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Thursday, July 16, 2009
सट्टा बाजार का आकलन और लोकसभा चुनाव
लोकसभा चुनाव के नतीजों का पिटारा भले ही 16 मई को खुला परंतु सट्टा बाजार में प्रधानमंत्री पद की दौड़ में लालकृष्ण आडवाणी के बजाय मनमोहन सिंह और मराठा नेता शरद पवार ही थे । अक अनुमान के अनुसार चुनाव के नतीजे पर लगभग 10,000 करोड़ रूपए का सट्टा लगाया गया था, जिसमें कांग्रेस के सबसे अधिक सीटें हासिल करने पर दाँव लगाया गया था । देश में सट्टे का बाजार असंगठित है और इसे अवैध तरीके से चलाया जाता है । इस बाजार का मानना था कि कांग्रेस के नेतृत्ववाला यूपीए चुनाव के बाद 275 से अधिक सीटों के साथ सबसे बड़े गठबंधन के तौर पर उभरेगा । यूपीए के लिए 90 पैसे और एनडीए के लिए 1.10 रूपए का भाव दिया जा रहा था । राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार आडवाणी को सट्टेबाजों ने ज्यादा अहमियत नहीं दिया । सट्टा बाजार में प्रधानमंत्री पद के लिए मुकाबला मनमोहन सिंह और शरद पवार के ही बीच था । दिल्ली, मुंबई, अहमदाबाद, बड़ौदा, राजकोट, बिहार के सीमावर्ती इलाके एवं पड़ोसी राष्ट्र नेपाल के विराटनगर की खुलेआम भविष्यवाणी कर रहे थे । नेपाल में जारी राजनैतिक संकट के बावजूद सटोरियों की पैनी नजर भारत के लोकसभा चुनाव पर लगी थी । विराटनगर स्थित “श्री मारवाड़ी अतिथि सदन” के समीप सुबह से शाम तक सटोरियों की भारी भीड़ लगी रहती थी । हर कोई अपने आकलन के मुताबिक हार-जीत से लेकर सरकार बनाने तक में करोडों रुपए तक का दाँव लगाया था । यूँ तो सट्टा लगाने का खेल वर्षों पुराना है लेकिन भारत के लोकसभा चुनाव परिणाम में सटोरियों ने ज्यादा रूचि दिखाई । प्रधानमंत्री के नाम के बाद किस पार्टी को कितनी सीटें मिलेंगी, कौन गठबंधन में रहेगा आदि पर भी सट्टा लगाया गया था । कांग्रेस की स्थिति में परिणाम के कुछ ही दिन पूर्व परिवर्तन से सटोरियों ने उसे सबसे ज्यादा सीटें मिलने के दाव पर भाव घटा दिए हैं । सट्टा बाजार में भाव गिरना मजबूती और चढ़ना कमजोरी का संकेत माना जाता है । एक्जिट पोल के विपरीत सटोरिए लोगों की रायशुमारी के बनिस्बत जमीनी स्तर पर अपने व्यापक संपर्कों से लोगों का रूख भाँप कर भाव बोलते हैं । इसलिए सट्टा बाजार पर नेताओं को भी ज्यादा विश्वास रहता है । राजस्थान के पिछले दो विधानसभा एवं लोकसभा चुनाव में सट्टा बाजार एक्जिट पोल के मुकाबले सही साबित हुआ है ।
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