाना, कम से कम एक विकलांग या शहीद सिपाही के आश्रित को कुछ ना कुछ सहारा देना अपने घर या दफ्तर में बाबा रामदेव के फोटो के साथ संस्था का बोर्ड लगवाने का निश्‍चय किया है । भारत स्वाभिमान ट्रस्ट और बाबा रामदेव के नेतृत्व में २३ जनवरी २०१० को दिल्ली में संत, सैनिक और किसानों के लिए सम्मेलन आयोजित किया जा रहा है । अंतः में वे एक प्रश्न उठाते हैं कि “बेईमान लोग एक हो सकते तो ईमानदार एक क्यों नहीं हो सकते?
- गोपाल प्रसाद

Saturday, October 31, 2009

भारतीय लोकतंत्र और पत्रकारिता को बचाने का मूलमंत्र दिया गोविंदाचार्य ने


कंचना स्मृति न्यास की ओर से गाँधी शांति प्रतिष्ठान में आयोजित कंचना स्मृति व्याख्यानमाला एवं पुरस्कार समारोह में आरा (बिहार) निवासी विख्यात गाँधीवादी विजय भाई को के. एन. गोविंदाचार्यजी ने पुरस्कृत किया । विजय भाई अखिल भारतीय शांति सेना लोक चेतना के अध्यक्ष भी हैं । जातीय दंगों को शांति कराने में डेढ़ दर्जन शिविर महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है । ग्राम स्वराज की चेतना एवं प्रशिक्षित लोगों के द्वारा शिक्षा तंत्र में सुधार से अकल्पनीय परिवर्त्तन हुए । ६८ युवा शांति कैप, भूदान अन्य भूमि सुधार आंदोलन, प्राथमिक शिक्षा पर अनुसंधान में इनकी विशेष क्रियाशीलता रही ।
सर्वविदित है कि क्रांतिकारी पत्रकार अवधेश की पत्‍नी कंचना ने अपने पत्रकारिता के एक दशक में ही सामाजिक सरोकार को लक्ष्य मानकर ६०० से भी अधिक साक्षात्कार लिए । उनके असामायिक निधन के बाद अवधेश जी ने अपनी पत्‍नी की पुण्यस्मृति में कंचना स्मृति के माध्यम से प्रतिवर्ष व्याख्यानमाला एवं पुरस्कार समारोह का आयोजन करती है । सही बात पर सही लोगों के साथ खड़े होना, समाज एवं देश को बचाने के लिए कुछ करने की प्रवृत्ति ने अवधेशजी को न्यास के माध्यम से कुछ ठोस करने की प्रेरणा दी, जिसमें वे सफल रहे हैं ।
कंचना स्मृति न्यास द्वारा “वर्त्तमान राजनैतिक संदर्भों में पत्रकारिता की भूमिका, जनता की नजर में पत्रकारिता, पत्रकारिता में नेतृत्व का संकट, मीडिया का राष्ट्रीय दायित्व पर विचार गोष्ठी आयोजित की जा चुकी है जिसमें अनेक गणमान्य पत्रकारों एवं राजनीतिज्ञों, चिंतकों की उपस्थिति रही है ।
इस वर्ष चर्चा का विषय था “भारतीय लोकतंत्र और पत्रकारिता को कैसे बचाया जाय? चर्चा के इस सत्र में प्रख्यात चिंतक एवं भाजपा के पूर्व राष्ट्रीय महामंत्री के. एन. गोविंदाचार्य, पूर्व केन्द्रीय कृषि मंत्री सोमपाल शास्त्री एवं प्रसिद्ध पत्रकार राहुल देव मंचासीन थे ।
रामजन्मभूमि आंदोलन एवं आडवाणी की रथयात्रा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने, सभी को समान अवसर दिलाने हेतु सोशल इंजीनियरिंग, सक्रिय राजनीति से सन्यास एवं बौद्धिक मोर्चो में काफी दिनों बाद गोविंदाचार्य की उपस्थिति चर्चा का विषय था । गोविंदाचार्य ने अपने चिंतन की धारा को कार्यान्वित करने हेतु तीन नए संस्था का गठन किया है । विकास हेतु भारत विकास संगम, सभ्यता हेतु कौटिल्य शोध संस्थान एवं प्रकृति हेतु राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन के माध्यम से संपूर्ण राष्ट्र में अलख जगाने का महत्वपूर्ण एवं चुनौतीपूर्ण कार्य का बीड़ा उठाया है । उनके आंदोलन के खासकर युवाओं, क्रांतिकारियों, स्वदेशी और स्वाभिमान प्रेमियों तथा दलितों का अप्रत्याशित समर्थन मिल रहा है ।
प्रख्यात पत्रकार राहुल देव ने कहा कि चौथा स्तंभ कही जाने वाली पत्रकारिता लोकतंत्र के पोषण के लिए है । उन्होंने प्रश्न उठाया कि उसको किससे बचाना है ? बढ्चती व्यावसायिकता, वैश्वीकरण, बाजारीकरण, बाजार, बाजारू, मूल्य में हास, सत्तापेक्षी होने, मौलिकता में कमी अतिस्थानीयता, भाषाई संस्कार में गिरावट, विसंस्कृतिकरण, मनोरंजनमुक्‍तता या पत्रकारों की नई पौध से । उन्होंने कहा कि शत-प्रतिशत कुछ नहीं होता । राष्ट्रीय आंदोलन में सारा भारत शामिल नहीं था । १०% से ज्यादा शामिल नहीं हुए थे । क्या बाजार के बाहर पत्रकारिता या हम-आप जीवित रह सकते है? बाजार समाज को संचालित करने की शक्‍ति है । आज पति-पत्‍नी के रिश्ते भी बदल रहे हैं । वैचारिक स्वतंत्रता को भी माध्यम की जरूरत है । बढ़ती भीड़ एवं होड़ से भी संकट उत्पन्‍न हो रहे हैं और नियम कानून व मर्यादाओं का उल्लंघन हो रहा है । वैचारिक आजादी एवं दृष्टि की आजादी थी पत्रकारिता । पत्रकारिता का आजादी के संग्राम में भी महत्वपूर्ण योगदान रहा । आज उतने दर्शक या उतने पाठक नहीं हैं जितने चैनल या समाचारपत्र हैं । इसी कारण लीक से भटकाव हो रहा है । जहां से संकट है दुर्भाग्य से मंच से उसकी चर्चा ही नहीं होती । मीडिया के प्रबंधक वर्ग के बिना समस्या का निदान संभव नहीं जबकि प्रबंधकों को मानना है कि यह चिंता उनकी नहीं । वास्तव में हमारी सरोकार, हमारी चिंताए एक हैं । हमलोगों में तो कोई मतभेद है ही नहीं । विमर्श में उस पक्ष को भी शामिल करना चाहिए । जो मस्त है वों नहीं आएँगे, जिन्हें चिंता है वो मौजूद हैं । दूसरों की गलतियों की चर्चा जब हम करते हैं तो अपनी गलतियों की चर्चा का मंच होना चाहिए या नही? कितने अखबार ईमानदारी से आलोचना/समीक्षा को देने के लिए तैयार हैं? बाहुबली, राजनैतिक दबाब या जो तय करता है कि क्या होगा, क्यों और कैसे किया जाएगा वो ही असली ताकत है । इसलिए उसके दिमाग को भी समझा हाय । ९०% प्रतिशत युवा पत्रकार इलेक्ट्‍ऑनिक मीडिया में निर्णय से हो सकते हैं । मीडिया गंभीर सवाल व गंभीर समाधान का मंच बने । संपादक तय करें कि क्या नहीं करेंगे, जो तय किया जा सकता है । इसके लिए एक मंच बनाकर मीडिया के शक्‍तिशाली लोगों को मनाकर, फुसलाकर समस्याओं से रूबरू कराया जाय और नैतिक दबाब बनाया जाय । दुर्भाग्य की बात यह है कि “जिनको आना चाहिए वे बाहर है । ” मीडिया जो समाज का मन बनाता है वह खुद आज भाषा की भयानक भ्रष्टता का शिकार है । भाषा, संवेदना, संवेदनशीलता का मीडिया में बलात्कार हो रहा है । मीडिया के कारण आज की पीढ़ी की बोलने-सुनने की शक्‍ति क्षीण हो गई है तथा उससे मानसिक पंगु हो रही है । इससे बचाने की जरूरत है । आज युवा पीढ़ी को जो मनोरंजक एवं रोचक नहीं है उसे पढ़ने में दिक्‍कत हो रही है । इसके अतिरिक्‍त वैश्‍वीकरण की समस्या, मनोरंजनमुक्‍ता से भी काफी प्रभाव पड़ा है । आज यदि आम नागरिकों/दर्शकों/पाठकों का समूह मीडिया प्रबंधकों से यह कहने की हिम्‍मत जुटा ले कि हमें आपके यह कार्यक्रम और यह भाषा मंजूर नहीं है तो असर होगा । प्रायोजित विज्ञापन का विरोध हो । सामूहिक क्रियान्वयन के मर्म को समझें । यही वह शक्‍ति है जो चीजों को बदल सकती है । दर्शकों और पाठकों के समूह में है वह ताकत जो उपभोक्‍ता भी हैं क्योंकि उनके हित उससे जुड़े है । इसलिए उनके दबाब से हल निकलेगा । अमीरों के चीज अमीरों के लिए होगी तो पत्रकारिता कैसी होगी? भाषायी मीडिया छोटा होगा, हासिए पर होगा और तब भारत की भारतीयता कहाँ पर होगी यह प्रश्न मैं छोड़ता हूँ । जातीयता, जातीय हिंसा, विषमता, वैमनस्यता काफी हद तक सही मायने में पत्रकारिता द्वारा ही की जा सकती है । आज “स्व” पर बड़ा संकट आ गया है । पत्रकारिता से जो भी अपेक्षाएँ हैं उसके लिए अलग हटकर कुछ नहीं देखें क्योंकि प्रतिबद्धता एवं मूल्य के दीप रहे हैं अभी ।
प्रख्यात चिंतक गोंविदाचार्य ने जाति और संप्रदाय, क्षेत्र और भाषा, सत्ताबल का हावी होना, सत्ताप्राप्ति, दलबदल बेमल गठबंधन, आपातकाल, कम्युनिस्टों की टूट के साथ-साथ कांग्रेस के कांग्रेस आई के रूप में सामने आने, सत्ताबल की परत, बाहुबल का प्रभाव आदि का जिक्र करते हुए कहा कि बूझ कैटचारिंग करने वाले ही नुमाइंदे बन गए । आज १२५ से ज्यादा करोड़पति संसद में हैं । फरीदाबाद एवं गुड़गाँव की लोकसभा सीट के टिकट के लिए एक राष्ट्रीय पार्टी में २५ करोड़ की बोली लगी थी । भैंस और किसान नामक कहानी का प्रसंग सुनाते हुए भारतीय राजनीति के विद्रूप एहरे से उन्होंने अवगत कराया । उन्होंने कहा कि आज विदेशी मुल्क और बिलायती बोल प्रभावी हो गए हैं । राजनीति और लोकतंत्र के संबंध की यह विओडंबना है कि नेता का स्थान मैनेजरों ने, कार्यकर्त्ता का स्थान कर्मचारियों ने तथा पार्टी भी कंपनियों का शक्ल आख्तियार कर ली है । अतः मूलभूत समस्याओं के आधार पर समाजोन्मुखी प्रयास की शुरूआत होनी चाहिए । रावण की लंका में सब ५२ गज के ही दिखते हैं । भारतीय राजनीति के आज के चित्रण में पार्टियों की स्थिति फ्रैंचाइजी सरीखी एवं अनेक प्रकार के अंतविरोधी की शिकार है । चुनाव में बूथ के अधिकारी, स्टिर्निंग अफसर खरीदे जा सकते हैं । एक लाख में एक बूथ के वोट इवीएम के माध्यम चोली-दामन का है । जब कुएँ में ही माँग मिली हो तो स्थिति कैसी होगी? अखबारों में प्रायोजित विज्ञापन एक ही उम्मीदवार, एक ही पार्टी के प्रति समर्पण आदि आसानी से देखे जा सकते हैं । इस दिशा में रामनाथ गोयनका ने उल्लेखनीय परिवर्त्तन किया । आज बड़े-बड़े ठेकेदार, उद्योगपति अपने संरक्षण के लिए अखबार/चैनल ऐसी परिस्थिति में मीडिया चौकीदार कैसे बनेगा? उन्होंने अपने जनादेश यात्रा का जिक्र करते हुए कहा कि एक चैनल ने उनके संवाददाता की रिपोर्टिंग को प्रसारित करने से इसलिए मना कर दिया क्योंकि उक्‍त जनाएश यात्रा में बदसूरत चेहरों की तादाद थी । जबकि चैनल प्रबंधकों की राय में बससूरत चेहरे उनके चैनल में नहीं दिखाए जा सकते । आज इलेक्टॉनिक चैनल टीआरपी के आगे बलिदान हो गए है । एक चैनल का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि लोकनायक जयप्रकाशनारायण के समानान्तर महानायक अमिताभ बच्चन का वित्र एक साथ जारी कर एक चैनल ने आंतरिक बात में स्वीकार किया कि उनकी रणनीति दर्शकों को भुलावे में रखने की है । ब्रेकिंग न्यूज के नाम पर आज क्या हो रहा है? थैलीशाह का अंकुश पूर्ण रुप से नौकरशाह राजनीतिक नेताओं एवं मीडिया के त्रिगुट पर है । आज संपूर्ण व्यवस्था केवल कुछ के ही काम आएगी क्योंकि मूल्य बदल गए हैं । अतः भारत की जनता को अब तय करना होगा एक आर्थक राजनैतिक विकल्प नहीं तो देश अराजकता के लपेट में झुलसेगा । अमीर परस्त, विदेश परस्त सरकार की माँग एवं संसद के बजाय सड़क पर उठेगी आवाज । यही नया तकाजा एवं नई चुनौती है । सत्ता पक्ष एवं विपक्ष जनता के खिलाफ हो गए हैं । वहाँ कुटबाल सदृश खेल चल रहा है । जनप्रतिनिधि बहस से महरूम हो जाते हैं । नए ढाँचे, नए औजार, नए लड़ाके, नए तरीके से ही बदलाव आ सकते हैं । उन्होंने पटना में सर्चलाइट/ प्रदीप के जलाए जाने वाली घटना का जिक्र करते हुए कहा कि उन दिनों “छात्र संघर्ष” नामक अखबार इतना अधिक लोकप्रिय हुआ कि २ पेजी अखबार को लोग फाड़कर पढा करते थे क्योंकि वह सच्चाई बयान करता था । पत्रकारिता और राजनीति में साख की महत्ता है । इसलिए परिवर्त्तनकामी, परिवर्त्तन में हिस्सेदार और विकेंदीकृत तौर पर होगी अब लड़ाई । नेतृत्व, नीयत, नीति मुद्‌दों और मूल्यों की वापसी पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है । उन्होंने कानपुर में मायावती के खिलाफ छापने वाले अखबार पर जनविद्रोह के असर से अभी तक सहमे रहने की बात बताई । अब संघर्ष ही बचता है जनता के पक्ष में । नए तरह की राजनीति नए तरह की मीडिया और नए तरह के आंदोलन द्वारा नेतृत्व पैदा होगा । व्यक्‍ति से बड़ा संगठन, और संगठन से बड़ा समाज होता है । मूल्यों और मुद्‌दों की राजनीति जनांदोलनों के मार्फत से ही संभव है । टीआरपी रेटिंग के खिलाफ समानांतर मीडिया पैदा होंगे । वर्त्तमान व्यवस्था से अमीरों को लाभ, गरीबों में लोभ बढ़ रही हैं, जिसे परिवर्त्तनकामी बनानी होगा। भारत परस्त और गरीब परस्त को नकारने होंगे । एक साथ बौद्धिक, रचनात्मक, आध्यात्मिक एवं आर्थिक आंदोलन का सूत्रपात करना होगाअ । जनसमस्याओं के प्रति संदेवदना और नेतृत्व पर अंकुश के साथ-साथ सामाजिक बदलाव हेतु यथार्थ के आधार को भी भी समझना पड़ेगा । इसके लिए जमीन के मुद्‌दे, जमीन पर, जमीनी कार्यकर्त्ताओं द्वारा जमीनी लड़ेंगे । उपभोक्‍ता का संकल्प निर्णायक होता है । इसी को विंदु बनाकर अआंदोलन की रूपरेखा तय होगी । लोकतंत्र, न्यायपालिका और पत्रकारिता तीनों चाहती है कि अवैधानिकता रहे ताकि हमारा जेब गर्म होता रहे ।

- गोपाल प्रसाद

सत्यमेव जयते के साथ खिलवाड़




भारतीय राष्टवादी समानता पार्टी के युवा शाखा ने अधिकांश संदर्भो में राष्ट्रीय प्रतीक अशोक स्तंभ के नीचे सत्यमेव जयते न होने पर तीव्र आक्रोश जताया है । सरकार द्वारा इस संबंध में अबतक समुचित कारवाई न किए जाने पर थू- थू आंदोलन चलाने की घोषणा की है । बीआरएसपी यूथ द्वारा आयोजित नई दिल्ली स्थित प्रेस क्लब में पार्टी के युवा शाखा के संरक्षक एन‍आर‍आई इंजीनियर रमेशच्न्द्र गठौरिया ने कहा कि मैं अपनी लड़ाई लड़ते-लड़ते थक गया हूँ । भारत सरकार को देश की अस्मिता से कोई लेना देना नही है । सब मैं सत्यमेव की लड़ाई चाणक्य बनकर लड़ना चाहता हूँ । उन्होंने कहा कि जब तक मेरी आत्मा मेरे शरीर का साथ देगी तब तक मैं यह लड़ाई लड़ता रहूँगा । मेरा जन्म भारत में हुआ है और यह राष्ट्र मेरी मां है । भले ही मैं एन‍आर‍आई हूँ पर मेरा दिल इस वतन के लिए ही धड़कता है । श्री गठौरिया ने कहा कि राष्ट्रपति को लिखे ज्ञापन में जबलपुर हाईकोर्ट के आदेश की प्रति सौंपी गई है जिसमें कोर्ट ने सत्यमेव जयते को देवनगरी लिपि में अशोक चिन्ह के नीचे लिखना अनिवार्य किया है । उन्होंने कहा कि मैं जब भी किसी बड़े नेता या अधिकारी से मिला सभी ने मेरी तारीफ की पर एक देश के लिए जो जरूरी था, वह किसी ने नहीं किया । सिर्फ आश्‍वासन दिया, किसी ने अपनी ओर से पहल नहीं की, इसका मुझे दुख है । बीआरएसपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष कर्नल तेजेन्द्रपाल त्यागी ने कहा कि सत्यमेव जयते का हम भारतीय के मन में अमिट छाप व पवित्र स्थान है । इंटरनेट व सरकारी पत्रिकाओं व समाचारों के अंदर राष्ट्रीय चिन्ह की अवमानना एक गंभीर अपराध है । श्री त्यागी ने कहा कि यदि आम आदमी इसकी अवहेलना करता है तो उसे ५ हजार रूपए जुर्माना और दो साल की सजा का प्रावधान है परन्तु देश के रहनुमा और पढ़े-लिखे लोग ही कानून तोड़ रहे हैं तो विश्‍वास किस पर किया जाय ? एक एन‍आर‍आइ हमारे लिए अमेरिका से आकर वर्षों से लड़ रहा है । हमें उनकी लड़आई को अपनी लड़ाई समझकर लड़ना होगा । कर्नल त्यागी ने कहा कि जब राष्ट्र विषय स्थिति में ही तो राष्ट्रधर्म सभी धर्मों से उपर है । अब हमें एक होकर नयी आजादी का शंखनाद बाबा रामदेवजी के नेतृत्व में करना है ।

-गोपाल प्रसाद

नक्सलवाद :सरकार के निर्णय पर प्रश्नचिन्ह

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएच‍आरसी) के सोलहवें स्थापना दिवस समारोह में भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश और एनएस‍आरसी के पूर्व अध्यक्ष ए.एस. आनंद ने कहा कि मानवाधिकार के संरक्षकों ने समाज में अहम भूमिका अदा की है लेकिन उन्हें भी प्रशासन के हाथों बहुत कुछ झेलना पड़ता है । आरोपों से लेकर सजा तक मानवाधिकाअर संरक्षकों में झेली है । उन्होंने कहा था कि मानवाधिकार में सांस्कृतिक, सामाजिक और आर्थिक अधिकार भी शुमार हैं । आयोग के कार्यकारी अध्यक्ष जस्टिस जी.वी. माथुर ने कहा कि सामाजिक विकास मानवाधिकारों के प्रति सम्मान के बगैर संभव नहीं है । देश के हर नागरिक को मानवाधिकार सुनिश्‍चित करने के मकसद से आगे आना चाहिए ।
वहीं दूसरे तरफ आलम यह है कि नक्सली अपने खूनी संघर्ष में बच्चों की हत्या करने से भी परहेज नहीं कर रहे हैं । प्रश्‍न यह उठता है कि क्या नक्सली मानवाधिकार का उल्लंघन नहीं कर रहे? इसके साथ ही प्रश्न यह भी उठता है कि नक्सली आखिर नक्सली क्यों बने? जब भूख, अन्याय, बेबसी और उत्पीड़न बढ़ेगा और उसके स्थायी समाधान योजनाबद्ध तरीके से नहीं चलाए जाएँगे तब-तब नक्सलवाद और पनपेगा । नक्सलवाद के दलदल में युवाओं और बच्चों के साथ-साथ महिलाओं के शोषण-उत्पीड़न की बात अब-जगजाहिर हो चुकी है । मगर सरकार को इन मूलभूत नागरिक आवश्यकताओं की पूर्त्ति के हल ढूँढने एवं उपाय सुनिश्‍चित करने के बजाय नक्सलवाद को फौज और पुलिस के द्वारा कुचलना ज्यादा आसान लगता है । सरकार को इसके आगामी दृष्परिणाम की भयावह स्थिति का अवश्य आकलन कर लेना चाहिए । एक ओर कोई करोड़ों में मासिक वेतन उठाता है वहीं दूसरी ओर किसी को ३००० रू० मासिक वेतन या रोजगार के मद में प्राप्त नहीं हो पाता है । ऐसी विषम परिस्थिति में नक्सलवाद को खत्म कर देने की कल्पना कोरी बकवास ही होगी । यह भी एक अकाट्‌अय सत्य है कि कोई भी नक्सली शिक्षक या डॉक्टर का अपहरण नहीं किया अन्याय का प्रतिकार करने एवं पुलिस, नेता व न्यायपालिका से त्वरित न्याय न मिल पाने के कारण गी शोषितों ने बंदूक का दामन पकड़ा । यह अलग बात है कि उस दलदल में जाने के बाद वे चाहकर भी नहीं निकल सकते हैं । छत्तीसगढ़ में वनवासी सेवा आश्रम के माध्यम से आदिवासियों के पुनर्वास हेतु कार्य करने वाले हिमांशु कुमार कहते हैं कि “राशन और दवा के जगहपर सरकार गोली मारती है । आज भी हम आजाद नहीं है ।
देशभर में नक्सली तांडव से निपटने के लिए सरकार लगातार विकास की गति को तेज करने की बात कहती हैं परंतु उसपर अमल कितना हो रहा है? गरीब और आदिवासी समुदाय व्यवस्था की विसंगतियों के चलते बंदूक का सहारा ले रहे हैं । मध्यप्रदेश में संसाधन, आवास एवं पर्यावरण मंत्री जयंत मलैया को टेलीफोन पर जान से मारने की धमकी देनेवाला अपनी बीमार बहन की जान बचाने के मकसद से नकली बना । दमोह देहांत थानान्तर्गत नरसिंहगढ़ गाँव का १६ वर्षीय युवक शैलेष ने अपनी बहन स्वाति की ब्रेन हेमरेज बीमारी के इलाज में सरकारी उपेक्षा से परेशान होकर मंत्री को नक्सली बनकर धमकी दे डाली । इस घटना से ऐसा प्रतीत होता है कि पीड़ित पक्ष द्वारा लगातार गुहार लगाए जाने पर जन्मा आक्रोश अब कुछ भी करने को आमदा है ।
खूनी संघर्ष में मासूमों की ‘बलि’
नक्सलियों के समर्थन में एकजुट हो रहे बुद्धिजीवियों का मुंह बंद करने के लिए गृह मंत्रालय ने इस तथ्य का सहारा लिया है । दिल्ली में आदिवासी बच्चों के साथ जुटी बुद्धिजीवियों की संस्था ने नक्सलियों के प्रति हमदर्दी जुटाने की की कोशिश की तो गृहमंत्रालय ने जबाब में माओवादियों को बच्चों का दुश्मन करार देते हुए उनका क्रूर चेहरा आगे कर दिया । दर‍असल, नक्सलियों के खिलाफ अभियान का विरोध करने के लिए तमाम ख्यातिनाम बुद्धिजीवियों की संस्था सिटीजंस इनीशिएटिव फार पीस ने दिल्ली में आदिवासी बच्चों को आगे किया । संगठन ने बेहद दयनीय अवस्था में रह रहे छतीसगढ़ व अन्य नक्सल प्रभावित राज्यों के आदिवासी बच्चों को मीडिया के सामने पेशकर तर्क दिया की बुनियादी सुविधाएं व लोकतांत्रिक हक न मिलने के विरोध में लोग हथियार उठा रहे है । केंद्र की निर्णायक जंग की नीति के विरोध में ओजपूर्ण भाषण भी दिए गए । जवाब में गृह मंत्रालय ने नक्सलियों को बच्चों का दुश्मन करार देने वाली रिपोर्ट का खुलासा किया । नक्सली जबरन बच्चों को किस तरह हथियार थमाकर उनकी जान खतरे में डाल रहे हैं, यह बताकर गृह मंत्रालय ने बुद्धिजीवियों पर ही सवाल उछाल दिया । खुफिया एजेंसियों की रिपोर्ट के मुताबिक नक्सली २००७ में एक गांव से पांच लड़के या लड़कियों को अपनी सशस्त्र सेना में शामिल करने का फरमान जारी कर चुके हैं । मंत्रालय के प्रवक्‍ता ने कहा कि नक्सली न सिर्फ बच्चों को मार रहे हैं, बल्कि उन्हें हथियार थमाकर उनकी जिंदगी खतरे में डाल रहे हैं । गृह मंत्रालय ने इस रिपोर्ट को आगे कर नक्सलियों को यह संदेश भी दे दिया है कि उनकी इस रणनीति का नक्सलियों के खिलाफ अभियान पर कोई असर नहीं पड़ेगा ।
सिटिजंस इनीशिएटिव फार पीस के बैनर तले वामपंथी बुद्धिजीवियों ने सरकार के समक्ष पांच मागें रखी है । इनमें नक्सलियों के खिलाफ अभियान रोक सीजफायर करने, सीपीआई (माओवादी) और अन्य नक्सली दलों को सीजफायर के दौरान मिलने वाली सभी सुविधाएं देने, केंद्र सरकार की ओर से उनसे संवाद शुरू किए जाने, मीडिया और स्वतंत्र नागरिक संगठनों को नक्सल इलाकों में जाने की अनुमति दिए जाने और नक्सल प्रभावित इलाकों में लोगों की बुनियादी जरूरतें पूरा करने के लिए कदम उठाए जाने की मांग शामिल है ।
बुद्धिजीवियों के पाले में ही डाल दी गेंद:
नक्सलियों के सफाये के लिए संयुक्‍त अभियान के खिलाफ मानवाधिकार का परचम उठाकर लामबंद हुए बुद्धिजीवियों की मुहिम की काट के लिए गृहमंत्री पी. चिदंबरम खुद आगे आए है । हथियारबंद नक्सलियों को वार्ता की मेज पर लाने के लिए बुद्धुजीवियों से ही गुजारिश कए चिदंबरम ने गेंद उनके ही पाले में डाल दी है ।
साथ ही गृहमंत्री ने बुद्धिजीवियों से वादा किया है, ‘अगर नक्सली हिंसा का मार्ग छोड़कर बात करने आएं तो उनसे केंद्र राज्य स्तर पर हर मुद्दे पर बातचीत के लिए सरकार तैयार है ।’ नक्सलियों के खिलाफ सरकार ने आक्रामक अभियान का विरोध कर रहे बुद्धिजीवियों की लामबंदी की काट के लिए सिटिजंस इनीशिएटिव फार पीस के सदस्य व पूर्व लोकसभा अध्यक्ष रवि राय और उनके तमाम साथियों को गृहमंत्री ने पत्र लिखा है । इसमें सीपीआई (माओवादी) को हथियार छोड़कर बातचीत के लिए आमंत्रित करने के सरकारी प्रयासों का ब्यौरा दिया गया है । साथ ही इन बुद्धिजीवियों से भी हिंसा का रास्ता अपना रहे नक्सलियों को वार्ता की मेज में लाने में उनसे मदद की गुजारिश की । पत्र में चिदंबरम ने कहा है कि वार्ता में बाधा सिर्फ हिंसा है । उन्होंने बुद्धिजीवियों का ध्यान माओवादी नेताओं एम. लक्ष्मण राव (गणपति) और मलोजुला कोटेश्‍वर राव (किशन जी) के हालिया बयानों की तरफ भी खींचा । दोनों नेताओं ने नक्सल हिंसा को न सिर्फ सही ठहराया, बल्कि सरकार को मुहंतोड़ जबाब देने की दलील भी दी । गृहमंत्री ने पत्र में नक्सलियों की हिंसक कार्रवाई का भी ब्यौरा दिया है । आज छत्तीसगढ़, झारखंड और पश्‍चिम बंगाक, आंध्रप्रदेश नक्सलवाद समस्या से सबसे अधिक पीड़ित राज्य हैं ।
पश्‍चिम बंगाल : यहाँ माओवादियों के साथ-साथ माकपा को विपक्षी एकजुटता भी खूब परेशान कर रही है । यही वजह है कि “माकपा सांसद सीताराम येचुरी जहाँ माओवादी हिंसा पर अंकुश को वक्‍त की जरूरत मान रहे रहे हैं वही इसके लिए वह तृणमूल कांग्रेस और उसकी नेता ममता को बनर्जी को जिम्मेदार ठहराते हैं । पश्‍चिम बंगाल में आतंक फैला रहे माओवादियों पर नकेल कसने के लिए केन्द्र से मदद की गुहार के साथ-साथ उन पर पाबंदी से परहेज माकपा का माओवाद पर दोतरफा रूख दर्शाता है । माकपा के अनुसार हिंसा पर आमदा माओवादीय़ॊं फार आंखूश जरूरी है । लोगों की हिफाजत कानून व्यवस्था का मामला है और मौजूदा स्थिति है । इसका दूसरा राजनीतिक पहलू है जिसके चलते उन्हें प्रोत्साहन भी मिलता है । इसे दुरूस्त करना चाहिए । दोनों तरीके एक साथ चलने चाहिए । माओवादियोंके खिलाफ मौजूदा पुलिस अभियान पर रोक लगाने की माँग के पीछे तृणमूल कांग्रेस का मकसद भी इस समस्या के राजनीतिक हल तलाशने का है । बुद्धिजीवी तृणमूल कांग्रेस के प्रोत्साहन की वजह से जुड़ रहे हैं । बंगाल में वामपंथियों के बराबर ही विरोधी विचारधारा का भी प्रभाव है । उसी विचारधारा के विरोध का यह रूप है । बाम विरोधी राजनीतिक जमावड़े से यह वर्ग चिपका हुआ है । बंगाल में माओवादियों के उत्पात पर शिकंजा कसने में सबसे बड़ी बाधा ऐसे तत्वों को तृणमूल का समर्थन है । प्रधानमंत्री के माओवादी हिंसा को देश के लिए सबसे बड़ा खतरा बताए जाने के बावजूद उन्हीं के कैबिनेट मंत्री माओवादिओं को संरक्षण दे रहे हैं । माक्पा के इस आरोप पर प्रधानमंत्री भी चुप है । ममता की माँ है कि माओवादियों के खिलाफ कार्रवाई में जुटे केंद्रीय बल वापस बुलाए जाए लेकिन उन्हें नहीं हटाया जा रहा उल्टे और बल भेजा गया है । यह ममता की माँग का जबाब है कि केन्द्र राज्य मिलकर अभियान चला रहे हैं । ” माओवादियों ने पश्‍चिम बंगाल सरकार के खिलाफ युद्ध का बिगुल फूँक दिया है । ऑरेशन लालगढ़ के जवाब में ऑपरेशन वीनस शुरू करते हुए नक्सलियों ने अपने गढ़ लालगढ़ क्षेत्र के सांकराइल में थाने पर हमला कर ११ असलहे भी ले गए । भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के शीर्ष नेता कोटेश्‍वर राव उर्फ किशन ने कहा है कि सांकराइल थाने पर हमला पश्‍चिम बंगाल सरकार के खिलाफ युद्ध का ऐलान है । पुलिस संत्रास और सुरक्षा बलों के ऑपरेशन के खिलाफ माओवादियों की ओर से अब तक की सबसे बड़ी कार्रवाई ऑपरेशन वीनस की शुरूआत है । किशन ने धमकी दी है कि मेदिनीपुर आ रहे सुरक्षाबलों को रोका नहीं गया तो सांकराइल के अपहृत एसओ अतिन्द्रनाथ दत्त का भी वही हश्र होगा जो झारखंड के खुफिया विभाग के इंस्पेक्टर फ्रांसिस इंदवार का हुआ था ।
झारखंड :
झारखंड में नक्सलियों ने एक नृत्य कार्यक्रम के दौरान अंधाधुंध गोलीबारी कर तीन लोगों की हत्या कर दी । पुलिस के अनुसार राजधानी राँची से २०० कि.मी. दूर चतरा जिले के राजपुरा गाँव में हमला किया, जिससे तीन लोगों की मौत हो गई जबकि दो पुलिसकर्मियों सहित सात लोग घायल हो गर । माओवादियों ने लातेहार जिला के कुरूंड गाँव में झारखंड मुक्‍ति मोर्चा के स्थानीय नेता अमृत जोय कुजूर के घर पर रात में धावा बोलकर उनका ट्रैक्टर जला दिया । माओवादी उनकी जीप भी गुमला ले गए और वहाँ जाकर उसे जला दिया । झारखंड के आदिवासी नेता एवं मानवाधिकार कार्यकर्त्ता ग्लैडसन डुंगडंग समय दर्पण को दिए साक्षात्कार में कहा कि राज्य और केन्द्र सरकार आदिवासियों के जमीन हड़पने का अभियान जारी रखे हुए है । मानवाधिकार का कत्ल हो रहा है । झारखंड में अभी तक मानवाधिकार आयोग नहीं है । सरकार का नजरिया है कि माओवादी बढ़ गए है । नक्सली बढ़ गए हैं जबकि उनके अधिकार एवं मूलभूत सुविधाओं को देने से वे कतरा रहे है । ४०% मिनरल आदिवासियों के पास है । एमओयू पर ज्यादा काम नहीं हुआ है, जिसके कारण उद्योगपतियों का दबाब बढा है । ३५०५ लोगों पर हत्या, हथियार रखने आदि का एफ.आइ.आर विभिन्‍न थानों में दर्ज किए गए है । निर्दोष आदिवासियों पर हत्या, उत्पीड़न बढ़ गया है । आजादी के ६२ वर्ष बीतने पर भी जल, जंगल और जमीन से उन्हें वंचित किया जा रहा है । २० एकटु जमीन के ऐवज में २० हजार थमा दिया गया है । कलम उठाने पर आवाज उठाने पर विकास विरोधी एवं नक्सली होने का ठप्पा लगा दिया जाता है । वास्तव में माओवाद के लिए सत्ता की चंद विरोधी शक्‍तियां हैं । १५ लाख विस्थापित लोगों के पुनर्वास की कोई व्यवस्था नहीं हो सकी है । केवल सेज कानून बनाया गया । इन सारी स्थितियों की जिम्मेदार सत्ता है । पूँजीवाद का घिनौना खेल जारी है । २ रू० से ४०० रू० एकड़ दर पर टाटा को जमीन दिया जाता है । ६० करोड़ रूपया टैक्स फ्री कर दिया जाता है । आदिवासियों की आवाज है कि पहले धरती हमारी है । खेतों से होकर डैम बनाए जाने एवं नदी जोड़ों अभियान से काफी बूरा प्रभाव पड़ा है । आदिवासियों को पनबिजली का लाभ नहीं मिल रहा है । मानवाधिकार रिपोर्ट के अनुसार भारत १६ साल में भी १३४ वें स्थान पर ही है । कुपोषण के शिकार बच्चों को दो वक्‍त की रोटी नहीं मिल पा रही है । दलितों आदिवासियों के बच्चों को क्या विकास का मुख्यधारा से जुड़ने का अधिकार नही है? सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक अन्याय रोकना होगा । अन्याय के प्रतिकार स्वरूप बंदूक उठाने से कौन रोकेगा । सरकार जब तक नक्सलवाद को बंदूक से कुचलने का स्वप्न देखेगी तब तक उसकी दो पीढ़ी फिर प्रतिकार हेतु तैयार हो जायेगी । इतिहास में भी आदिवासियों को जंगली, दानव, शैतान, सूअर, कभी विकास नहीं करनेवाला शख्स कहा गया है । पेशा, कानून का पालन नही हो रहा है । आदिवासिओं की अपनो धर्म को स्थान नहीं मिला । १० करोड़ से अधिक आबादी को सेंसेक्स ८ करोड़ ही बताती है । आदिवासी अगर अन्य राज्य में जाते हैं तो उसे सामान्य में गिना जाता है । राजनैतिक दल कहते हैं कि आदिवासी मुख्यमंत्री बर्दाश्त नहीं, यह अन्याय नहीं तो और क्या है? २२ लाख आदिवासी जमीन खो चुके हैं । विकास परियोजनाओं में उन्हें नौकरी नहीं दिया जाता है । ईमानदारी पूर्वक नियम, कानून का पालन नहीं हो रहा है । यहाँ तक की न्यायपालिका में भी सौदेबाजी हो रही है । समस्या का समादान यह है कि विकास के साथ-साथ, सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, सांस्कृतिक अधिकार मिले । वे कहते है :-
“ सदियों से अन्याय ढोते-ढोते कंधा झुक गया है ।
फिर भी अंधकार से लड़ने का निश्‍चय कर लिया है । ”

- गोपाल प्रसाद

खटिक समाज के अंबेडकर डॉ. गंगाराम निर्वाण


अनसूचित जाति (खटिक) के कर्मठ समाजसेवी डॉ. गंगाराम निर्वाण का निधन ३० अगस्त २००९ को ९० वर्ष की आयु में हो गया । जीवट व्यक्‍तित्व के धनी और खटीकों को राजनीति में आने का आग्रह करते हुए अपना पूरा जीवन लगाने वाले इस महापुरूष का जन्म ६ अप्रैल १९१९ को हुआ था ।
छात्र राजनीति :तिब्बिया कॉलेज में जाने के बाद छात्र राजनीति के माध्यम से इन्होंने अपने संघर्ष की शुरूआत की । वहाँ दलितों पर होनेवाले अत्याचारों को लेकर विरोध करते हुए अनेक माँगपत्र व ज्ञापन दिए । छात्रों को संगठित करने के कारण बी.ए.एम. एस. की डिग्री पूरी न करने के इरादे से इनको तिब्बिया कॉलेज से निकाल दिया गया परन्तु निष्कासन इनका मनोबल न तोड़ पाया । इनके आंदोलन को साथी छात्रों से मिल रहे समर्थन को देखते हुए दिल्ली के प्रथम मुख्यमंत्री ब्रह्म प्रकाश जी से मिल रहे समर्थन के कारण इनको कॉलेज में दोबारा दाखिला मिल गया । इस आंदोलन से एक फायदा यह हुआ कि दिल्ली के प्रथम मुख्यमंत्री ब्रह्मप्रकाशजी के सीधे सम्पर्क में आ गए ।
अंबेडकर के अनुयायी :
१९६१ में कौमी मुसाफिर बाबा प्रभाती ने इनका परिचय डॉ. भीमराव अंबेडकर से कराया । उसके बाद नियमति रूप से बाबा साहेब की शिक्षा का अवलोकन एवं अनुसरण करना उनका धर्म ही बन गया । इनकी कर्मठता, निष्ठा एवं जुझारूपन को देखते इन्हें दिल्ली प्रदेश रिपब्लिकन पार्टी का अध्यक्ष बनाया गया । डॉ. गंगाराम निर्वाण ने इस पार्टी की पहचान को दिल्ली में एक मुकाम तक पहुँचाया ।
संसद में सभी महानुभावों की मूर्ति थी, मगर जिसने भारत को संसदीय लोकतंत्र दिया उसकी मूर्ति लोकतंत्र के मंदिर अर्थात संसद में न होने से भारत के करोड़ों दलितों को अच्छा नहीं लगा । इसलिए १९६२ में दादा साहेब गायकवाड़ के नेतृत्व में संसद में बाबा साहेब की मूर्ति लगाने का आंदोलन किया । उस आंदोलन में उत्तर भारत से कमान बी.पी. मौर्य ने तथा दिल्ली में बाबा प्रभाती, डॉ. गंगाराम निर्वाण और उनके सहयोगियों ने संभाल रखी थी । इस आंदोलन में लाखों लोग जेल भरो अभियान में शामिल हुए । इसके परिणामस्वरूप जेल में जगह न होने के कारण अनेक स्कूलों को भी जेल का रूप देना पड़ा । इस आंदोलन में इनकी माता मनवरी देवी ने भी अपनी गिरफ्तारी दी । अंत में तिब्बिया कॉलेज यहाँ भी इनकी व इनके साथियों की विजय हुई । संसद भवन में बाबा साहेब की विशाल मूर्ति लगी है, वहाँ हर वर्ष लाखों लोग १४ अप्रैल व ६ दिसम्ब्बर को अपने प्रिय नेता बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर को श्रद्धांजलि देने जाते हैं ।
आजीविकाः
१९५५ से १९६९ तक करोलबाग में अपनी मोडिकल प्रैक्टिसनर की प्रैक्टिस शुरू की, जो अच्छी चल रही थी, परन्तु राजनीति में आने के कारण कई बार इस पर भी असर पड़ा । प्रसाद नगर, करोलबाग उठने के बाद १९६९ से मादीपुर में चिकित्सालय खोला । वे गरीब लोगों की हालत देखकर मुफ्त में ही इलाज करते थे ।
राजनीति ः
दिल्ली में रिपब्लिकन पार्टी की जड़ें मजबूत करने के बाद स्वयं भी चुनाव लड़े व अन्य को भी चुनाव लड़ाया । इन्होंने १९६२ का संसदीय चुनाव लड़ा । १९६७ में जब ये संसदीय चुनाव लड़े तो बच्चे-बच्चे की जुबान पर एक ही स्वर था- “बटन खोलो छाती के, मोहर लगेगी हाथी पर” । इनके साथ संघर्ष करनेवालों में से अनेक आज दिल्ली की राजनीति के शीर्ष स्थान पर हैं । अशिक्षा एवं छोटी सीट, बड़ी सीट के चक्‍कर में इनके स्थान पर इनके सहयोगी को विजय मिल गई और ये मात्र कुछ वोटों से चुनाव हारे ।
हालांकि इनके मार्गदर्शन प्राप्त अनेक कार्यकर्ता बाद में सांसद व विधायक बने । १९६९ में प्रसाद नगर टूटने पर मादीपुर, नांगलोई आदि पर २५ गज के प्लॉट दिए गए तो उसके खिलाफ ३० गज के प्लॉट देने हेतु सघन आंदोलन चलाया । १९७१ में लोगों ने इनको अपने बलबूते पर चुनाव में खड़ा करवाया । वोटों की कथित धांधली के कारण एक बार फिर ये कुछ वोटों से चुनाव हार गए । जिसके खिलाफ हर तरफ आंदोलन प्रारंभ हो गए और इन्होंने दो माह तक अन्‍न ग्रहण नहीं किया तथा मौन व्रत धारण किए रहे । अत्याचार के खिलाफ इस आंदोलन को देखकर वर्तमान दलित आंदोलन के एक प्रहरी नेतराम ठगेला पर भी इसका गहरा प्रभाव पड़ा । खटिक महिलाएँ काफी समय से रद्‌दी से लिफाफे बनाने का काम करती थीं परन्तु एक हजार लिफाफे बनाने पर उन्हें मात्र कुछ आने ही मिलते थे । इसके खिलाफ डॉ. गंगाराम निर्वाण ने बहुत बड़ा आंदोलन शुरू किया । पहली बार खटिक महिलाओं हजारों की संख्या में घर से बाहर निकलकर एक-दो दिन नहीं बल्कि लंबे समय तक आंदोलन में हिस्सा लिया । इस आंदोलन की बदौलत लिफाफे की मजदूरी में काफी बढ़ोत्तरी हुई ।
सामाजिक आंदोलन ः
रिपब्लिकन पार्टी के लगातार कमजोर होने से इनको गहरा धक्‍का लगा और मनीराम बडगूजर, बद्री प्रसाद सांखला के साथ मिलकर इन्होंने मजदूर एकता यूनियन बनाई । उनके बैनर तले मजदूरों की काफी समस्याओं को सुलझाने में सफलता मिली । राजनीति में बढ़ रहे अत्याचारों को रोकने के लिए १९७६ में इन्होंने भ्रष्टाचार विरोधी समिति बनाई और काले धन को निकालने का प्रयास किया ।
बहुजन समाज पार्टी में प्रवेश ः
बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर की विचार धारा को आगे लेकर चलनेवालों में डॉ. गंगाराम निर्वाण के एक विशिष्ट लेकर चलनेवालों में देखते मान्यवर कांशीराम ने उनसे १९८९ में बहुजन समाज पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ने का आग्रह किया जिसे वह टाल नहीं सके । उसके उपरान्त वे दिन-रात एक करके बहुजन समाज पार्टी के लिए काम किए । आज बहुजन समाज पार्टी इतनी बड़ी पार्टी बनी है तो उसमें कहीं न कहीं डॉ. गंगाराम निर्वाण का भी योगदान है ।
डॉ. निर्वाण अंबेडकर भवन के संस्थापकों में से एक रहे । इन्होंने जीवन भर प्रयास किया कि खटीक समाज के लोग राजनीति में आकर बाबा साहब के संदेश को अपनाएँ, संसद में पहुँचें । तभी उनका भला होगा और समतामूलक समाज बनने की दिशा में काम होगा । जब दिल्ली प्रदेश खटिक समाज का गठन नेतराम ठगेला एवं सामचंद रिवाड़िया ने किया तो डॉ. गंगाराम निर्वाण ने उन्हें सांगठनिक समस्याओं के प्रति सचेत किया । दिल्ली प्रदेश खटिक समाज को आंदोलनरत करने में तथा समाज के जनजागरण में डॉ. गंगाराम निर्वाण के सलाह का प्रमुख योगदान है ।
शोक संदेश ः
मादीपुर (दिल्ली) के कांग्रेस विधायक मालाराम गंगवाल ने कहा कि डॉ. गंगाराम निर्वाण समाज के अग्रज बंधुओं में से एक थे, जिन्होंने अपने जीवन का सब कुछ लगाकर समाज को राजनीति में आने को प्रेरित किया ।उनके प्रेरणा के बलबूते पर विभिन्‍न राजनैतिक दलों में हमारे समाज की भागीदारी सुनिश्‍चित की । बाबासाहेब अंबेडकर के दिखाए रास्ते पर चलकर पूरी जिंदगी लोकसभा, महानगर परिषद के कई चुनाव लड़कर समाज के लोगों को जगाया । अपनी संघर्षमयी जिंदगी से दिल्ली ही नहीं वरन्‌ उत्तरप्रदेश, पंजाब, हरियाणा, व राजस्थान के लोगों के बीच भी अलख जगाई । केन्द्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री कृष्णा तीरथ ने कहा कि डॉ. निर्वान से मेरे पिता व ससुर के साथ पारिवारिक रिश्ते थे । इनके साथ-साथ उस समय अनेक दलित नेताओं के बदौलत दिल्ली में करोलबाग को दलित आंदोलन की रीढ़ कहा जाता था । यदि हम डॉ. निर्वाण को सच्ची श्रद्वांजलि देना चाहते हैं तो दलित समाज की सभी उपजातियों को साथ मिलकर समाज का स्तर ऊँचा करने के प्रयास करने चाहिए ।
पूर्व सांसद सज्जन कुमार ने कहा कि डॉ. गंगाराम निर्वाण वास्तव में शेरे दिल्ली थे । वे न केवल दलित बल्कि पिछड़े वर्ग सहित सभी के विकास के लिए काम करते थे । समतामूलक समाज का निर्माण करना उसका सपना था । यदि वे चाहते तो सांसद आदि बन सकते थे मगर उनमें परिवार से ज्यादा त्याग व विचारधारा से प्यार था । उन्होंने कहा कि विधायक मालाराम गंगवाल से बात करके मादीपुर में एक रोड का नाम डॉ. गंगाराम निर्वाण के नाम पर रखा जाएगा ।
अनुसूचित जाति/जनजाति परिसंघ एवं इंडियन जस्टिस पार्टी के अध्यक्ष डॉ. उदितराज ने कहा कि डॉ. गंगाराम निर्वाण ने बाबा साहब के आंदोलन व बुद्ध के मार्ग का जिंदगी भर अनुसरण किया । वे अपनी जाति में पैदा होने के कारण ऊँचाइयों को नहीं पा सके । बाबा साहेब का आंदोलन चलाने वालों में एक ऐसा ग्रुप भी है जो दिखाने के लिए जातिवाद के खिलाफ आवाज बुलंद करता है, मगर स्वयं जातिवाद का घिनौना उदाहरण पेश करते हैं । वास्तव में डॉ. निर्वाण भी उसी जातिवादी सोच के शिकार हुए वर्ना इतने लंबे समय तक बाबा का मिशन पूरी ईमानदारी व पूरी ताकत और लगन से करने के बाद भी उन्हें राजनैतिक मंजिल नहीं मिली, जिसके वे हकदार थे । वे विशुद्ध रूप से मानवतावादी थे तथा जातिवाद के खिलाफ थे । यदि हमारा देश उनके दिखाए राह पर चले तो यह देश विश्‍व की महाशक्‍ति बन सकता है ।
अखिल भारतीय खटिक समाज के प्रधान महासचिव मामचंद रिवाड़िया ने कहा कि डॉ. निर्वाण ने “जागते रहो” का नारा लगाते हुए समाज को जगाने का काम किया । वे अपनी बात पूरी निडरता से कहते थे । उन्होंने कहा कि उनकी मुत्यु से १५ दिन पूर्व मैं उनसे मिला था । उन्होंने समाज के कार्य के लिए मुझे हमेशा की भाँति कुछ गुर बताए । हमें उनके बताए मार्ग पर चलकर उन्हें श्रद्वांजलि देनी चाहिए ।
दिल्ली प्रदेश बहुजन समाजपार्टी के सचिव ने कहा कि आज जब किसी की मुत्यु हो जाती है तो लोग शाम तक भूल जाते हैं लेकिन आज इतने दिन बाद शोकसभा होने पर इतनेलोग आए तो समझा जा सकता है कि उन्होंने समाज के प्रति कितना काम किया होगा । मुझे इतने महान व्यक्‍ति का शिष्य होने का मौका मिला है । कांशीरामजी कहते थे कि माँगना नहीं देना सीखो आओ अपना घर मजबूत बनाएँ । यही डॉ. निर्वाण की सच्ची श्रद्धांजलि होगी ।
- गोपाल प्रसाद

प्रगति मैदान में आई. आई. टी. एफ. १४ नवंम्बर से


प्रगति मैदान में १४ से २७ नवंबर तक लगने वाले इंडिया इंटरनैशनल ट्रेड फेयर में इस बार स्मोकिंग करना बैन होगा । यदि कोई व्यक्‍ति धुएं के छल्ले उड़ाता हुआ पाया जाता है तो उसे मेले से बाहर का रास्ता दिखा दिया जाएगा । इसके अलावा पॉलिथीन बैग का इस्तेमाल भी नहीं किया जा सकेगा । इस बार मेले के समय में भी बदलाव किए गए हैं ।
इंडिया ट्रेड प्रमोशन ऑर्गनाइजेशन (आईटीपीओ) के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि ट्रेड फेयर के दौरान प्रगति मैदान नो स्मोकिंग जोन होगा । चाहे कोई प्रगति मैदान का अधिकारी या कर्मचारी हो, दुकानदार हो या फिर दर्शक किसी को भी स्मोकिंग करने की अनुमति नहीं होगी । ऐसा करने पर उसे प्रगति मैदान से बाहर कर दिया जाएगा । स्मोकिंग करने वालों की देखभाल के लिए अलग से टीम बनाई जाएगी और सीसीटीवी कैमरों की मदद से भी ऐसे लोगों को पकड़ा जाएगा । मेले में पॉलिथीन बैग का इस्तेमाल भी बैन होगा । शामिल होने वाली सभी कंपनियों, दुकानदारों और देशों को इस बारे में जानकारी दे दी गई है । आईटीपीओ का कहना है कि वह इस बार ग्रीन फेयर आयोजित करना चाहते हैं । इसलिए मेले में ऐसी चीजों पर रोक लगाई जा रही है जिससे पर्यावरण और लोगों की सेहत पर बुरा असर पड़ता हो ।
अधिकारी ने बताया कि इस बार ट्रेड फेयर में शुरू के पांच दिन ही बिजनेस विजिटर्स की एंट्री होगी । आम दर्शकों के लिए मेला १९ नवंबर से खुलेगा । ऐसा इसलिए किया गया है ताकि कंपनियां आसानी से बिजनेस कर सकें । उम्मीद है, इससे बिजनेस में इजाफा होगा । पिछले साल शुरू के दो दिन ही बिजनेस विजिटर्स के लिए रिजर्व थे । अधिकारी के मुताबिक इस बार मेले के समय में भी बदलाव किया गया है । पहले ट्रेड फेयर का समय सुबह १० से रात ८ बजे तक होता था, जो अब सुबह ९ः३० से शाम ७ः३० बजे तक का रहेगा । ऐसा सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए किया है ।
इस बार मेले की थीम एक्सपोर्ट ऑफ सर्विसेज होगी । पार्टनर कंट्री थाइलैंड और फोकस कंट्री चीन होगा । पार्टनर स्टेट दिल्ली एवं फोकस स्टेट उत्तराखंड होगा इसके अलावा क्यूबा, नाइजीरिया और पापुआ न्यू गिनी जैसे देश पहली बार ट्रेड फेयर में शामिल होंगे ।

Thursday, October 29, 2009

कैसे करें मानवाधिकार की रक्षा?


देश की हर जनता को असीमित अधिकार प्राप्त है मगर अधिकांश को अपने अधिकार की जानकारी ही नहीं है । यह अलग बात है कि अधिकार के साथ-साथ कर्त्तव्य की जानकारी भी नहीं है । जब तक हम अपने कर्तव्य का निर्वहन नहीं करेंगे तब तक अधिकार की माँग करना बेतुकी बात है । आज अधिकार को कानूनी जामा पहनाकर एक्ट का रूप दिया जा रहा है जो कानून का रूप लेगा । कानून में व्याप्त खामियों को दूर करके ही सही और त्वरित न्याय व्यवस्था कायम की जा सकती है । शिक्षा का अधिकार, नौकरी या रोजगार पाने का अधिकार, चुनाव लड़ने का अधिकार, देश के किसी भी प्रान्त में जाने और रहने का अधिकार आदि हमारे मूलभूत अधिकार हैं । दुर्भाग्य की बात यह है कि आज हमारे अधिकार पर कटौती की जा रही है । अधिकार पर हमले हो रहे हैं । नक्सलवादी देश में समानांतर सत्ता चला रहे हैं । महाराष्ट्र में राजठाकरे द्वारा अन्य प्रांत के लोगों को खदेड़ने का अभियान या असम में अन्य राज्य के लोगों पर हमले से ऐसा प्रतीत हो रहा है कि हमें अधिकार से वंचित किया जा रहा है । दूसरे शब्दों में कहें तो यह मानवाधिकार पर हमला है । आश्‍चर्य इस बात का है कि सरकार मूकदर्शक बनी बैठी है और क्षेत्र तथा भाषा के माध्यम से तोड़ने की साजिश में लगे लोगों का मनोबल बढ़ रहा है । लोकतंत्र का पाँचवा स्तंभ गैर सरकारी संस्थाएँ ( NGO) इस दिशा में अपना योगदान देकर बहुत महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह कर सकती है । जिसका प्रत्यक्ष उदाहरण २०१० में कर्नाटक के गुलवर्गा में देखने को मिलेगा । आज हमें उस जगह दीया जलाने की आवश्यकता है, जहाँ अभी तक अंधेरा है । जनजागरण के माध्यम से सर्जन शक्‍तियों के समन्वय एवं उनके बीच संवाद स्थापित किए जाने की परमावश्यकता है । शिक्षा का अलख जगाने एवं विकास हेतु सरकार पर पर निर्भरता से काम नहीं चलनेवाला है । इस दिशा में कार्य करनेवाले व्यक्‍तियों/संस्थाओं को कदम से कदम मिलाकर चलना होगा । हर क्षेत्र में हमें एक रोल मॉडल बनाने होंगे । उस रोल मॉडल के देखा देखी विचारधारा के समन्वय और संवाद से विस्तार को बल मिलेगा । नए विकल्प नए लड़ाके, नए औजार और नई परिस्थितियाँ बनानी होंगी ताकि समस्याओं का निदान हो सके ।
आज समस्या यह है कि ज्यादातर लोग अपनी शक्‍ति को समस्याओं की चर्चा करने में अपनी शक्‍ति को लगाकर नष्ट कर देते हैं । वे समाधान की दिशा में आगे बढ़ने का प्रयास ही नहीं करते है । आज हर किसी को समाधान चाहिए न कि समस्याओं का वही पुराना खटराग । अधिकार के साथ कर्तव्य और समस्या के साथ समाधान हेतु संतुलन कायम करने होंगे । अच्छे विचारों अच्छे लोगों और अच्छे कार्यों को एक साथ आना ही होगा, यही समय की माँग है । देश की गाढ़ी कमाई राजनेताओं के माध्यम से स्विस बैंकों में जमा हो रही है । जनता बेहाल, बेबस और कंगाल है और नेता मालामाल हो रहे हैं । झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा इसके प्रत्यक्ष उदाहरण हैं । क्वात्रोची के खिलाफ चल रहे मामले को सीबीआई द्वारा वापस लिया जा रहा है । क्या देश की हर जनता को यह जानने का अधिकार नहीं है कि देश का पैसा कहाँ, किस मद में और कैसे खर्च हुआ है? देश की विश्‍वसनीय संस्था सीबीआई के अनेक कृत्य ने यह साबित कर दिया है कि देश सर्वोपरि नहीं बल्कि वह भी सत्ता की चापलूसी और दलाली करनेवाली संस्था है । आखिर यह देश किस ओर जा रहा है? भ्रष्टाचार की जड़ें इतनी गहराई तक प्रवेश कर चुकी हैं कि सच्चाई और ईमानदारी नामक शब्द अब इतिहास सा प्रतीत होता है । पारदर्शिता हेतु आज आरटीआई जैसे कानून को और अधिक सशक्‍त किए जाने की आवश्यकता होगी । आज जरूरत यह है कि सारी योजनाओं को बहुआयामी बनाया जाय ताकि उसकी व्यापकता में वृद्धि हो तथा वह कम खर्चीला हो ताकि जन-जन तक पहुँच सके । जनता को व्यापक अधिकार दिए जाँय ताकि वह अपने खिलाफ हर अन्याय का प्रतिकार कर सके । वर्तमान व्यवस्था से आज हर कोई दुखी है । सुखी वही है जो लूटने में लगा है । व्यवस्था के खिलाफ विद्रोह की ज्वाला पुनः एक नई संपूर्ण क्रांति का आगाज करेगी जिसकी व्यापक संभावना है । शरीर से जिंदे किंतु संवेदना से मृत लोग कभी क्रांति नहीं कर सकते । वैसे लोग केवल बहस कर सकते हैं । वैसे लोग ये चाहते हैं कि भगत सिंह चन्द्रशेखर आजाद, खुद्‌दीराम बोस, सुभाष चंद्र बोस आदि हमारे घर नहीं अन्य के घर में पैदा हो । ऐसी संकीर्ण एवं स्वार्थी मानसिकता वाले लोगों को जीने का, देश में रहने का कोई हक नहीं । प्रस्तुत अंक मानवाधिकार विशेषांक की उपयोगिता सही मायने में तभी सिद्ध होगी जब आप भी देश के विकास, मान-सम्मान हेतु संकल्पित एवं प्रतिबद्ध होंगे । याद रखें जब-जब संवेदना या संवेदनशीलता खत्म होगी तब-तब एक नया युद्ध होगा । मानवाधिकार की रक्षा हेतु हमें कई मोर्चों पर एक साथ जंग लड़ना होगा तभी विकास और शांति की परिकल्पना पूरी हो सकती है ।
- गोपाल प्रसाद

आरटीआई से खत्म हो सकता है भ्रष्टाचार और लालफीताशाही

सरकार, सरकारी योजनाएँ और तमाम सरकारी गतिविधियाँ हमारे दैनिक जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं । आम आदमी से जुड़ा कोई भी मामला हो प्रशासन में बैठकर भ्रष्ट, लापरवाह या अक्षम कर्मचारियों/अधिकारियों के कारण सरकारी योजनाएँ सिर्फ कागज का पुलिंदा बनकर रह जाती हैं ।
सन्‌ १९४७ में मिली कल्पित आजादी के बाद से अब तक हम मजबूर थे । व्यवस्था को कोसने के सिवाय कुछ नहीं कर सकते थे परन्तु शायद अब हम मजबूर नहीं हैं क्योंकि आज हमारे पास सूचना का अधिकार नामक औजार है, जिसका प्रयोग करके हम सरकारी विभागों में अपने रूके हुए काम आसानी से करवा सकते हैं। हमें सूचना का अधिकार अधिनियम २००५ की बारीकियों को पढ़कर समझना और सामाजिक क्षेत्र में इसको अपनाना होगा । इस अधिनियम के तहत आवेदन करके हम किसी भी विभाग से कोई भी जानकारी माँग सकते हैं और अधिकारी/विभाग द्वारा माँगी गई सूचना को उपलब्ध करवाने हेतु बाध्य होगा । यही बाध्यता/ जवाबदेही न केवल पारदर्शिता की गारंटी है बल्कि इसमें भस्मासुर की तरह फैल चुके भ्रष्टाचार का उन्मूलन भी निहित है । यह अधिनियम आम आदमी के लिए आशा की किरण ही नहीं बल्कि आत्मविश्‍वास भी लेकर आया है । इस अधिनियम रूपीऔजार का प्रयोग करके हम अपनी आधी-अधूरी आजादी को मुकम्मल आजादी बना सकते हैं ।
“भगत सिंह ने क्रांति को जनता के हक में सामाजिक एवं राजनैतिक बदला के रूप में देखा था । उन्होंने कहा था कि क्रांति एक ऐसा करिश्मा है जिससे प्रकृति भी स्नेह करती है । क्रांति बिना सोची-समझी हत्याओं और आगजनी की दरिन्दगी भरी मुहिम नहीं है और न ही क्रांति मायूसी से पैदा हुआ दर्शन ही है । लोगों के परस्पर लड़ने से रोकने के लिए वर्ग चेतना की जरूरत है । ”
भगत सिंह के इन्हीं प्रेरक वाक्यों के संदर्भ में कहें तो यह अकाट्‌य सत्य है कि सब जगह पारदर्शिता हो जाय तो आधी से अधिक समस्याएँ खुद ब खुद हल हो जाएंगी । जरूरत केवल जनजागरण की है । अभी तक आर. टी. आई. ( Right to information / सूचना का अधिकार) में ऐसा कोई मैकेनिज्म ही नहीं बनाया गया जिससे पता चल सके कि किस आवेदक को सूचना मिली या नहीं मिली और न ही संबंधित विभाग/सेक्शन माँगी गई सूचना के जवाब की प्रतिलिपि ही आर.टी.आई. सेल में देने की नैतिक जिम्मेदारी ही पूरी करते हैं । अधिकांश जगह आर.टी.आई. सेल में कर्मचारियों की भयंकर कमी है । आर.टी.आई. के तहत आवेदनों का ढेर लगता जा रहा है । लेकिन कर्माचारियों की संख्या बढ़ाने के मामले में प्रशासन उदासीन है, दूसरे आर.टी.आई. सेल की सूखी सीट पर आने को कर्मचारी तैयार ही नहीं होते और जो कर्मचारी इस सेल में आने के लिए उत्सुक भी हैं उन्हें विभिन्‍न कारणों से यहाँ लगाया ही नहीं जाता । सूचना अधिकारियों के ऊपर भी काम का अत्यधिक बोझ है । सूचना अधिकारियों को अपने दिनचर्या कार्यों के साथ-साथ आर.टी.आई. का कार्य भी देखना पड़ता है और इसी दोहरे बोझ की वजह से आर.टी.आई. कार्य भी अत्यधिक प्रभावित होता है । आर.टी.आई. सेल में कोई समन्वयक (कोऑर्डिनेटर) ही नहीं है जिससे यह सुनिश्‍चित हो सके कि आवेदक को ३० दिनों के भीतर और सही सूचनाप्राप्त हुई या नहीं ।
सामाजिक परिवर्तन सदा ही सुविधा संपन्‍न लोगों के दिलों मे खौफ पैदा करता रहा है । आज सूचना का अधिकार भी धीरे-धीरे ही सही परन्तु लगातार सफलता की ओर बढ़ रहा है । पुरानी व्यवस्था से सुविधाएँ भोगनेवाला तबका भी इस अधिनियम का पैनापन खत्म करने की कोशिश में शुरू से ही रहा है । कुछ सूचना आयुक्‍तों के रवैये से ऐसा लगता है कि कहीं इस कानून की लुटिया ही ना डूब जाए । कई महीनों इंतजार के बाद भी माँगी गई सूचनाएँ नहीं मिलतीं या फिर अधूरी और भ्रामक मिलती हैं । उसके बाद भी यदि कोई आवेदक सूचना आयोग में जाने की हिम्मत भी करता है, तब भी कोई आयुक्‍त, प्रशासन के खिलाफ कोई कारवाही नहीं करते । कुल मिलाकर मानना ही होगा, कि हम तमाम कोशिशों के बावजूद आज भी उसी जगह खड़े हैं जहाँ दर्शक पहले खड़े थे । क्या हम मान लें कि क्रांतिकारियों की कुर्बानियाँ बेकार हुईं जिनके लिए आजाद हिंदुस्तान से आजादी के बादवाला हिंदुस्तान ज्यादा महत्वपूर्ण था । प्रश्न है कि “क्या क्रांतिकारियों को दी गई यातनाएँ उन्हें झुका पाईं? ठीक उसी तरह हमारा उत्पीड़न या कोई भी असफलता हमारे इरादों को नहीं तोड़ सकती है । सूचना अधिकार से जुड़े कार्यकर्त्ता इस अधिकार का और भी मजबूती से प्रयोग करेंगे क्योंकि यह देश हमारा है, सरकार भी हमारी है, इसलिए अपने घर को साफ रखने की जिम्मेदारी भी हमारी है ।
राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने कहा है कि सरकारी व्यवस्था से भ्रष्टाचार और लाल फीताशाही दूर कर बेहतर शासन हासिल करना भारत का सपना रहा है और आरटीआई कानून के व्यापक व सजग इस्तेमाल के जरिए इसे हकीकत में बदला जा सकता है । उन्होंने कहा कि सरकार से सवाल पूछने का जो अधिकार पहले सांसदों और विधायकों को था, वह इस कानून ने हर आम नागरिक को दे दिया है ।
सूचना के अधिकार कानून के चार साल पूरे होने के मौके पर केंद्रीय सूचना आयोग द्वारा आहूत सम्मेलन में राष्ट्रपति ने कहा कि लोकतंत्र में सरकार जनता की होती है । जनता जब चाहे, उसे हर योजना की तरक्‍की के बारे में सही-सही जानकारी मिलनी चाहिए । आरटीआई ने यह तो मुमकिन कर ही दिया है । इस कानून के व्यापक और सजग इस्तेमाल से देश को भ्रष्टाचार और लाल फीताशाही से मुक्‍त करने का सपना भी पूरा हो सकता है । हालांकि उन्होंने नागरिकों को जिम्मेदारी के साथ इसका इस्तेमाल करने की सलाह भी दी ।
पेंशन और जन शिकायत व प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण ने कहा कि सूचना के अधिकार कानून को और प्रभावी बनाने के लिए ई-गवर्नेंस और ई-मेल के जरिये संवाद सेवा को सरकार ने सैद्धान्तिक मंजूरी दी है । उन्होंने कहा, सरकार ने आरटीआई को कारगर बनाने के लिए पिछले वर्ष केंद्र प्रायोजित पेंशन योजना पेश की थी । इसके तहत राष्ट्रीय आरटीआई प्रत्युत्तर केंद्र के गठन का कार्य शुरू किया गया था । उन्होंने कहा कि इसी प्रयास को आगे बढ़ाते हुए सरकार ने आरटीआई में ई-गवर्नेंस और ई-मेल के जरिये संवाद की सेवा को सौद्धांतिक रूप में मंजूरी दी है । सूचना के अधिकार अधिनियम के वार्षिक सम्मेलन में चव्हाण ने कहा कि सूचना के अधिकार अधिनियम को प्रभावी बनाने के लिए पहले चार वर्ष में सूचना मांगने वालों, सूचना प्रदान करने वालों, स्वयंसेवी संस्थाओं, नागरिक संगठनों, मीडिया आदि सभी पक्षों ने काफी समर्थन किया है ।
अब जल्दी ही इसे लागू किया जा सकेगा । मुख्य सूचना आयुक्‍त वजाहत हबीबुल्ला ने कहा कि इस कानून ने भारत को एक आदर्श लोकतंत्र बनने की राह पर अपना सफर तेज करने में मदद की है । भारत में यह कानून लागू होने के बाद नेपाल बांग्लादेश और भूटान ने भी अपने यहां इसे लागू कर लिया है । लोकतंत्र में जनता की भागीदारी के लिए पारदर्शिता एवं जवाबदेही की माँग के अभियान को गतिशील करने हेतु प्रश्न-उत्तर के रूप में एक पुस्तक “सूचना का अधिकार” में आवश्यक जानकारियों को बड़े ही सुलभ तरीके से “दादी मां” नामक (सच्चों एवं बुर्जुगों के प्रति समर्पित स्वयंसेवी, संगठन) १४/६, सेवा नगर, नई दिल्ली- ११०००३ द्वारा प्रकाशित की गई है । जनहित में इसे अवश्य पढ़ें, पढ़ाएँ एवं प्रचार-प्रसार में योगदान दें ।
- गोपाल प्रसाद

Friday, October 2, 2009

क्या रावण जल गया ?

अधर्म पर धर्म की विजय के रूप में प्रत्येक वर्ष विजयादशमी का त्यौहार मनाया जाता है । दुर्गा पूजा के अंतिम दिन अर्थात विजयादशमी को रावण का पुतला जलाया जाता है । संपूर्ण भारत में विजयादशमी का यह त्यौहार संपन्‍न हो गया परन्तु जाते-जाते कुछ संदेश भी छोड़ गया जिस पर गहन चिंतन की आवश्यकता है । १९८९ में केन्द्र सरकार के खिलाफ शुरू हुए विद्रोह के बाद पलायन के २० वर्षों तक कश्मीरी पंडितों को दशहरा मनाने का सिलसिला रूक सा गया था, परन्तु इस बार उन्हें कश्मीर में दशहरा मनाने को मंजूरी मिली । आतंकवाद के बावजूद कश्मीर न छोड़नेवाले ३२६५ कश्मीरी पंडितो के हितों के लिए संघर्षरत कश्मीरी पंडित संघर्ष समिति (केपीएसएस) ने इस साल विजयादशमी पर कश्मीर में रावण, मेघनाथ, कुंभकर्ण जलाने का फैसला किया था ।
राजौरी में रूखसाना नामक लड़की ने शक्‍तिरूपा दुर्गा का रूप धारण कर आतंकवादियों का बहादुरी से मुकाबला किया । साधारण गाँव की इस लड़की के घर में नवमी के रात्रि में तीन आतंकवादी घुस आए थे । इन आतंकवादियों ने रूखसाना के अपहरण करने की कोशिश की थी । रूखसाना दो साल पहले १० वीं में फेल होने के बाद से पढ़ाई छोड़ चुकी थी और साधारण स्थित अपने घर में रहती थी । पुलिस सूत्रों के अनुसार घर में घुसने के बाद आतंकवादियों ने रूखसाना को सौंपने की माँग की । रूखसाना के पिता नूर हुसैन, माँ राशिदा और भाई इजाज ने इसका विरोध करने पर आतंकवादी उन्हें राइफल की बट से मारने लगे । इससे गुस्साई रूखसाना ने कुल्हाड़ी उठाई और एक आतंकवादी को ढेर कर दिया, जो लश्कर-ए-तैबा का अबू ओसामा था । रूखसाना के वार से दूसरा आतंकवादी घायल हो गया । डीजीपी ने रूखसाना को इनाम देने का ऐलान किया है । इस घटना ने साबित कर दिया कि वास्तव में रावण को खत्म करने के लिए साहस और पराक्रम होना चाहिए । सभी नागरिकों में यह भावना जागृत होनी चाहिए । यहाँ एक रावण क्या करोड़ों रावण हैं । क्या सब रावण जल गया ? इंदौर में रावण का पारंपरिक पुतला न बनाकर इसे मुंबई हमलों में पकड़े गए आतंकवादी अजमल कसाब का रूप दिया । दशहरा उत्सव आयोजकों के अनुसार आज आतंकवाद हमारा सबसे बड़ा दुश्मन है । इसलिए हमने फैसला किया कि रावण की जगह पाकिस्तानी आतंकवादी कसाब का पुतला जलाया जाय । सरकार तो कसाब को सजा नहीं दे पाई लेकिन इस तरह हम अपनी भावनाएँ जता रहे हैं । ”
कसाब रूपी रावण का पुतला जलाया जाना इस बात का प्रतीक है कि आक्रोशित जनता की अभिव्यक्‍ति क्या रूप ले सकती है । दशहरा के मौके पर हरियाणा के बराड़ा कस्बे में दुनियाँ के सबसे लंबे रावण के १७५ फुट के पुतले को आग लगाई गई जिसे खड़ा करने में ही १२० फुट लंबी क्रेन की मदद लेनी पड़ी । स्थानीय रामलीला क्लब के अध्यक्ष तेजिन्द्र राणा के अनुसार जैसे-जैसे समाज में बुराईयाँ बढ़ रही हैं, वैसे-वैसे रावण का पुतला भी बड़ा किया जा रहा है ।
इधर कानुपर में दलितों ने रावण का पुतला जलाने के विरोध में रावण मेले का आयोजन किया और रावण की पूजा की । प्रश्न यह उठता है कि दलितों ने रावण को जलाने के बजाय रावण की पूजा क्यों की? यह शोध का विषय है कि अत्याचार, शोषण, भ्रष्टाचार और आतंकवाद के प्रतीक रावण को यहाँ महिमामंडित क्यों किया गया ? देश के रहनुमाओं, चिंतकों, समाजशास्त्रियों एवं इतिहासकारों को रावण के इर्द-गिर्द के तमाम प्रश्नों के हल तलाशने होंगे क्योंकि इन प्रश्नों के उत्तर एवं समाधान का सीधा संबंध हमारे राष्ट्र की एकता, अखंडता एवं संप्रभुता से है । रावण के पुतले को जलाने का सही और सापेक्ष संदेश समाज में अगर नहीं जा रहा है तो यह गंभीर चिंता का विषय है । पद, प्रतिष्ठा और पावर वाले व्यक्‍ति खुद को देश, कानून और उपर समझने लगता है । पावर का दुरूपयोग खबर तब बनती है जब आम जनता या तो बहुत अधिक सताई जाए या फिर पावर बनाम पावर का गेम खुलकर सामने आए । समय दर्पण परिवार की ओर से सभी को दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएँ ।
-GOPAL PRASAD : 09211309569

Thursday, October 1, 2009

शाबास युगरत्ना, देश को नाज है तुम पर

अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा से मिलने की युगरत्‍ना श्रीवास्तव की हसरत भले ही पूरी नहीं हो सकी परन्तु उसने अपने पिता डॉ० आलोक श्रीवास्तव को न्यूयॉर्क से लखनऊ फोन करके कहा- “पापा, एक दिन जरूर ऐसा आएगा जब जलवायु परिवर्त्तन की मेरी थ्योरी थीसिस वर्ल्ड के लोग सहमत होंगे । डॉ. श्रीवास्तव ने मोबाईल पर अपनी बिटिया की हौसला आफजाई की । उसके भाषण को सेंट फेडरिल विद्यालय के शिक्षकों और उसके सहपाठियों ने भी सुना । विद्यालय की शिक्षिका डेजी प्रसाद के अनुसार युगरत्‍ना इतनी ज्यादा प्रतिभाशाली है, यह हमें अब मालूम पड़ा । लखनऊ में कई संस्थाओं ने युगरत्‍ना को सम्मानित करने का निर्णय किया है । मात्र १३ साल की उम्र में संयुक्‍त राष्ट्र (यूएन) सम्मेलन को संबोधित करनेवाली युगरत्‍ना को उत्तरप्रदेश सरकार सम्मानित करेगी । राज्य के उच्च शिक्षा मंत्री डॉ. राकेशघर त्रिपाठी ने कहा है कि बालिका और उसके माता-पिता को सम्मानित किया जाएगा । उन्होंने कहा कि युगरत्‍ना ने देश, प्रदेश और लखनऊ का गौरव बढ़ाया है । युगरत्‍ना के पिता आलोक श्रीवास्तव लखनऊ के अलीगंज स्थित सुभाष चंद बोस पोस्टगेजुएट कॉलेज में वनस्पतिशास्त्र के रीड़र है । तेरह साल की भारतीय बालिका युगरत्‍ना ने दुनियाँ के तीन अरब बच्चों की ओर से आवाज उठाते हुए विश्‍व नेताओं से जलवायु परिवर्त्तन पर तुरंत कदम उठाने की अपील की है । जूनियर बोर्ड रिप्रेजेन्टेटिव के तौर पर युगरत्‍ना ने न्यूयॉर्क में संयुक्‍त राष्ट्र के सम्मेलन के उद्‌घाटन सत्र को संबोधित कर इतिहास रच दिया । जलवायु परिवर्त्तन के मुद्‌दे पर विचार करने के लिए जुटे दुनियाँ भर के नेताओं को भारत की १३ वर्षीय लड़की युगरत्‍ना श्रीवास्तव ने संबोधित किया । विश्‍व के तीन अरब बच्चों का प्रतिनिधित्व करते हुए युगरत्‍ना ने कहा “वैश्‍विक रूप में एक हरित कार्यकर्त्ता के रूप में जो जलवायु परिवर्त्तन और सतत विकास के बारे में जागरूकता फैलाने के लिए प्रयासरत हूँ । मैं जलवायु परिवर्त्तन को लेकर बेहद चिंतित हूँ । आज समय आ गया है कि ठोस कदम उठाए जाएँ और कोपेनहेगेन में एक संधि पर सहमत बनाई जाए क्योंकि मैं नहीं चाहती कि आनेवाली पीढ़ी वही प्रश्न पूछे जो आज मैं आपसे कर रही हूँ ।
युगरत्‍ना के पास विश्‍व के नेताओं से पूछने के लिए कई सवाल थे । उसने कहा, हिमालय की बर्फीली चोटियाँ पिघलती जा रही है । ध्रुवीय भालुओं की जान पर खतरा बढ़ता जा रहा है । हर पाँच में से दो लोगों को पीने का साफ पानी नहीं मिलता । धरती का तापमान बढ़ रहा है । फसलों की उत्पादन क्षमता में लगाकर कमी आ रही है । प्रशांत महासागर के जलस्तर में वृद्धि हो रही है । क्या हम आनेवाली पीढ़ी को ये समस्याएँ भेंट में देना चाहते हैं ? लखनऊ के एक स्कूल में कक्षा नौ की छात्रा युगरत्‍ना ने जोश और आत्मविश्‍वास से भरी जब भाषण दे रही थी तब खचाखच भरे सदन में मौजूद १०० से ज्त्यादा देशों के प्रतिनिधियों में सन्नाटा व्याप्त था । इस मौके पर यूएन महासचिव बान की मून, अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा, चीन के राष्ट्रपति हू जिंताओं, भारत के विदेशमंत्री एस. एम. कृष्णा सहित कई अन्य नेता मौजूद थे ।
एस्ट्रोफिजिक्स में कैरियर बनाना चाहती है युगरत्‍ना ः
न्यूयॉर्क में संयुक्‍त राष्ट्र महासभा के सम्मेलन में ग्लोबल क्लाइमेंट पर भाषण देनेवाली युगरत्‍ना एस्ट्रोफिजिक्स में कैरियर बनाना चाहती है । उसके पिता डॉ. आलोक श्रीवास्तव को बेटी की इस उपलब्धि पर गर्व है, लेकिन उनका कहना है कि पर्यावरण पर काम करना, भाषण देना यह सब उसकी एकस्ट्रा एक्टिविटी में शामिल है । उसके पसंदीदा विषय है कंप्यूटर और गणित । उन्होंने बताया कि युगरत्ना हमेशा से टॉपर रही है लेकिन न्यूयॉर्क में भाषण देने के लिए जब न्योता आया तो युगरत्‍ना को नवीं कक्षा की पाँच परीक्षाएँ छोड़नी पड़ी । यह अलग बात है कि सेंट फेडलिस स्कूल ने उसके लिए अलग से परीक्षा कराने की छूट दे दी है । वास्तव में युगरत्‍ना ने देश, प्रदेश एवं लखनऊ का ही नहीं बल्कि तमाम युवावर्ग व महिला वर्ग तथा प्रतिभाशाली व्यक्‍तित्व का नेतृत्व किया है । अतः इन सबों की ओर से उन्हें कोटिशः बधाई ।
(- गोपाल प्रसाद )

गॉधी जयंती से शुरू होगी क्रांतिकारी ग्राम न्यायालय योजना


केन्द्र सरकार ने देश भर में पॉच हजार ग्राम न्यायालय शुरू करने की योजना बनाई है । गॉधी जयंती के मौके पर दो अक्टूबर को इस संबंध में अधिसूचना जारी की जाएगी । लंबित मुकदमों के जल्द निपटारे के लिए विधि-मंत्रालय ने यह फैसला लिया है । देश के ग्रामीण अंचलों में रहनेवाले ग्रामीणों के छोटे-मोटे विवादों का गॉव के स्तर पर ही समाधान की केन्द्र सरकार की महत्वाकांक्षी योजना के तहत ग्रामीण न्यायालयों की स्थापना दो अक्टूबर से अस्तित्व में आ जाएँगे । ग्रामीण न्यायालयों की स्थापना पर केन्द्र सरकार करीब ३२५ करोड़ रूपए सालाना खर्च करेगी । ग्रामीण न्यायालयों में विवादों का निपटारा करने के लिए प्रथम श्रेणी के न्यायिक मजिस्ट्रेट नियुक्‍त किए जा रहे हैं । इन न्यायिक मजिस्ट्रेट को न्याय अधिकारी के नाम से संबोधित किया जाएगा । केंद्र सरकार द्वारा विभिन्‍न राज्यों में स्थापना संबंधी कानून लागू करने के लिए अधिसूचना जारी की जा रही है । दरवाजे पर ही न्याय सुलभ कराने की इस अतिमहत्वपूर्ण योजना को मूर्त्त रूप देने में २३ साल लग गए हैं । ग्रामीण स्तर पर ही विवादों के निपटारे के लिए ग्राम न्यायालय स्थापित करने की सिफारिश सबसे पहले १९८६ में विधि आयोग ने अपनी ११४ वीं रिपोर्ट में की थी ।
विधि मंत्रालय के सचिव के अनुसार ये अदालतें पंचायत स्तर पर शुरू की जाएगी । अधिसूचना जारी होते ही राज्य सरकारें इस दिशा में पहल करेंगी । केंद्रीय विधि मंत्रालय के सचिव ने बताया कि इस प्रक्रिया में थोड़ा समय लगेगा । इस परियोजना पर होने वाले खर्च की वजह से राज्य सरकारों ने पहले रूचि नहीं दिखाई थी । प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने पिछले महीने संपन्‍न एक राष्ट्रीय सम्मेलन के दौरान राज्य सरकारों से इस दिशा में तुरंत जरूरी कदम उठाने को कहा था । पूरे देश में ३.११ करोड़ मामले लंबित हैं । इनमें २.७१ करोड़ मामलों को निचली अदालतों में निपटाया जा सकता है । ग्राम न्यायालयों की मदद से मुकदमों के निपटारे में तेजी आने और इससे आम लोगों को राहत मिलने की उम्मीद है । केन्द्र सरकार ने अगले वित्तीय वर्ष के दौरान २०० ग्राम अदालतें शुरू करने की योजना बनाई है । तीन साल के दौरान इनकी संख्या पाँच हजार करने की है । ग्राम न्यायालय अधिनियम २००८ के तहत प्रथम श्रेणी के न्यायाधीश को ऐसे मामलों की सुनवाई करनी है । इन न्यायाधीशों की न्याय अधिकारी कहा जाएगा तथा इनक पद एवं वेतन में किसी भी तरह का परिवर्त्तन नहीं किया जाएगा । जिला मुख्यालयों और तालुक में स्थापित की जानेवाली अदालतों की पूँजी खाते की पूरी लागत केंद्र वहन करेगा । अदालतें बस या जीप में गाँव जाएँगे और वहाँ मुकदमों का निस्तारण करेंगी । ऐसी अदालतों में मुकदमे का खर्च मुकदमा करनेवाले पक्षों को नहीं बल्कि राज्यों को वहन करना पड़ेगा ।
( गोपाल प्रसाद )

राजनीति की पाठशाला : एक नई पार्टी की नई पहल


राजनीति की पाठशाला

क्यों ?
राष्ट्र इस समय एक गंभीर राजनैतिक संकट से गुजर रहा है । हमें एक नए लीडर की सख्त जरूरत है जो नागरिकों को आदर और आत्म सम्मान दिला सके जो देश का हित अपने हित से उपर रख सके । राष्ट्रवादी चिन्तन और राष्ट्रनिर्माण के लिए हमें युवाओं की शत्‌-प्रतिशत भागीदारी सुनिश्‍चित करना होगा, क्योंकि आज की परिस्थितियों में राष्ट्र का निर्माण युवा हाथों से ही संभव है । अतः राजनीतिक शिक्षा ही इसका एक सशक्‍त माध्यम है ।

कैसे ?
हर देश की आत्म कहानी उनके नागरिकों के सुकर्मों- कुकर्मों से लिखी जाती है । अपने पाँव पर खड़े होने की कीमत चुकानी पड़ती है और घुटनों को टेककर जीने की भी कीमत चुकानी पड़ती है । फैसला आपका है- अत्याचार और अन्याय का विरोध न करना उसे बढ़ावा देना है । यह उन निष्ठावान लोगों का संगठन है जो उसूलों और सिद्वान्तों के आधार पर दुबारा से देश को अपराध, अन्याय, भ्रष्टाचार और गरीबी से आजाद कराने के लिए उतरे हैं ।
युवाओं को चुनाव लड़ने के लिए तैयार करना और उनको राजनीतिक प्रशिक्षण देना गरीब एवं मध्यम वर्ग के लोगों की शत्‌-प्रतिशत राजनीति में भागीदारी सुनिश्‍चित करना हमारा एक मात्र लक्ष्य है । हमारा मानना है, कि राजनीति की पाठशाला माध्यम है लाखों युवाओं की राजनीतिक योग्यता एवं उनकी महत्वाकांक्षाओं को सम्मान मिल सकेगा जो धनबल एवं बाहुबल के अभाव में अपने सपनों का गला घोटते हैं । इसीलिए भ्रष्ट एवं बेईमान लोग हम पर शासन करते हैं ।
बूथ स्तर पर प्रबन्धन, पंचायत स्तर पर प्रबन्धन, विधान सभा, लोक सभा इत्यादि पर चुनावी प्रबन्धन के माध्यम से चुनाव खर्चों को कम कर आम नागरिक एवं अच्छे लोगों को चुनाव लड़ने के लिए तैयार करना है ।

किसके लिए ?
हर सच्चा नागरिक सुख-समृद्धि और सुरक्षा से जीना चाहता है,इसके लिए आवश्यक है कि हम कायरता छोड़े अत्याचार एवं अन्याय के खिलाफ खड़े हों ।
यह देश भक्‍त लोगों के चयन का एक माध्यम है। उन्हें आगे लाकर आगे लाकर हमें अपने वास्तविक लक्ष्य को प्राप्त करना है। हमारा वास्तविक लक्ष्य युवा हाथों को मजबूत कर उनके लिए १०० प्रतिशत रोजगार की व्यवस्था सुनिश्‍चित करना है तथा आम आदमी जो गरीब है उसकी प्रति व्यक्‍ति आय को ५०० गुना बढ़ा कर उसकी क्रय क्षमता बढ़ानी है क्योंकि आर्थिक तरक्‍की ही गरीबी से छुटकारा का एक मात्र माध्यम है । स्वालम्बन की भावना को जागृत कर प्रत्येक व्यक्‍ति को आर्थिक आधार पर समृद्ध करने का मंत्र है राजनीति की पाठशाला ।

राजनीति का सामाजीकरण
राजनीति का अपराधीकरण जिस तरह से विगत वर्षों में हुआ है तथा हमारे रहनुमाओं ने जिस तरह से देश की सामाजिक सभ्यता को तार-तार किया है उसकी वजह से समाज में जातिगत आधार पर द्वेष एवं घृणा बढ़ी है तथा इस पीड़ा से हम सभी भली-भाँति अवगत है आज जरूरत है कि राजनीति के समाजीकरण पर बल दिया जाय ताकि देश में असमानता खत्म हो । हम सभी निष्ठावान लोग जो देश हित को व्यक्‍तिगत हित से उपर रखते हैं, वो भारत के प्रत्येक नागरिक को आदर एवं आत्म सम्मान दिला सकें ।
चिन्तन से परिवर्तन

स्वामी रामदेव (योग गुरू) - मैं देश में मानसिक परिवर्तन चाहता हूँ।
श्री अर्जुन नारायण देव (नेता बी. आर.एस.पी) - समर्पण एवं अनुशासन नेता बना सकते हैं।
श्री शिव खेड़ा (पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष बी. आर.एस.पी) - शिक्षा एवं न्याय के माध्यम से ही आजादी संभव है।
श्री संदीप दूबे (राष्ट्रीय युवा अध्यक्ष बी. आर.एस.पी) - मध्यम वर्ग के लोग भी नेता बन सकते हैं।
श्री मनोज पंडित (राष्ट्रीय युवा महासचिव बी.आर.एस.पी) - भारत का निर्माण युवा हाथों से ही संभव है ।
संजय पाण्डेय (राष्ट्रीय युवा सचिव बी.आर.एस.पी) - नेता जनता के नौकर हैं ।
इंजी. चन्द्र कान्त त्यागी (राष्ट्रीय महासचिव बी.आर.एस.पी.) -भारत के कुशासन को सुशाशन में बदलने के लिए युवाओं की भागीदारी आवश्यक है ।
श्री सुरेश मुद्‌गल (दिल्ली प्रदेश उपाध्यक्ष बी. आर.एस.पी.) - देश में राजनीति के सामाजीकरण की आवश्यकता है।
डा. संगीता बोरसे (युवा उपाध्यक्ष बी. आर.एस.पी) - सर्वप्रथम अपने आप को बदलो।
श्री राकेश कुमार सामा (नेता बी. आर.एस.पी.)-युवाओं के स्थिति में सुधार हुए बिना भारत का कल्याण संभव नहीं ।
श्री आर. के. जैन (नेता बी. आर.एस.पी.) - युवाओं को अपने मौलिक अधिकार समझने होंगे ।
श्री आर. के. टन्डन (नेता बी. आर.एस.पी.) - भ्रष्टाचार निवारण के लिए युवा ही देश में माहौल तैयार कर सकता है ।
श्री अवतार सिंह (नेता बी. आर.एस.पी.) -जनता को जागरूक बनना होगा, तभी उसके अधिकार सुरक्षित रह सकते हैं ।
श्री आर. के. गोयल (नेता बी. आर.एस.पी) - समानता के लिए जाति विहीन राजनीति का होना आवश्यक है ।
श्री अमित चौधरी (नेता बी. आर.एस.पी.)- संविधान में प्रदत्त समानता के मौलिक अधिकारों के रक्षार्थ राष्ट्रीय स्तर पर जनान्दोलन युवा ही खड़ा कर सकता है।
श्री गोपाल प्रसाद (सम्पादक, समय दर्पण) - वंशवाद में जकड़ी भारतीय राजनीति को मुक्‍त करना होगा ।
भारतीय राष्ट्रवादी समानता पार्टी के उद्देश्य

* राष्ट्र की एकता एवं अखण्डता को बनाए रखना ।
* अच्छे कानून एवं अच्छे लोगों के माध्यम से अच्छी सरकार लाना ।
* भ्रष्टाचार को पैदा करने वाले कारणों को मिटाकर भ्रष्टाचार समाप्त करना ।
* मानवीय एवं प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग करके सभी नागरिकों के जीवन की गुणवत्ता को सुधारना ।
* सभी नागरिकों को बेसिक शिक्षा, जीवनयापन, एवं गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सुविधाएँ उपलब्ध कराना ।
* समाज में विभाजन को रोकने के लिए जाति आधारित आरक्षण को समाप्त करने के लिए संकल्पित होना
* समाज के योग्य वर्ग के सुधार के लिए आर्थिक आधार पर “सकारात्मक एक्शन” प्रणाली स्थापित करना ।
* सभी नागरिकों, विशेषकर आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों के उत्थान के लिए समान अवसर स्थापित करना ।
* अवसरवादियों द्वारा अपने निहित स्वार्थ के लिए सांत्वना की नीति को खत्म करने के लिए दृढ़ रहना ।
* राष्ट्र की अनन्त समस्याओं के अन्त के लिए प्रभावी राष्ट्रीय जनसंख्या नियंत्रण नीति को अपनाने के लिए कार्य करना ।
* अवैध घुसपैठिए जो हमारे नागरिकों की जीविका छीन रहे हैं तथा देश के लिए खतरा बने हुए हैं, को वापस भेजना ।
* भारत को सार्वभौमिक रूप से मजबूत बनाने के लिए स्वतंत्र विदेश नीति अपनाना ।
* आतंकवाद एवं सीमा पार घुसपैठ से निपटने के लिए एक प्रभावी एवं व्यापक राष्ट्रीय सुरक्षा नीति लाना ।
* साक्ष्य सुरक्षा योजना एवं त्वरित न्याय पर जोर देकर आपराधिक न्याय प्रणाली में सुधार के लिए कार्य करना ।
* राजनीति के अपराधीकरण को समाप्त करना एवं चुनावी सुधार लाना ।
* समान सिविल संहिता जैसा कि भारत के संविधान के अनुच्छेद ४४ में वर्णित है को सुनिश्‍चित करना ।
* चरित्र निर्माण को समाहित करते हुए प्रभावी शिक्षा नीति द्वारा युवाओं का भविष्य सुरक्षित करना एवं भारत को वैश्‍विक नेता बनाने के लिए उनकी शक्‍ति का उपयोग करना ।
* कृषि जिस पर भारत की अधिकतम जनसंख्या आश्रित है, को लाभ का व्यापार बनाने के लिए हमारे किसानों को सम्पन्‍न बनाने के लिए एक नई कृषि नीति को लाने के लिए कार्य करना ।
* नियत-समय आधार पर आधारित संरचना बनाना एवं सामूहिक रोजगार अवसर सृजित करना एवं जीवन की गुणवता सुधारना ।
* किसी क्षेत्र विशेष में आधारिक संरचना के अत्यधिक भार को कम करने के लिए देश के सभी के सभी क्षेत्रों में संतुलित विकास सुनिश्‍चित करना ।
* व्यापक राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति लाना ।
* समान अवसर देकर स्त्रियों का सशक्‍तिकरण ।
* पर्यावरण सुरक्षा ।
* ऊर्जा स्व-निर्भरता ।
* देश के प्रशासन में सकारात्मक परिवर्त्तन लाने के लिए सभी अन्य प्रासंगिक एवं परिणामिक कार्य करना ।
(गोपाल प्रसाद )

Monday, September 14, 2009

साहित्य में अखिल भारतीय दृष्टिकोण के विकास में साहित्यिक पत्रिकाओं की भूमिका

साहित्य समाज का दर्पण होता है और यह दर्पण समाज को उसके रूप का दर्शन कराती है। साहित्य में अखिल भारतीय दृष्टिकोण के विकास में साहित्यिक पत्रिकाओं की भूमिका बडी महत्वपूर्ण है। दृष्टि के बगैर हम देख नही सकते । समाज में आ रहे नित्य नये बदलाव को साहित्य रूबरू दर्शाता है। सबसे महत्वपूर्ण आवश्यकता इस बात की है कि उसकी दशा और दिशा को सही मार्गदर्शन मिले ,क्योंकि यही सबसे बडी समस्या है। प्रख्यात अंतर्राष्ट्रीय प्रेरक शिव खेडा कहते हैं कि यदि समस्या है तो उसका समाधान भी है। ध्यान देने योग्य बात यह भी है कि आज साहित्य सृजन में दृष्टिकोण का घोर अभाव है । साहित्य क्रान्ति का माध्यम नहीं बन पा रही है । राष्ट्र को सर्वोपरि मानकर रचना नहीं की जा रही । हम स्थानीय मुद्दों और पुराने विषयों पर ही उलझे रहते हैं । मौलिक समस्याओं के साथ-साथ हमें समाधान की दृष्टि भी देनी पडेगी । भय, भूख, भ्रष्टाचार ,संस्कृति एवं नैतिकता को हम कहीं ना कहीं पूर स्थान नहीं दे पा रहे हैं और यहीं से शुरू होता है समाज में नई विकृतियों के पनपने का सिलसिला । मैकाले की शिक्षा पद्धति से क्या हमारी संस्कृति और नैतिकता कायम रह पायेगी? हमारी सांस्कृतिक धरोहर एवं मूल्य लुप्त हो रहें हैं । उसके संरक्षण हेतु लोककथा, लोकगीत, लोकनृत्य एवं लोकसंगीत को बचाना अत्यावश्यक है नहीं तो यह इतिहास बन जायेगा? यदि इसे जीवित रखना है तो हमें इसको अपने पत्रिकाओं में स्थान सुरक्षित रखना पडेगा। यह कितने आश्च्र्य का विषय है कि विदेशी हमारे संस्कृति पर नित्य नये शोध कर रहे हैं , अपना रहे हैं और हम अपने सांस्कृतिक विरासत को भूलते जा रहे हैं । अगर भारत को बदलना है तो समाज को बदलें और यदि समाज को बदलना है तो ढुलमुल दृष्टिकोण बदलें। हलाँकि यह भी ध्रुवसत्य है कि साहित्य में आज अनेक वर्ग पैदा हो चुके हैं । प्रथम राष्ट्रवाद, दूसरा कम्युनिज्मवाद , तीसरा दलित्वाद , चौथा नारीवाद, पाँचवाँ कट्टरवाद और छठा फूहडवाद । हम इस सत्य को नकार नहीं सकते । मेरे विचार से दृष्टिकोण ही वह एकमात्र समाधान है जिसके आधार पर सशक्त समाज एवं राष्ट्र की परिकल्पना की जा सकती है । २०२० के सपनों का भारत क्य किसी चमत्कार से प्रमुख स्थान ले लेगा? भारत सशक्त एवं अग्रणी था है और होगा तो मात्र अपने विचार के बलबूते ही ।
रविन्द्रनाथ ठाकुर के अनुसार “साहित्य का विचार करते समय दो वस्तुओं को देखना होता है । विश्‍व पर साहित्यकार के हदय का अधिकार कितना है, दूसरा उसका कितना अंश स्थायी आकार में व्यक्‍त हुआ है । इसी दोनों में सब समय सामंजस्य नहीं रहता है । जहाँ रहता है वहाँ सोने पे सुहागा है । रचनाकार की कल्पना-सचेतन हदय जितना विश्‍वव्यापी होता है उतना ही उनकी गंभीरता से हम सबों की परितृप्ति बढ़ती है । मानव- विश्‍व की सीमा से परे असरकार हमारे चिंतन विहार क्षेत्र में उतनी ही विपुलता प्राप्त करती है, परन्तु रचना-शक्‍ति निपुणता साहित्य में नितांत मूल्यवान है । जिसका सहारा लेकर यह शक्‍ति प्रकाशित होती है और अपेक्षाकृत तुच्छ होने के बावजूद बिल्कुल नष्ट नहीं होती है । वह शक्‍ति भाषा में साहित्य में संचित होती रहती यह मनुष्य के अभिव्यक्‍ति की क्षमता को बढ़ा देती है । इस क्षमता को पाने के लिए मनुष्य सदा से व्याकुल है । जिसके माध्यम से मनुष्य की यह क्षमता परिपृष्ट होती है उनको यश देकर अपने ऋण चुकाने की चेष्टा करें तो यही सार्थकता होगी ।
इसके अतिरिक्‍त राष्ट्रीय स्तर पर प्रकाशित होनेवाले साहित्यिक पत्रिकाओं को आपस में समन्वय और संवाद भी स्थापित करने होंगे । समय के बदलते परिवेश में सूचना क्रांति की नई तकनीक इंटरनेट को अपनाकर साहित्यिक पत्रिकाएँ अपने साहित्य के ब्रह्यास्त्र से अखिल भारतीय दृष्टिकोण का विकास एवं सार्थकता प्राप्त कर सकती है । सूचना एवं ज्ञान को प्रवाहित करने से ही विकास की धारा बहेगी । शिक्षा, भाव और अवस्था परिवर्तन के बावजूद जो रचनाएँ अपने महिमा की रक्षा करती चली आ रही है उसकी अग्निपरीक्षा हो चुकी है । दृष्टिकोण के अभाव में चिंतन एवं सृजन का स्वरूप वास्तविक धरातल पर नहीं होता है बल्कि भटक जाता है । इसलिए मंजिल को पाने हेतु दृष्टिकोण की खास महत्ता है । साहित्यिक पत्रिका से जुड़ाव रखनेवाले उच्च कोटि के बौद्धिक स्तर वाले माने जाते हैं जिन्हें स्पष्ट दिशा निर्देश एवं दृष्टिकोण की ज्यादा जरूरत है क्योंकि यही वह शक्‍ति है जिसके द्वारा सम्पूर्ण समाज एवं राष्ट्र की दशा एवं दिशा निर्धारित होती है । साहित्य में दलित चिंतन, उपेक्षितों की सामूहिक आवाज एवं जहाँ अभी तक अँधेरा है पर केंद्रित सृजन किए जाने की परमावश्यकता है ।
(-गोपाल प्रसाद )

Wednesday, September 9, 2009

भारतीय भाषाओं के संरक्षण की चुनौती और साहित्यिक पत्रिकाएँ



प्रसिद्ध साहित्यकार रामविलास शर्मा के आलेख "जाति, जनपद , राष्ट्र और साहित्य" के अनुसार -नागार्जुन ने मैथिली में कविताएँ लिखी हैं ,केदार और त्रिलोचन ने अवधी में । जनपदीय भाषा के माध्यम से ये कवि अपने क्षेत्र के किसानों तक कुछ पढे-लिखे लोगों तक पहुँचते हैं । हिन्दी उर्दू दो जातियों की भाषाएँ नहीं है, वे एक ही जाति के भाषा के दो रूप हैं। इन दो रूपों में जो समानता है वह बुनियादी है , जो भिन्नता है वह गैर-बुनियादी है। उर्दू जितना ही जनपदीय भाषा के नजदीक आएगी उतना ही हिन्दी से उसका अलगाव कम होगा । जिन देशों में पूँजीवाद का भरपूर विकास हुआ है , उनमें भी जनपदीय भाषाएँ पूरी तरह अन्तर्धान नहीं हुई। भारत में वे बहुत दिनों तक रहेंगी और निरंतर जातीय भाषाओं को प्रभावित करेंगी। जिस प्रांत में में ८५% किसान हो ;वहाँ नागरिक भाषाएँ उससे प्रभावित हुए बिना कैसे रह सकती है?उल्टा सुबोध होने के लिये उसे अपना रूप बदलना होगा।अपने विकास के लिये उसे गाँवों में जाना होगा , जहां जीवन का स्त्रोत है और प्रकृति के संसर्ग में जहाँ भाषा की जातीयता गढी जाती है। प्रेमचन्द की हिन्दी जनपदीय भाषाओं के नजदीक होने के कारण ही लोकप्रिय हुआ । भाषा की की समस्या सुलझाने के लिये हमने अपने गाँवों की भाषाओं में व्याप्त एक जातीयता और नैसर्गिक संस्कृति की ओर अभी तक उचित ध्यान नहीं दिया । पचास अथवा सौ बर्ष आगे चलकर जो खडी बोली देश के कोने- कोने में गूँजेगी उसका आज की खडी बोली से कितना विभिन्न रूप होगा , इसकी कल्पना की जा सकती है। लोग अनुभव कर रहे हैं कि हिन्दी- उर्दू का झगडा मिटाने के लिये हमें अपनी भाषा को देहाती उपभाषाओं की सहज विकसित जातीयता के अनुरूप गढना होगा। तुलसीदास और सूरदास जैसे कवियों की भाषा की शक्ति का बहुत बडा कारण उनका जनपदीय स्वभाव है। सूरदास की भाषा ब्रज के बाहर हिन्दी के अन्य जनपदों में तो लोकप्रिय है ही , वह हिन्दी प्रदेश के बाहर अन्य प्रदेशों में भी लोकप्रिय है। भारतेन्दु हरिश्चन्द ,प्रताप नारायण मिश्र ,बालमुकुन्द गुप्त ,प्रेमचन्द के गद्य हमारी जातीय भाषा का बहुत अच्छा नमूना है। जातिय भाषा का नमूना उनका हिन्दी गद्य है,उर्दू गद्य या पद्य नहीं । इसका कारण यह है कि हिन्दी तो संस्कृत शब्दों को तद्भव रूप में ले लेती है, उर्दू अरबी-फारसी शब्दों को तद्भव रूप में नही लेती लेकिन जनपदीय भाषायें अरबी फारसी शब्दों का चोला बदलने में थोडा भी हिचकती नही है। यही नीति मराठी और बांग्ला जैसी भाषाओं की भी है। संगीत की पुरानी बंदिशें आज भी अत्यधिक लोकप्रिय है । हमारी संगीत परंपरा एक है ,उसी तरह हमारी भाषायी परंपरा एक है । हिन्दी उर्दू का अलगाव अस्थायी है । मान लीजिए हिन्दी प्रदेश में हिन्दी उर्दू जैसा भेद न होता तो सांप्रदायिक भेदभाव को खत्म करने में कितनी सहायता मिलती ,सारे देश की श्रमिक जनता को संगठित करना कितना ज्यादा आसान होता अपने लिये और देश के लिये हमें हिन्दी उर्दू का अलगाव सचेत प्रयास द्वारा खत्म करना चाहिये । वर्तमान व्यवस्था को बदलने के लिये हिन्दी प्रदेश के किसान मजदूर जहाँ एक बार गतिशील हुए वहाँ का भाषायी मानचित्र बदले बिना नही रहेगा और उसका प्रभाव संपूर्ण देश की सामाजिक, सांस्कृतिक स्थिति पर पडेगा। इसके लिये हिन्दी जाति के विकास ,उसकी भाषा और साहित्य की परंपराओं , जनपद और जाति के संबंध जाति और राष्ट्र के संबंध , भारतीय चिंतन और मार्क्सवाद के संबंध को समझना जरूरी है। अंग्रेजों ने यहाँ अपना राज कायम करके समाज का पुराना ढाँचा तोडा, देश का उद्योगीकरण किया ,ज्ञान- विज्ञान की शिक्षा दी ,साहित्य और संस्कृति में आधुनिक युग का सूत्रपात किया । अंग्रेजी राज की इस प्रगतिशील परंपरा को ’मार्क्सवाद’ बढा रहा है। हिन्दी जाति संख्या में भारत की सबसे बडी जाति है । यहाँ जो कुछ भला बुरा होता है ,उसका प्रभाव हिन्दी प्रदेश तक सीमित नहीं रहता , सारे प्रदेश पर पडता है । यहाँ की जनता के संगठित अभियान के बिना देश की वर्तमान व्यवस्था को बदलना असंभव है। आज सही दिशा में साहित्य के विकास को प्रेरित किये जाने की आवश्यकता है । यह स्पष्ट हो चला है कि राजनीति में पूँजीवादी नेतृत्व देश को वर्तमान संकट से उबार नही सकती । वैचारिक दृष्टि से सुदृढता और व्यवस्था को बदलने के लिये अटूट मनोबल का परिचय जब तक नही देंगे तब तक अनुकूल परिस्थितियाँ होने पर भी व्यवस्था में कोई परिवर्तन नही होगा । राजनीति और साहित्य दोनों के लिये भाषा महत्वपूर्ण है । अष्टम अनुसूची में शामिल भारतीय भाषाओं की सूची में प्रमुख भाषा मैथिली अन्य भारतीय भाषाओं के अनुवाद एवं विलुप्तप्राय संस्कृति के संरक्षण ,संवर्द्धन में तेजी के साथ आगे कदम बढा रही है। साहित्य अकादमी द्वारा अनेक पुस्तकें (संस्कृति के संरक्षण एवं संवर्द्धन पर) प्रकाशित की गयी है। भारतीय भाषा संस्थान ,मैसूर द्वारा भारतीय भाषाओं के संरक्षण हेतु साहित्यिक पत्रिकाओं को प्रोत्साहित किया जा रहा है । आज आवश्यकता इस बात की है कि हिन्दी के मूल स्वरूप के साथ-साथ अन्य भारतीय भाषाओं की छौंक भी लगयी जाय जिससे भाषा के सम्मान के साथ-साथ साहित्य का अलग जायका प्रस्तुत हो सके । दिल्ली पुस्तक मेला में बिहार के सिवान जिले की मूल निवासी लेखिका आशारानी लाल की लोकार्पित पुस्तक "लौट चलें" में हिन्दी के साथ-साथ भोजपुरी शब्दों का प्रयोग एक नया आयाम प्रदान करता है । राष्ट्र्भाषा के साथ मातॄभाषा के प्रयोग से मातृभाषा का ही नही राष्ट्रभाषा का सम्मान भी बढेगा । इस मूल तथ्य को चुनौती के रूप में स्वीकार करने की जरूरत है । देखना यह है कि आने वाले समय में साहित्यिक पत्रिकाएँ इस चुनौती को कितना स्वीकार कर पाने में सक्षम है ?
(-गोपाल प्रसाद)

Thursday, September 3, 2009

हीन नहीं है हिंदी

“निज भाषा उन्‍नति अहै, सब उन्‍नति को मूल बिन निज भाषा ज्ञान के, मिटत न हिय को सूलअंग्रेजी पढ़ि के जदपि, सब गुन होत प्रवीनपे निज-भाषा-ज्ञान बिन, रहत हीन के हीन” - भारतेन्दु हरिश्‍चन्द्र
हिन्दी की व्यापकताहिंदी भाषा को संसार भर में सबसे अधिक बोली जानेवाली भाषाओं में से एक होने का सम्मान प्राप्त है और यह विश्‍व के ५६ करोड़ लोगों की भाषा है । आँकड़े बताते हैं कि भारत में ५४ करोड़ तथा विश्‍व के अन्य देशों में २ करोड़ हिंदी भाषी हैं । नेपाल में ८० लाख, दक्षिण अफ्रीका में ८।९० लाख , मॉरीशस में ६.८५ लाख, संयुक्‍त राज्य अमेरिका में ३.१७ लाख, येमन में २.३३ लाख, युगांडा में १.४७ लाख, जर्मनी में ०.३० लाख, न्यूजीलैंड में ०.२० लाख तथा सिंगापुर में ०.०५ लाख लोग हिंदी भाषी हैं । इसके अलावा यू. के. तथा यू. ए. में भी बड़ी संख्या में हिंदीभाषी लोग निवास करते हैं । विश्‍व की सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषाओं में हिंदी का स्थान दूसरा है । हिंदी भाषा अंतरजाल की प्रमुख भाषाओं में से एक बनने की पूर्ण योग्यता रखती है और निकट भविष्य में वह अपने लक्ष्य को पूर्ण करने में अवश्य ही सफलता प्राप्त कर लेगी । हिंदी के विकास में हम सभी को अपना योगदान देना होगा और इसे अंतरजाल की प्रमुख भाषाओं में से एक बनने में सफल बनाना होगा । मानसिकता और हिंदी भारतेन्दु हरिश्‍चन्द्र ने कहा था कि “विदेशी भाषा से कभी तरक्‍की नहीं हो सकती । विदेशी भाषा अपनाना परतंत्रता का प्रतीक है । ” अंग्रेजी अपनाकर हम वास्तव में गुलामी की ओर ही बढ़ेंगे । हमें अंग्रेजी का विरोध करने के बजाय हिंदी के दायरे को बढ़ाने की दिशा में सोचना होगा । हिंदी भाषा ही नहीं बल्कि यह हमारी संस्कृति भी है और संस्कृति की रक्षा करना उसका संरक्षण व संवर्द्धन हमारा कर्तव्य है । कुछ अंग्रेजी ‘मानसिकता वाले अफसरशाहों एवं अंग्रेजी मीडीया और इंटरनेट की वजह से अंग्रेजी प्रभावशाली दिखती है परन्तु वास्तव में ऐसा नहीं है । “विशिष्ट पहचान पत्र परियोजना” के प्रमुख नंदन नीलेकणी द्वारा लिखित पुस्तक “इमेजिनिंग इंडिया” में अंग्रेजी का दबदबा बढ़ने का प्रमुख कारण मैकाले की नीति को बताया गया है । नंदन नीलेकणी कहते हैं कि - भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी भारी वित्तीय संकट का सामना कर रही थी । यहां तक कि वह दिवालिया होने की कगार पर पहुंच चुकी थी । वर्ष १८२८ में गवर्नर जनरल विलियम बेंटिक को कंपनी की प्रशासनिक लागत कम करने का जिम्मा देकर भारत भेजा गया । उनकी एक सिफारिश यह थी कि कंपनी के न्यायिक और प्रशासनिक काम से ब्रिटिश कर्मचारियों को हटा कर उनकी जगह सस्ते भारतीय ग्रेजुएट रखे जाएं । अपने इस मकसद को पूरा करने के लिए उन्होंने ईस्ट इंडिया कंपनी १८३३ के चार्टर एक्ट में एक प्रावधान जुड़वाया । इसके तहत किसी भी सरकारी नौकरी के लिए धर्म, जाति जन्म वंश का कोई बंधन नहीं था । लेकिन अंग्रेजी में पारंगत लोगों का वर्ग तैयार करने के लिए अंग्रेजी शिक्षा से संबंधित नीति की जरूरत होती । इसके लिए अंग्रेजी शिक्षा से संबंधित नीति की जरूरत होती । इसके लिए बेंटिक को अधिकारियों की एक टीम से जद्दोजहद करनी पड़ी, जो इस बात पर बंटी हुई थी क्या यहां सीधे-सीधे अंग्रेजी थोप कर अंग्रेजी शिक्षा को बढ़ावा दिया जा सकता है । लेकिन जब तक १८३४ में थॉमस मैकाले जनरल कमेटी ऑफ पब्लिक इंस्ट्रक्शन के नए अध्यक्ष बनकर आए तब तक अधिकारियों का एक बड़ा वर्ग अंग्रेजी शिक्षा नीति के पक्ष में लामबंद हो चुका था । मैकाले ने पूरी शिद्दत के साथ अंग्रेजी शिक्षा की नीति को लागू करने पर जोर दिया । २ फरवरी, १८३५ की बैठक के अपने विवरण में उन्होंने भारतीय शिक्षा पद्धति को खारिज कर दिया । मैकाले ने अंग्रेजी भाषा में दीक्षित भद्रलोक बनाने की बेंटिक की सोच का समर्थन किया । उन्होंने कहा, हमें एक ऐसा वर्ग तैयार करना है जो हमारे और उन करोड़ों भारतीयों के बीच दुभाषिये का काम कर सके, जिन पर हम शासन करते हैं । हमें भारतीयों का एक ऐसा वर्ग तैयार करना है, जिनका रंग और रक्‍त भले ही देशी हो लेकिन वह अपनी अभिरूचि, विचार, नैतिकता और बौद्धिकता में अंग्रेज हों । मैकाले इस नीति पर अड़े हुए थे और उन्होंने साफ-साफ बता दिया कि अगर उनकी सिफारिशों को मंजूर नहीं किया गया तो वो परिषद से इस्तीफा दे देंगे । मैकाले की सिफारिशों को लागू किए जाने की राह में कोई अड़चन नहीं थी । बेटिंक मैकाले के समर्थक थे । इस तरह ब्रिटिश भारत की शिक्षा नीति जल्द ही बदल गई । अंग्रेजी प्रशासनिक कामकाज की भाषा बन गई । १८३५ में इंग्लिश एजुकेशन एक्ट लागू होने के तीन साल के अंदर ही अंग्रेजी प्रशासनिक कामकाज की भाषा बन गई । ईस्ट इंडिया कंपनी ने घोषणा की कि अंग्रेजी में पढ़े-लिखे भारतीय को सार्वजनिक क्षेत्र की नौकरियों में प्राथमिकता मिलेगी । इस तरह १८५७ में अंग्रेजी भाषा में शिक्षा के लिए तीन विश्‍वविद्यालयों की स्थापना हुई । इतिहासकार रॉबर्ट किंग का मानना है कि अंग्रेजी को आगे बढ़ाना एक तरह से देशी भाषाओं के खिलाफ उठाया गया कदम था । कन्‍नड़ और तमिल जैसी देशी भाषाएं तो अंग्रेजी से कई सदी पुरानी थीं । इस तरह अंग्रेजी को साम्राज्यवाद के एक हथियार के तौर पर देखा जाने लगा । अंग्रेज इसका इस्तेमाल इस देश पर अपना अधिकार जमाने के लिए करने लगे । अंग्रेजों के सामने भारतीयों की स्थिति दबे-कुचलों की तरह हो गई । उनकी गरदन साहब और मेमसाहबों और उनकी टोपी के आगे झुकी रहने लगी । हालांकि भारतीयों के एक छोटे से वर्ग ने अंग्रेजी माध्यम में शिक्षा का स्वागत किया । खासकर भद्रलोक के वर्ग ने । इस भाषा की वजह से उन्हें शेष भारतीयों पर अपना रोब गालिब करने की मौका जो मिल रहा था । इस वर्ग ने इसे सांस्कृतिक प्रतिष्ठा का सवाल माना और खुद को आम लोगों से ऊपर रखा । अंग्रेजी भद्रलोक का गहना बन गई । इसका समर्थन करने वाले अंग्रेजी रहन-सहन और खाने-पीने की नकल करने लगे । जल्द ही अंग्रेजी कैरियर की भाषा बन गई । अंग्रेजों के शासन में भारत पूरी तरह उद्योगविहीन हो गया । इसलिए प्रशासनिक नौकरी भारतीयों के लिए कैरियर का एक मात्र जरिया बन गई । लिहाजा भारतीयों का एक वर्ग तेजी से इस भाषा का पक्षधर होता गया । वर्ष १९०० तक अंग्रेजी शिक्षा भारत में काफी लोकप्रिय हो गई । भारतीय राजभाषा है हिंदीहिंदी को भारत की राजभाषा के रूप में १४ सितंबर १९४९ को स्वीकार किया गया इसके बाद संविधान में राजभाषा के संबंध में धारा ३४ उसे ३५२ तक की व्यवस्था की गई । इसकी स्मृतिको ताजा रखने के लिए १४ सितंबर का दिन प्रतिवर्ष “हिन्दी दिवस” के रूप में मनाया जाता है । धारा ३४३ (१) के अनुसार भारतीय संघ की राजभाषा हिंदी एवं लिपि देवनागरी है । हिंदी को राजभाषा का सम्मान कृपा पूर्वक नहीं दिया गया बल्कि यह उसका अधिकार है । महात्मा गाँधी ने राष्ट्रीय भाषा (राजभाषा) लक्षणों पर जो दृष्टिपात किया था वह निम्नलिखित है ः - १ * अमलदारों के लिए वह भाषा सरल होनी चाहिए । २ * उस भाषा के द्वारा भारतवर्ष का आपसी धार्मिक, आर्थिक और राजनीतिक व्यवहार हो सकना चाहिए । ३ * यह जरूरी है कि भारतवर्ष के बहुत से लोग उस भाषा को बोलते हैं । ४ * राष्ट्र के लिए वह भाषा आसान होनी चाहिए । ५ * उसे भाषा का विचार करते समय किसी क्षणिक या अल्पस्थायी स्थिति पर जोर नहीं देना चाहिए । स्पष्टतः उपरोक्‍त लक्षणों पर हिंदी भाषा पूर्णतः खरी उतरती है । हिंदी और ममता बनर्जी रेल मंत्री ममता बनर्जी अपने मनमानेपन और व्यक्‍तिवादिता के लिए मशहूर हैं लेकिन वे इस हद तक जाएंगी कि रेलवे की नौकरी की परीक्षा के प्रश्नपत्र सिर्फ अंग्रेजी और क्षेत्रीय भाषाओं में ही देने की इजाजत देंगी, हिंदी को इससे अलग कर देंगी, इस पर विश्‍वास नहीं होता । ‘नईदुनिया’ की खबर के अनुसार अभी तक सिर्फ ग्रुप-डी की नौकरियों की परीक्षा अंग्रेजी, हिंदी तथा क्षेत्रीय भाषाओं में होती थी लेकिन अब ग्रुप-सी की नौकरियों में भी क्षेत्रीय भाषाओं में परीक्षा लेने की तैयारी है जिसकी प्रक्रिया बहुत पहले से चल रही थी । मगर ममता बनर्जी करने यह जा रही हैं कि ये परीक्षाएं गैरहिंदीभाषी राज्यों में सिर्फ अंग्रेजी तथा क्षेत्रीय भाषाओं में ली जाएं। अगर ऐसा है तो यह गंभीर बात है और उम्मीद करनी चाहिए कि मंत्रालय के नौकरशाहों की उच्चस्तरीय समिति - जिसका इस उद्देश्य से गठन किया गया है - इसकी अनुमति नहीं देंगी । हिंदी देश की राजभाषा है संवैधानिक रूप से और कोई भी मंत्री चाहे भी तो उसके साथ छेड़छाड़ नहीं कर सकता । फिर ऐसा कोई बदलाव ममता बनर्जी चाहती हैं तो उन्हें मंत्रिमंडल की बैठक में यह प्रस्ताव लाना होगा । फिर देश में संसद भी हैं, अदालतें भी हैं जो ऐसा असंवैधानिक काम नहीं होने देंगी लेकिन ममता बनर्जी को यह ख्याल भी कैसे आया कि वे संविधान के विरूद्ध जा सकती हैं? निश्‍चित रूप से रेलवे के बड़े से बड़े पदों की परीक्षा भी अंग्रेजी के साथ हिंदी तथा उन समस्त क्षेत्रीय भाषाओं में होनी चाहिए जिन्हें संविधान की आठवीं अनसूची में स्थान दिया गया है । इससे किसी का कोई विरोध नहीं हो सकता बल्कि ऐसे किसी कदम की प्रशंसा ही की जानी चाहिए लेकिन हिंदी को जो दर्जा संविधान में मिला हुआ है, वह सोच-समझकर दिया गया है इसलिए किसी को भी हिंदी तथा क्षेत्रीय भाषाओं को लड़ाने की कोई व्यर्थ कोशिश नहीं करनी चाहिए । इससे किसी मंत्री का थोड़ा-बहुत फायदा हो सकता है लेकिन देश का नुकसान होगा । भाषा-विवाद अभी शांत है, भाषा को लेकर कट्टरवादिता अब पुरानी चीज हो गई है, तब ममता बनर्जी को इस विवाद को उछालना नहीं चाहिए ।
हिंदी संवैधानिक रूप से भारत की प्रथम राजभाषा है और भारत की सबसे ज्यादा बोली और समझी जानेवाली भाषा है । चीनी के बाद यह विश्‍व में सबसे अधिक बोली जानेवाली भाषा भी है । हिंदी और इसकी बोलियाँ उत्तर एवं मध्य भारत के विविध प्रान्तों में बोली जाती हैं । भारत और विदेश में ६० करोड़ (६०० मिलियन) से अधिक लोग हिंदी बोलते, पढ़ते और लिखते हैं । फिजी, मॉरीशस, गयाना, सूरीनाम की अधिकांश और नेपाल की कुछ जनता हिंदी बोलती है । हिंदी राष्ट्रभाषा, राजभाषा, सम्पर्क भाषा, जनभाषा सोपानों को पारकर विश्‍वभाषा बनने की ओर अग्रसर है कि आने वाले समय में विश्‍वस्तर पर अंतरराष्ट्रीय महत्व की जो चंद भाषाएं होंगी उनमें हिंदी भी प्रमुख होगी । हिंदी एवं उर्दूभाषाविदों की राय में हिन्दी और उर्दू एक ही भाषा है । हिंदी देवनागरी लिपि में लिखी जाती हैं और शब्दावली के स्तर पर अधिकता हमलोग संस्कृत के शब्दों का प्रयोग करते हैं । उर्दू फारसी लिपि में लिखी जाती है और शब्दावली के स्तर पर उसपर फारसी अरबी भाषाओं का ज्यादा असर है । व्याकरणिक रूप से उर्दू और हिंदी में लगभग शत-प्रतिशत समानता है । कुछ विशेष क्षेत्रों में शब्दावली के स्त्रोत में अंतर होता है । कुछ खास ध्वनियाँ उर्दू में अरबी फारसी से ली गई है और इसी तरह फारसी और अरबी के कुछ खास व्याकरणिक संरचना भी प्रयोग की जाती है । इसलिए उर्दू को हिंदी की एक शैली माना जा सकता है । परिवार हिंदी हिन्द-यूरोपीय भाषा परिवार के अंतर्गत आती है । ये हिंदी ईरानी शाखा के हिन्द आर्य उपशाखा के अंतर्गत वर्गीकृत है । हिन्द आर्य भाषाएं वो भाषाएं हैं जो संस्कृत से उत्पन्‍न हुई हैं । उर्दू, कश्‍मीरी, बंगाली, पंजाबी, सेमानी, मराठी, नेपाली जैसी भाषाएं भी हिंद आर्य भाषाएँ हैं । हिंदी की विभिन्‍न बोलियाँ और उनका साहित्य हिंदी की विभिन्‍न बोलियाँ (उपभाषाएँ) हैं । इनमें से कुछ में अत्यंत उच्च श्रेणी के साहित्य की रचना हुई है । ऐसी बोलियों में ब्रज भाषा और अवधी प्रमुख है । यह बोलियाँ हिंदी की विविधता और उसकी शक्‍ति हैं जो हिंदी की जड़ों को और गहरा बनाती है । हिंदी की बोलियाँ और उन बोलियों की उपबोलियाँ अपने में एक बड़ी परंपरा, सभ्यता और इतिहास को समेटे हुए हैं वरन्‌ स्वतंत्रता संग्राम, जनसंघर्ष, वर्तमान के बाजारवाद के खिलाफ भी उसका रचना संसार सचेत है । हिंदी की बोलियों में प्रमुख हैं - अवधी, बृजभाषा, कन्‍नौजी, बुंदेली, बघेली, भोजपुरी, हरियाणवी, छत्तीसगढ़ी, मालवी, झारखंडी, कुमाऊँनी आदि । अर्थात विभिन्‍न प्रदेशों में हिंदी के रंग-ढंग में कुछ परिवर्तन अवश्‍य दिखेगा । हिंदी भाषा का भौगोलिक विस्तार काफी दूर-दूर तक है जिसे तीन क्षेत्रों (हिंदी क्षेत्र, अन्य भाषा क्षेत्र, भारतेत क्षेत्र) में विभक्‍त किया जा सकता है ।हिंदी क्षेत्र में हिंदी की मुख्यतः सत्रह बोलियाँ बोली जाती हैं जिन्हें पाँच बोली वर्गों में इस प्रकार विभक्‍त करके रखा जा सकता है - पश्‍चिमी हिंदी, पूर्वी हिंदी, राजस्थानी हिंदी, पहाड़ी हिंदी और बिहारी हिंदी । (मैथिली, भोजपुरी मंत्र ही, अंगिला, बज्जिका ) अन्य भाषा क्षेत्र में प्रमुख बोलियाँ इस प्रकार हैं - दक्खिनी हिंदी (गुल्बर्गी, बीदरी, बीजापुरी, तथा हैदराबादी आदि) बंबईया हिंदी, कलकतिया हिंदी तथा शिलंगी हिंदी (बाजार-हिंदी) आदि । भारत के बाहर भी कई देशों में हिंदी भाषी लोग काफी बड़ी संख्या में बसे हैं । सीमावर्ती क्षेत्रों के अलावा यूरोप,अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, अफ्रीका, रूस, जापान, चीन तथा समस्त दक्षिण पूर्व व मध्य एशिया में हिंदी बोलनेवालों की बहुत बड़ी संख्या है । लगभग सभी देशों की राजधानियों के विश्‍वविद्यालयों में हिंदी एक विषय के रूप में पढ़ी-पढ़ाई जाती है । भारत के बाहर हिंदी की प्रमुख बोलियाँ- ताजुज्बेकी हिंदी, मॉरिशसी हिंदी, फीजी हिंदी, सूरीनामी हिंदी आदि हैं । हिंदी का पुस्तक व्यवसाय आज के युग में हिन्दी पुस्तक व्यवसाय इतना अधिक गिर चुका है कि पुस्तक लोग खरीद कर पढ़ना नहीं चाहते बल्कि हिन्दी के रीडरों को अच्छा वेतन मिलता है, अपने बच्चों को चन्दा मामा बाल सखा पत्रिका खरीद कर नहीं दे पाते । बच्चा यदि किसी पत्रिका की दुकान पर अड़ जाता है, पापा चन्दा मामा लेंगे, उन अच्छे बच्चों को यही कह कर बहला देते हैं, चलो हम ला देंगे । यदि अच्छे रीडरों को पेपर सेटिंग के लिये पैसे भी दिये जाते हैं तो उनको किसी कविता या लेख को अर्जित करना हो तो प्रकाशकों से पुस्तकें मांगकर पेपर सेट करते हैं, ये अच्छे रीडर बीस रूपये की पुस्तकें नहीं खरीद सकते उधार मांग कर पेपर सेट करके पुस्तकें बुक्सेलरों को वापस कर देते हैं । ऐसे में हिन्दी पुस्तक व्यवसाय धरातल में पहुँच रहा है । कुछ तो टेलीविजन भी एक कारण है । हम हिन्दी प्रांत के होकर भी ऐसा कटु अनुभव हिन्दी के प्रति हो गया है । लोगों का कहना है हिन्दी हमारी राष्ट्र भाषा है ।
(गोपाल प्रसाद)