Saturday, July 24, 2010

आम आदमी को महंगी पड़ी यूपीए सरकार

कांग्रेस का चुनावी नारा, आम आदमी के बढ़ते कदम और हर कदम पर भारत बुलंद को पिछले एक साल में काफी सत्यापित किया है, हालांकि आम आदमी के कदम तो बढने के बजाय घटते दिखाई दे रहे है । एक तरफ महंगाई ने जहाँ उसके कदमों को कमजोर किया है, वहीं दूसरी तरफ खराब आर्थिक नीति भारत को बुलंद करने के बजाय कमजोर बना रही है । आम आदमी की सबसे जरूरी व आधारभूत जरूरत होती है- रोटी, कपड़ा और मकान और इसे जुटाने के लिए उसे घर से निकलना पड़ता है, और रोज यातायात पर व्यय करना पड़ता है, पर पेट्रोल, डीजल की बढ़ती किमतों को देखते हुये रोज रोजगार के लिए भी जहोजहद करना कठिन दिख रहा है, ऐसे में रोटी, कपड़ा और मकान की व्यवस्था करना, आधारभूत आवश्यकता की पूर्ति करना और भी मुश्‍किल कहा जायेगा । लेकिन कदम तो तभी बढेंगे जब बस, ट्रेन या यातायात के साधनों में किराया सस्ता होगा जो इस बढती महंगाई में और भी मुश्किल दिखाई दे रहा है । रोटी और कपड़ा खुद व खुद महंगा हो जायेगा, क्योंकि ट्रॉसपोट्रेशन भी पेट्रोल, डीजल पर ही निर्भर करता है, ऐसी स्थिति में यह नहीं समझ आ रहा कि यह सरकार आम आदमी किसे समझती है? क्या ये उन्हें समझती है जो इनके मंत्रिमंडल में बैठे ऐश की जिंदगी जी रहे है, या वे नेतागण जिन्हें अपने जेब से एक भी रूपया खर्च नहीं करना पड़ता है तथा वे भयावह आम आदमी जिनके पास अपार कालाधंधा है, जिन्हें धन रख के लिए भी स्विस बैंक का सहारा लेना पड़ता है । क्योंकि इस नीति में भारत की 99% जनता तो दिखाई ही नहीं दे रही है, जो आम आदमी के दायरे में आती है ।

अभी पिछले दिनों ही मंदी से जनता त्रस्त थी ही, साथ ही साथ दाल, चीनी की महंगाई ने पिछले दिनों हाहाकार मचाई ही थी । पेट्रोलियम पदार्थों का मूल्य बढ़ाना सरकार की एक ऐसी पूंजी है जिसे बढाकर सारी किमतों में खुद व खुद इजाफा हो जाता है, और एक बार जनता ने पेट्रोलियम पदार्थों की बढ़ी हुई किमतों को स्वीकार कर लिया तो अन्य पदार्थों की किमतों को बढाने का रास्ता खुद व खुद मिल जाता है । कहा जाय तो पेट्रोलियम पदार्थों की किमते आगामी दिनों में महंगाई रूपी भयावह फिल्म का ट्रेलर दिखाना सरकार की मंशा है ।

देश की भोली-भाली जनता को अब निःसंदेह विरोध करना चाहिये अन्यथा दिन पे दिन इससे भी भयावह स्थिति होती ही जायेगी । ऐसी स्थिति में वित्तमंत्री प्रणय मुखर्जी ने मीडिया कर्मियों से बात करते हुये अपनी असमर्थता जताई कि किमत बढाने के अलावा कोई अन्य चारा नहीं हैं, उन्होंने यहाँ तक कह दिया कि पेट्रोलियम पदार्थ की किमते बाजार पर निर्भर करती है लेकिन बाजार भी पेट्रोलियम पदार्थ की किमतों पर निर्भर करता है । जहाँ डीजल की किमतों पर 1.39% का फर्क अभी है जो खाद्य सामाग्रियों की किमतों को प्रभावित करेगा तथा जो आम आदमियों की जरूरत भी है । आगे चलकर 1.39% का यह फर्क इतना छोटा नहीं रह जायेगा । मुखर्जी के अनुसार महंगाई पर इसका प्रभाव 0.9% तक होगा, लेकिन अगर हर छोटी-बड़ी वस्तु को जोड़कर देखे तो क्या 0.9% की रकम इतनी छोटी होगी । जहाँ इन वक्‍तव्यों से यहाँ एक तरफ लाचारी दिखाई दे रही है, वही भारत की जनता भी इस बोझ को सहने के लिए लाचार दिख रही है, पर सवाल यह उठता है कि ऐसी स्थिति में आम आदमी कैसे बच्चों की परवरिश करेगा, कैसे दो वक्‍त की रोटी लायेगा, और कैसे तन ढकने को कपड़े का इंतजाम कर पायेगा? या इसमें भी कटौती करनी पडेगी । ऐसी स्थिति में आम आदमी के मन में यही बात है कि महंगी पड़ी यह सरकार ।



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लोकतंत्र के सर्वोच्च पद की गरिमा खतरे में

एक बार फिर देश के सर्वोपरि पद राष्ट्रपति की गरिमा को ठेस पहुंची जहां उसके द्वारा लाभ पद विधेयक के मामले में दिये गये सुझाव को दरकिनार करते हुए उसी स्वरूप में राष्ट्रपति के पास दुबारा भेजे जाने का निर्णय लिया गया है । जिस पर देश के राष्ट्रपति ने अपनी मुहर लगाने से पूर्व उस सुझाव के साथ पुनः विचारार्थ भेज दिया था । इस लोकतंत्र में उनके सुझाव की कौन कद्र करे जहां लाभ ही सर्वोपरि बना हुआ है । जिस लाभ को पाने के लिये यहां के जनप्रतिनिधियों ने पूरा जीवन ही दांव पर लगा दिया हो, उसे छोड़े जाने की बात कैसे स्वीकार हो । इस तरह के सुझाव जिससे वे लाभ पद से वंचित हो जाय, उन्हें कतई स्वीकार नहीं । जनता द्वारा चुने जाने के बाद भारतीय लोकतंत्र में जनप्रतिनिधि आज सर्वशक्‍तिमान पृष्ठभूमि में दिखाई देने लगे हैं । जहां राष्ट्रपति जैसे देश के सर्वोपरि पद की भी महिमा खंडित होती जा रही है । आज इनके निर्णय को कोई चुनौती दे, कतई स्वीकार नहीं । भले देश के सर्वोपरि पद पर विराजमान राष्ट्रपति ही इनके निर्णय से सहमत न हो, कोई फर्क नहीं पड़ता । ये जो चाहते हैं, वही करते हैं । तभी तो राष्ट्रपति के सुझाव को भी दरकिनार करते हुए स्वहित में बने लाभ पद विधेयक को ज्यों की त्यों ही राष्ट्रपति के पास पुनः भेजने का निर्णय लिया गया है । इस तरह की घटना पूर्व में भी घटती रही है । जहां विधायिका एवं राष्ट्रपति के बीच वैचारिक मतभेद उभरते रहे हैं । जहां राष्ट्रपति जैसे सर्वोपरि शक्‍तिमान को भी कठपुतली सा आचरण स्वीकार करना मजबूरी बन जाता है । जिसकी पूरी शक्‍ति विधायिका के पांव तले दबायी जाती रही हो । भारतीय लोकतंत्र में अभी तक के उभरते हालात इस बात के साक्षात प्रमाण है ।

भारतीय लोकतंत्र में राष्ट्रपति का पद वैसे तो सर्वोपरि है परन्तु इस पद के अनुरूप इसकी गरिमा व मर्यादा का ख्याल सही मायने में किसी को भी नहीं है । दिन प्रतिदिन इस पर होते राजनीतिक प्रहार से सर्वोपरि इस पद की गरिमा धूमिल ही होती जा रही है । जहां से स्वतंत्र निर्णय लेने की पृष्ठभूमि को भी सदैव खतरा बना हुआ है । और जब कभी इस पद ने स्वतंत्रता की सांस लेने की कोशिश भी की है या अपने पद के अनुरूप अपने आपको पहचानने की चेष्टा की है, उसे कुंठित होना पड़ा है । सर्वशक्‍तिमान सा समझे जाने वाले सर्वोपरि इस पद की सारी शक्‍ति आज भारतीय लोकतंत्र के आधार स्तम्भ विधायिका के नीचे दबकर रह गयी है । जहां से इसके निर्जीव मूर्तिमान सा स्वरूप को साफ-साफ देखा जा सकता है । कभी-कभी इन सब परिस्थितियों के कारण इस तरह के महत्वपूर्ण पद भी अब मतभेद के दायरे में आने लगे हैं । भारतीय लोकतंत्र में सर्वोपरि इस पद का चयन जनता के द्वारा सीधे न होकर जनप्रतिनिधियों के द्वारा किया जाना ही इस तरह की परिस्थितियों का कारण बन सकता है । जहां सर्वशक्‍तिमान सर्वोपरि पद की गरिमा एवं शक्‍ति धीरे-धीरे क्षीण होती जा रही है । जहां विधायिका राष्ट्रपति से भी सर्वोपरि होती दिखाई दे रही है ।

संसद के सत्र शुभारंभ से ही लाभ पद विधेयक के प्रसंग पर विवाद छिड़ चला । जहां सत्‍ता पक्ष ज्यों का त्यों पूर्व पारित विधेयक को अंतिम जामा पहनाने के लिये राष्ट्रपति के पास पुनः भेजने की तैयारी कर रहा था तो दूसरी ओर विपक्ष इस पर विवेचना किये जाने की वकालत करते हुए राष्ट्रपति के साथ खड़े होने की पृष्ठभूमि बनाता रहा । इस दिशा में इस विधेयक के बारे में सर्वोच्च न्यायालय की राय भी राष्ट्रपति के माध्यम से जानने की मंशा भी विपक्ष की रही, जो सोची-समझी रणनीति की पृष्ठभूमि हो सकती है । जहां विवादों के कटघरे में सरकार को एक बार फिर खड़ा किया जा सके । इस तरह के हालात में लाभ पद विधेयक को लागू करा पाना सरकार के लिये वर्तमान में मुश्किल तो अवश्य दिखाई दिया, साथ ही साथ उसके अस्तित्व पर सवालिया निशान लगता नजर भी आया । पूर्व में ऐसा लगता था कि इस परिस्थिति में वर्तमान लाभ पद विधेयक को राष्ट्रपति के पास तत्काल भेजे जाने की प्रक्रिया में विराम लग सकता है । ऐसी संभावनायें नजर आने भी लगी थी । परन्तु ऐन-केन-प्रकारेण सभी एक बिन्दु पर सहमत दिखाई देने लगे । क्योंकि स्वलाभ के दायरे में खड़े हर जनप्रतिनिधि इस लाभ पद विधेयक के पक्ष में मानसिक रूप से जुड़े अवश्य हैं । उनका नजरिया भी स्वलाभ से जुड़ चला है । जहां राष्ट्रहित से स्वहित सर्वोपरि स्वरूप धारण कर चुका है । जिनका जनसेवक का स्वरूप बदलकर मालिकाना रूप धारण कर चुका है और जो लाभ कमाने के लिये ही यहां तक पहुंचे हैं । ऐसे हालात में इस लाभ पद विधेयक को लागू कराने में सभी की पृष्ठभूमि एक जैसी होते हुए भी पूर्व में मतभेदों का प्रसंग उभरता तो अवश्य दिखाई दे रहा था जहां कहीं न कहीं एक-दूसरे की स्वहित की राजनीति समायी नजर आ रही है । इस तरह के हालात में लाभ पद विधेयक को राष्ट्रपति की मंजूरी हेतु अंततः पुनः भेज दिया गया जिस पर सभी एक स्वर में मौन दिखाई दिये । लाभ पद विधेयक को राष्ट्रपति की मंजूरी मिल भी गयी । जिस विधेयक को पुनः विचार हेतु पूर्व में राष्ट्रपति ने वापिस कर दिया था उसी विधेयक को ज्यों का त्यों बिना परिवर्तन किये राष्ट्रपति के पास दुबारा भेजे जाने का केवल मानस ही नहीं बनाया गया, ऐने-केन-प्रकारेण मंजूरी हेतु अप्रत्यक्ष रूप से दबाव बनाने की प्रक्रिया भी शुरू हो गयी । इस परिप्रेक्ष्य में प्रधानमंत्री द्वारा ज्यों का त्यों भेजे विधेयक पर राष्ट्रपति की मंजूरी दिये जाने के पक्ष में अपनी सहमति उजागर करने एवं संसदीय समिति बनाकर उसी पर सही होने की मुहर लगाये जाने की प्रक्रिया विचारणीय है ।

जहां तक लाभ पद के स्वरुप पर विचारणीय पहलू है, राष्ट्रपति की पूर्व प्रतिक्रिया को राष्ट्रहित के परिप्रेक्ष्य में लिया जाना चाहिए । लोकतंत्र में जनप्रतिनिधि का दर्जा जनसेवक के रूप में जाना गया है । सही मायने में जनप्रतिनिधि लाभ पद से दूर रहकर ही जनता एवं जनतंत्र की रक्षा कर पायेंगे । देश के सर्वोच्च पद पर विराजमान राष्ट्रपति की सोच में शामिल इस प्रसंग ने लाभ पद विधेयक, जो कहीं न कहीं जनप्रतिनिधि नियम एवं स्वरूप के प्रतिकूल दिखाई दे रहा था, पुनः विचार हेतु भेजने की पृष्ठभूमि बनायी । जिसे नजर‍अंदाज कर दिया गया । इस तरह की पृष्ठभूमि में स्वहित की भावना राष्ट्रहित की भावना से सर्वोपरि होती साफ-साफ दिखायी दे रही है । ‘समरथ को कोई दोष न गोसाई’ रामचरितमानस की यह पंक्‍ति सदैव ही इस तरह के परिवेश में सार्थकता का बोध कराती रहेगी । जहां देश के सर्वोपरि पद पर बैठे व्यक्‍ति की राय की कोई कदर नहीं ।

जहां तक लाभ पद के बारे में वैचारिक मंथन की आवश्यकता है, एक बात साफ होनी चाहिए की लाभ पद से जनप्रतिनिधियों का क्या वास्ता है जिनकी पहचान जनसेवक के रूप में ही लोकतंत्र के तहत स्थापित की गई हो । यह एक सैद्धांतिक रूप से विचारणीय पृष्ठभूमि तो बन सकती है परन्तु व्यवहारिक पक्ष कुछ और ही यहां दिखाई दे रहा है । लाभ पाने के उद्देश्‍य से आये हुए जनप्रतिनिधियों को लाभ पद के दायरे से अलग कर पाना संभव कहीं नहीं दिखायी देता । इस तरह के परिवेश ने आज लोकतंत्र की परिभाषा ही बदल डाली है । जहां लोकतंत्र के सर्वोच्च पद की गरिम अभी खतरे में हैं ।

Wednesday, February 3, 2010

नव वर्ष की शुभ कामनायें

वक्‍त अपना दस्तूर निभाते हुए एक बार पुनः कुछ खट्‌टी-मीठी यादों भरे २००९ को अपने आगोश में समेट कर चला गया और सपनों, आकाक्षांओं, महत्वाकांक्षों एवं आशाओं से भरे सन्‌ २०१० को हमारी झोली में डाल दिया है । जिसका हम सभी बड़े उत्साह से स्वागत कर रहे हैं ।
सर्वप्रथम अपने पाठकों को वर्ष २०१० के लिए ढेर सारी शुभ कामनाएं देता हूँ कि यह वर्ष उनके सारे सपनों, महत्वाकांक्षाओं व आशाओं को पूर्ण करे, और ईश्‍वर उन्हें सुख, धैर्य और सन्तोष के साथ ही उनके दिमाग को रचनात्मक व अच्छे विचारों से सिंचित करे । नए वर्ष का यह पहला अंक “नई चुनौती, नए पड़ाव” आपके समक्ष प्रस्तुत है जिसमें राजनैतिक गलियारों से २००९ के राजनैतिक परिदृश्य के जरिए यह दर्शाया गया कि राजनीति में कौन अर्थ पर था तो कौन फर्श पर था । खेल जगत में धोनी के धुरन्धरों की पोल खोलती, एक समीक्षा जिसमें आस्ट्रेलिया सीरीज हाथ से जाने की चूक की एक समीक्षा और अन्तर्राष्ट्रीय कालम्‌ में भारत व रूस की सन्धि एक सकारात्मक दिशा की ओर बढ़ते कदम । साथ ही २००९ में ही राहुल बाबा के राजनैतिक हीरो या कांग्रेस के शोमैन बनकर उभरने की समीक्षा, स्वास्थ्य जगत में २००९ में स्वाईन फ्लू एक बड़ा मुद्दा बना रहा है जिसका कहर अब भी जारी है । अतः इस अंक में प्रस्तुत है एक लेख जिसमें फ्लू व स्वाईन फ्लू में अन्तर और स्वाईन फ्लू से बचाव व उपाय दर्शाया गया है ।
इस वर्ष की ऐतिहासिक उपलब्धि मास्टर ब्लास्टर सचिन तेन्दुलकर की रही है जिसने विश्‍व में भारत का गौरव बढ़ाया है । सचिन के गौरवशाली सफर की और उनके अविस्मणीय उपलब्धियों को समय दर्पण की टीम सलाम करती है, उनके क्रिकेट के गौरवीय जीवन को दर्शाने का प्रयास करता है । साथ में समसामायिक में कैलेण्डरों के उत्पत्ति का इतिहास को भी जानने को मिलेगा । ज्योतिष में वर्ष २०१० की वार्षिक राशिफल के साथ-साथ २०१० ज्योतिषीय आधार पर शेयर-बाजार की स्थिति एवं भारत की आर्थिक स्थिति एवं राजनैतिक स्थिति में दर्शाया गया है । उपरोक्‍त विषय वस्तु के अलावा अन्य बहुत सारी रूचिकर सामग्री पढ़ने को मिलेगा । अतः आशा है उपरोक्‍त सारे विषय वस्तु पर आधारित हमारा यह अंक आपको पसन्द आएगा हम हमेशा आपके अनमोल सुझावों की प्रतीक्षा में हैं । आपसे आग्रह है कि अपने सुझाव भेजकर हमें अनुगृहित करें ।
एक बार पुनः आपको वर्ष २०१० की ढेर सारी शुभकामनाएं ।

Saturday, January 16, 2010

2012 में प्रलय की भविष्यवाणी एक कोरी कल्पना

आये दिन दुनिया की समाप्ति एवं प्रलय की भविष्यवाणियाँ तो लोगों के मन में भय व्याप्त करती रहती हैं, पिछले दिनों 2012में दुनिया समाप्ति की खबर से लोगों के मन में डर तो बना ही हु‌आ है साथ ही समय-समय पर प्राकृतिक आपदा‌ओं को लोग 2012 की भविष्यवाणी से जोड़ कर देखने लगे हैं और भयग्रस्त हो गये हैं। वैसे ऋग्वेद व पुराणों के अनुसार सौर-मंडल के किसी भी ग्रह पर जीवन की उत्पत्ति से प्रलय तक के समय को चार युगों में बाँटा गया है । पहला युग सतयुग जिसकी आयु 17,28000वर्ष मानी गयी है । इसके बाद त्रेतायुग की आयु 12,96000मानी गयी है और उसके बाद द्वापर युग की आयु 8,64000वर्ष मानी गयी है और द्वापर युग के भगवान कृष्ण का जन्म लगभग 5000वर्ष पूर्व हु‌आ था और पौराणिक कहानी के अनुसार युधिष्ठिर के पोते राजा परीक्षित के समय से कलयुग प्रारम्भ हु‌आ । इस प्रकार पौराणिक कथा के और ऋग्वेद के अनुसार भी अभी 4,25000वर्ष कलयुग के शेष हैं । जहाँ तक दुनिया की समाप्ति की भविष्यवाणियाँ हैं तो मैं एक बात बहुत ही मजबूती से कहना चाहूंगा की अभी पृथ्वी के क‌ई हजार वर्ष शेष हैं । इसे समझने के लि‌ए हमें अपने सौर-मण्डल का संक्षिप्त रूप समझना होगा । हमारे सौर -मण्डल में सूर्य के चारों ओर एक निश्चित कक्षा में भ्रमण करने वाले नौ ग्रहों के साथ-साथ उनके उपग्रह भी हैं । ये सभी ग्रह सूर्य के ही अंग हैं । जो सूर्य की अक्षीय गति से अन्तः-आणविक ऊर्जा के ह्रास के कारण अस्तित्व में आये हैं । सूर्य तथा अन्य ग्रहों के मध्य कार्यरत अभिकेन्द्रीय बल एवं अपने सौर मण्डल के बाहर से कार्यरत उत्केन्द्रीय बल के कारण ये सभी अपने अक्ष पर भ्रमण करते हैं । एक सौर-मंडल में एक समय में सिर्फ एक ही ग्रह पर जीवन संभव है जो कि वर्तमान पृथ्वीय कक्षा में है । इसी कक्षा में वे सभी कारक मौजूद हैं जो जीवन के लि‌ए आवश्यक हैं, जैसे ऑक्सीजन, तापमान, जीवद्रव्य, ओजोन की परत, जल आदि । पृथ्वी की कक्षा से बाहर का तापमान इतना कम है वहाँ जीवन संभव नही है इसी तरह बुद्ध तथा शुक्र ग्रह पर तापमान इतना अधिक है जो जीवन के लि‌ए उपयुक्त नहीं है । लेकिन यह पृथ्वी के निरन्तर अक्षीय गति से ह्रास अन्तरा आणविक ऊर्जा के कारण सूर्य और पृथ्वी के बीच कार्यरत अभिकेन्द्रीय बल धीरे-धीरे कमजोर हो रहा है और सौर मण्डल के बाहर से कार्यरत उत्केन्द्रीय बल मजबूत हो रहा है जिससे पृथ्वी अपनी कक्षा से धीरे-धीरे बाहरी कक्षा की ओर खिसक रही है । यही स्थिति हमारी पृथ्वी को धीरे-धीरे जीवन के अनुकूल वातावरण की समाप्ति की ओर ले जा रही है और यही प्रक्रिया हमारे सौर मण्डल में विद्यमान सभी ग्रहों के बीच कार्यरत है । इसी उपरोक्त सौर मण्डल की निश्चित प्रक्रिया के तहत आज से काफी समय पूर्व कभी मंगल भी पृथ्वी वाले कक्षा में भ्रमण करता था । और तब मंगल पर भी जीवन विद्यमान था लेकिन समय के साथ उस अभिकेन्द्रीय बल के सापेक्ष उत्केन्द्रीय बल का मजबूत होने के कारण मंगल मिलकर अपने वर्तमान कक्षा में भ्रमण कर रहा है जिससे उस पर तापमान घटने से जीवन की समाप्ति हु‌ई । इसी प्रक्रिया के तहत पृथ्वी पर जीवन की समाप्ति उसकी सूर्य से अभिकेन्द्रीय बल के धीरे-धीरे कमजोर होने के कारण और सूर्यसे दूरी बढ़ने एवं उस पर तापमान की कमी के कारण ही संभव है जिसे होने में अभी क‌ई लाख वर्ष शेष हैं ।क्योंकि पृथ्वी की समाप्ति के लि‌ए दो बात लिखित रूप से वैज्ञानिक आधार पर होना चाहि‌ए । पहला यह कि पृथ्वी की अक्षीय गति से ह्रास अन्तरा आणविक ऊर्जा से पृथ्वी की आणविक सह-संजन बल का कमजोर होना, दूसरा इसके द्वारा एक और दूसरे उपग्रह की उत्पत्ति तभी पृथ्वी की एक बहुत बड़े हिस्से की समाप्ति एवं भौगोलिक परिवर्तन होना और इसमें अभी कम से कम लाखों वर्ष लग सकते हैं, क्योंकि अभी पृथ्वी आन्तरिक सह संजन बल काफी मजबूत है । यह बात अलग है कि हमारे सौर मंडल में 9ग्रहों में तीन-तीन ग्रहों का समूह है जो तीन अलग प्रकृति को सन्तुलित करते हैं । यह तीनों क्रमशः अग्नि, वायु एवं ठंडा (बर्फ) प्रकृति प्रतिनिधित्व करते हैं और ग्रहों के सन्तुलित संयोग से इन प्रवृत्तियों में सन्तुलन बना रहता है, जिससे वातावरण या प्रकृति संतुलित रहती है, परन्तु हर 9वर्ष में ग्रहों की आपसी संयोग और स्थिति से किसी एक प्रकृति की प्रबलता बढ़ती है । इसमें उपरोक्त सारी बातें एक साथ कार्य करती हैं, जिससे बीच-बीच में प्रकृति का सन्तुलन बनता-बिगड़ता रहता है । इसे प्रलय का अनुमान लगाना गलत होगा । इस प्रकार उपरोक्त बातें यह सुनिश्चित करती हैं कि पृथ्वी पर जीवन की समाप्ति धीरे-धीरे तापमान घटने से होगी । परन्तु अभी पृथ्वी पर काफी तापमान है । जहाँ तक पृथ्वी फटने की बात है तो आज से हजारों वर्ष पूर्व पृथ्वी पर सूखा पड़ा, पृथ्वी फटना आम बात थी यह प्रक्रियायें ज्यादा होती थीं, क्योंकि तब पृथ्वी का तापमान ज्यादा था । लेकिन हम आधुनिकता एवं भौतिकता के कारण ज्यादा कमजोर हो गये हैं और छोटी-छोटी प्राकृतिक आपदा‌ओं से सशंकित हो गये हैं । इस प्रकार मैं कहना चाहूंगा कि घबराने की को‌ई बात नहीं है यह सब ग्रहों की असन्तुलित स्थिति के कारण प्राकृतिक घटना है ।

Monday, December 7, 2009

अपना देश बचा लो आज



भारत सरकार और माफिया में क्या अंतर है? भारत सरकार को कानूनी मोहर (अधिकार) है जबकि माफिया को कानूनी अधिकार नहीं है । आज माफिया सरकार चला रही है । भारत में झूठ बोलकर वोट ले लेने को राजनीति कहते हैं जबकि विदेशों में ऐसा नहीं है । वहाँ पार्टी के घोषणा पत्र पर पूर्णतः अमल करना पड़ता है । इस समस्या के समाधान के लिए “राइट टू रिकॉल” अर्थात जनता को अपने प्रतिनिधि वापस बुलाने का अधिकार मिलने चाहिए । गवाहों की सुरक्षा की योजना बने । जाति और धर्म आरक्षण का आधार नहीं होना चाहिए बल्कि यह आर्थिक आधार पर तय होना चाहिए ।
कुछ लोग हमेशा विरूद्ध मत में होते हैं । वे बहस करते रहे हैं कि अंडा पहले आया या मुर्गी, गाय दूध देती है या हम दूध लेते हैं । जब तक वर्षा के जल को संरक्षित नहीं किया जाएगा तब तक पानी की समस्या का समाधान नहीं हो सकता है । भ्रष्टाचार का कारण जरूरत है या लालच? आप खाली पेट में उसूल नहीं सिखा सकते । टैक्स परिसीमन को भी बदलना होगा । १० करोड़ बच्चों को विद्यालय भेजना हो तो संसद को बंद कर देना चाहिए । क्योंकि संसद में जूतमपैजार, आरोप प्रत्यारोप के सिवा देश की मूलभूत आवश्यकताओं के निदान पर क्या काम होता है? भारी भरकम योजना मंत्रालय और संपूर्ण सरकारी तंत्र के बावजूद मँहगाई जिस हिसाब से बढ़ी है उससे अमीर और ज्यादा अमीर हो गए और गरीब ठीक उसी तरह और अधिक गरीब हो गए । संपूर्ण सरकारी आँकड़ा झूठ का पुलिंदा के सिवाय और क्या है? रोजगारपरक विद्यालय अत्यधिक संख्या में खोले जाने चाहिए, वह तो खुल नहीं रहे अस्पताल और पेय जल की उपलब्धता के लिए कारगर उपाय के बजाय सारी मशीनरी “कॉमनवेल्थ गेम” पर केंद्रित हो गई है । यह कैसा मजाक है? ९०% किसान कोर्ट-कचहरी में धक्‍के खा रहे हैं । इसके निदान हेतु चकबंदी कराना अनिवार्य हो । आज साढ़े तीन करोड़ केस विचारधीन हैं जिसकी सुनवाई में १२४ साल लगेंगे । इस समस्या के निदान के लिए कोर्ट कचहरी तीन शिफ्ट में क्यों नहीं चलाई जाती है? सेवानिवृत न्यायाधीशों को वापस बुलाकर एवं ऑनरेरी मजिस्ट्रेट की नियुक्‍ति कर त्वरित न्याय दिया जा सकता है । समय पर न्याय ना मिलना अन्याय नहीं तो और क्या है? आज हर कोई अलग राज्य की माँग कर रहा है । राज्य अलग करने के बजाय वे सर्वांगीण विकास की माँग क्यों नहीं करते? जब इस देश के हर नागरिक को कहीं भी रहने और काम करने का अधिकार प्राप्त है, कोई भी भाषा, कोई भी धर्म अपनाने का अधिकार प्राप्त है, फिर जाति और भाषा के नाम पर नंगा नाच क्यों हो रहा है? इस नंगे नाच को शह कौन दे रहा है? ऐसे तत्वों की मंशा क्या देश की एकता और अखंडता के लिए घातक नहीं है?वोट बैंक तुच्छ राजनीति के कारण अपराधियों को पैरोल पर छोड़ दिया जाने हेतु दिल्ली सरकार अनुशंसा करती है । महाराष्ट्र विधानसभा में मनसे विधायकों द्वारा सपा विधायक अबू आजमी के साथ अभद्र व्यवहार किया जाता है । यह संपूर्ण हिंदी समाज पर हमला है और देर सबेर इस हमले का जवाब उपद्रवी तत्वों को जरूर मिलेगा क्योंकि समय का चक्र घूमता रहता है । शांत रहने का मतलब यह नहीं कि हम चुप हैं । हम अपनी ताकत इकट्‌ठी कर रहे हैं, उन हमलावरों के माकूल जवाब देने हेतु ।
राजस्थान में गूजर और मीणा जाति समुदाय के वर्चस्व की लड़ाई से देश का कितना नुकसान हुआ यह आकलन क्या किसी ने किया है? आज हर किसी को आरक्षण चाहिए क्यों? यदि मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति होती रहे, सबों को अपना हम मिलता रहे तो फिर आरक्षण की कोई जरूरत ही नहीं होगी, पर अभी भी जातीय वैमनस्यता, छूआछूत तथा विषमताएँ पूर्णतः दूर नहीं हुई हैं और जब तक इसका समाधान ढूँढा नहीं जाएगा विद्रोह घटने के बजाय और बढ़ेगा ।
भारत पहला ऐसा देश है जो समस्याओं का समाधान नहीं निकाल रहा है । अंतरराष्ट्रीय प्रेरक शिव खेड़ा ठीक ही कहते हैं- “यदि आप समस्या का समाधान नहीं कर सकते तो आप अपने आपमें समस्या हैं । मान लीजिए सरकार यदि यह निर्णय कर ले कि कोई बिल्डिंग नहीं बनने देंगे जब तक “सौर ऊर्जा” प्रणाली न अपना ले । तो फिर बिजली समस्या का खुद ही समाधान मिल जाएगा । आजादी के ६२ वर्ष के बाद भी राजधानी दिल्ली में बिजली, पानी सुरक्षा सुविधा कारगर नहीं है । मंदिरों में चुन्‍नियाँ चढ़ाते हैं बाहर चुन्‍नियाँ उतारते हैं । पारदर्शिता लाने एवं भ्रष्टाचार खत्म करने हेतु RTI एक्ट को और अधिक सशक्‍त करने की जरूरत है क्योंकि विभिन्‍न क्षेत्रों से अभी भी यह सूचना आ रही है कि इस पर पूर्ण रूपेण अमल नहीं किया जा रहा है । अधिकारी गैर जिम्मेदाराना रवैया अपना रहे हैं । कहीं-कहीं तो RTI द्वारा पूछे गए प्रश्नों के सही जवाब भी नहीं दिए जा रहे हैं ।
आज उनलोगों का सामाजिक बहिष्कार होना चाहिए जो बेईमान हों, भष्टाचारी हों, आततायी हों । हर कोई कहता है कि भगत सिंह, सुभाषचन्द्र बोस, चन्द्रशेखर आजाद और खुद्‌दीराम बोस पैदा हों, पर हमारे घर नहीं । यह कैसी मानसिकता है? ज्यादातर लोग तो’ स्वयं के साथ भी अन्याय होने पर प्रतिकार करने के बजाय अन्य कंधों को ढूँढने में रहते हैं । ऐसे लोग मेरे विचार से मुर्दे ही हैं, बेशक वे चलते-फिरते हों । ऐसे लोग एवं ऐसी मानसिकता की बदौलत कभी क्रांति नहीं आ सकती । क्रांति मात्र उन धारा के विपरीत चलने वाले लोगों के द्वारा ही आएगी जिसकी संख्या तो काफी कम है परन्तु नैतिकता आत्मबल और दृढ़निश्‍चय के मामले में वे काफी सबल हैं । किसी ने ठीक ही कहा था- “हमें खतरा नहीं है गोरे अंग्रेजों से खतरा तो हमें अपने काले अंग्रेजों से है जो हमीं जैसे लगते हैं, फर्क बताना मुश्‍किल है कि कौन गद्दार है । हमारे मूर्धन्य नेता रामविलास पासवान कहते हैं कि ३ करोड़ बांग्लादेशियों को नागरिकता दे दी जाय । क्या यह माँग उचित है, गौर से सोचिए और खत्म कर दीजिए ऐसे नेताओं की नेतागिरी को जो ऐसी गैरवाजिब और देशद्रोही बयानों के बदौलत अपनी नेतागिरी चमकाने में रहते हैं । दो धारा के लोग हैं- “सकारात्मक एवं नकारात्मक” । हमें सकारात्मकता की नीति को अपनाने हुए संयम एवं शालीनता के साथ नए कीर्तिमान स्थापित करने हेतु नए मापदंड स्थापित करने होंगे । आज नकली देशभक्‍तों की संख्या बढ़ गई है जबकि असली देशभक्‍तों का मानना है कि “जो देश को चाहिए वही हम करेंगे । आजादी से जियो, जाति छोड़ो-भारत जोड़ो का नारा हमें अपनाना ही पड़ेगा । गोवा में यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू है, ऐसा क्यों? सिंगापुर और इजराईल में हर परिवार के एक सदस्य का राष्ट्रीय रक्षा सेवा में जाना अनिवार्य है । यह सिद्धांत हमारे देश में क्यों नहीं लागू किया जाता है? कर प्रणाली के साथ-साथ चरित्र प्रणाली और एकल कानून प्रणाली का भी निर्धारण एवम्‌ अमल होना चाहिए । देश हर इंसान से ऊपर है । हर घरेलू कर्मचारियों के लिए पेंशन योजना हो जिसमें २०% नियोक्‍ता का और २०% कर्मचारियों के वेतन से कटे ।
देश के युवा पीढ़ी को इस संकल्प से राजनीति में आना चाहिए कि सरकार तोड़ देंगे मगर उसूल नहीं तोड़ेंगे । वैसे आज ज्यादातर युवा मन बना रहे हैं कि “हमें अब उतरना ही पड़ेगा । ”


प्रस्तुत संपादकीय की विषयवस्तु एक प्रमुख कवि गर्गऋषि शान्तनु की कविता ‘सोचेगा कौन’ ने स्पष्ट रूप से झलती हैं-

भीड़वाले हम अबतक.. झरना नीचे पानी पिये,
चन्द तुम- ऊपर - तब से :
मन्दिर.. पाठागार.. विद्यालय जलाते आए !
अब देश के लिए- बताओ- कौन सोचेगा?
विदेशी या विदेशिनी.. फिर.. नाना या नानी?


-गोपाल प्रसाद

अंतर्राष्ट्रीय व्यापार मेला २००९ भारत के आधुनिक छवि की प्रस्तुति

भारत की महामहिम राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा देवीसिंह पाटील ने नई दिल्ली के प्रगति मैदान स्थित हंसध्वनि थियेटर में एक रंगारंग और खचाखच भरे समारोह में २९ वें भारतीय अन्तरराष्ट्रीय व्यापार मेले का उद्‌घाटन किया ।
इस अवसर पर उपस्थित महानुभावों में केन्द्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री श्री आनन्द शर्मा, जिन्होंने उद्‌घाटन समारोह की अध्यक्षता की, राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली की मुख्यमंत्री श्रीमती शीला दीक्षित, उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ भारत सरकार के वाणिज्य सचिव श्री राहुल खुल्लर, इण्डिया ट्रेड प्रमोशन आर्गनाइजेशन के अध्यक्ष एवं प्रबन्ध निदेशक डॉ. सुवास पाणि, अनेक राजनयिक, वरिष्ठ सरकार अधिकारी, भारत और विदेश के भागीदारी तथा मीडिया जगत से जुड़े व्यक्‍ति शामिल थे ।
अपने उद्‌घाटन भाषण में भारत की राष्ट्रपति ने इस वर्ष व्यापार मेले को विभिन्‍न पहलुओं की दृष्टि से उसका क्षेत्र व्यापक बनाने और उसे अधिक समृद्ध बनाने के लिए केन्द्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय और आई टी पी ओ को बधाई दी । उन्होंने बताया कि पिछले अनेक वर्षों से वैश्‍विक व्यापारी समुदाय के समक्ष भारत की तीव्रगति से आधुनिक हो रही छवि को सफलतापूर्वक प्रस्तुत करने में आई आई टी एफ ने प्रतिष्ठा अर्जित की है । भारतीय अन्तरराष्ट्रीय व्यापार मेले में बी-टू-बी गतिविधियों तथा बी-टू-सी सौदों को बड़े पैमाने पर जोड़ने की अद्वितीय क्षमता है । उन्होंने कहा कि अन्तरिक्ष की खोज जैसे क्षेत्रों सहित ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था के नेता के रूप में भारत की स्थिति इसके प्रथम प्रधानमंत्री पण्डित जवाहरलाल नेहरू के प्रोत्साहन का परिणाम है । राष्ट्रपति ने आशा व्यक्‍त की कि भारतीय अन्तरराष्ट्रीय व्यापार मेला २००९ के अंग के रूप में ‘भारत की अन्तरिक्ष यात्रा’ प्रदर्शनी लोगों को, विशेषरूप से भारतीय युवाओं को विज्ञान और प्रौद्योगिकी में अध्ययन और अनुसंधान करने के लिए प्रेरणा प्रदान करेगी । उन्होंने कहा कि भविष्य आविष्कारों, नवीन खोजों और उद्यमों का है ।
मेले में आये विदेशी भागीदारों का स्वागत करते हुए राष्ट्रपति जी ने बताया कि भारत विदेशी कंपनियों, निगमों और व्यापारिक सदनों के लिए एक अनुकूल गन्तव्य स्थल के रूप में उभरा है । भारतीय अर्थव्यवस्था ने अपने सुदृढ़ स्वदेशी बाजार और प्रगति कर रहे मध्यम वर्ग तथा एक सुदृढ़ विकास दर के कारण विश्‍व में आर्थिक संकट के दौरान ६.५ प्रतिशत से भी अधिक विकास दर बनाये रखकर अपनी स्थिति मजबूत की है । अपेक्षाकृत अच्छी वृद्धि दर विश्‍व में भारत के बढ़ते आर्थिक प्रभुत्व की ओर इंगित करती है । विभिन्‍न देशों के साथ बहु-आयामी व्यापार संबंधों को आगे बढ़ाने की आवश्यकता पर बल देते हुए राष्ट्रपति ने कहा कि भारत में उचित मूल्य पर उच्च गुणवत्ता वाले उत्पादों और सेवाओं को उपलब्ध करने की अद्वितीय क्षमता है । उन्होंने कहा कि विकसित हो रही अवसंरचना से अगले पांच वर्ष के दौरान भारत में ५५० बिलियन अमेरिकी डालर के पूंजी निवेश उपलब्ध होंगे ।
अपने मुख्य भाषण में केन्द्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री श्री आनन्द शर्मा ने बताया कि एक देश से दूसरे देश के बीच व्यापार और विशेषरूप से विश्‍व की मुख्य धारा के साथ भारतीय अर्थव्यवस्था को जोड़ने के लिए उत्प्रेरक का कार्य करने में इस मेले का विशेष महत्व है । यह भी जानकारी दी गयी कि वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय ने विदेश व्यापार नीति के अन्तर्गत ३९ नये बाजारों की पहचान करने और उनका विकास करने के लिए प्रमुख पहल की है । फोकस बाजार योजनाओं के अन्तर्गत आने वाले इन २६ नए बाजारों में से १६ लेटिन अमेरिका में तथा १० नये बाजार ओसियाना और एशिया में हैं । दूसरी फोकस योजना में १३ बड़े बाजार विभिन्‍न महाद्वीपों अफ्रीका, दक्षिण अफ्रीका, सुदूर पूर्व, प्रशान्त क्षेत्र और यूरोप में है ।
श्री शर्मा ने इस बात का उल्लेख करते हुए कि भारत की क्षमता और उसकी सामर्थ्य को देखते हुए विश्‍व व्यापार में उसका हिस्सा बहुत ही कम है प्रतिशत की दृष्टि से भारत के वैश्‍विक व्यापार को वर्ष २०१४ तक दुगुना करने के लिए सरकारों की प्रतिबद्धता को दोहराया । इस बात पर पुनः बल दिया कि चुनौतीपूर्ण आर्थिक वातावरण में हमारे देश में विश्‍व अर्थव्यवस्था के साथ स्वयं को एकीकृत करने की क्षमता और प्रतिबद्धता है । उन्होंने जानकारी दी कि भारत ने पहले ओ ई सी डी देशों के साथ व्यापक आर्थिक भागीदारी पर हस्ताक्षर किए और उसके साथ ही विश्‍व व्यापार संगठन के दोहा दौरे को पुनः सक्रिय करने के लिए एक अत्यन्त सुदृढ़ कदम उठाया । ऐतिहासिक त्रृटियों को सुधारने के साथ-साथ नियम आधारित बहु-पक्षीय व्यापार व्यवस्था की आवश्यकता का समर्थन करते हुए उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि गरीब और विकासशील देशों की उचित महत्वाकांक्षाओं पर ध्यान दिये जाने और वैश्‍विक सहयोग के नये अवसर पैदा किये जाने की आवश्यकता है । उन्होंने घोषणा की कि सरकार ने राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में एक विश्‍व स्तरीय सम्मेलन केन्द्र स्थापित करने के बारे में निर्णय किया है ।
उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री ने स्वास्थ्य और आध्यात्मिक के क्षेत्र में उत्तराखण्ड राज्य की अन्तनिर्हित क्षमताओं पर प्रकाश डाला । श्रीमती शीला दीक्षित ने आई आई टी एफ २००९ में दिल्ली को भागीदारी राज्य का दर्जा दिये जाने पर प्रसन्‍नता व्यक्‍त की । उन्होंने आशा व्यक्‍त की कि दिल्ली आगामी राष्ट्र मण्डल खेल २०१० के लिए की जा रही सभी विकास गतिविधियों के कारण एक उच्च विश्‍वस्तरीय राजधानी के रूप में उभरेगी । स्वागत भाषण में डा. सुवास पाणि ने मेले की प्रमुख विशेषताओं का उल्लेख किया ।
मेले के दौरान व्यापार से संबंद्ध विषयों, विशेष प्रदर्शन और सामयिक महत्व के अन्य विषयों और थीमों पर अनेक विचार गोष्ठियां आयोजित की गईं । टेकमार्ट, उत्तम रहन-सहन आदि विशेष प्रदर्शनों में विविध उत्पाद और सेवाएं प्रदर्शित की गईं जिनमें इंजीनियरी, सॉफ्टवेयर, एवं हार्डवेयर, मोटर वाहन, इलेक्ट्रॉनिक चमड़ा, कपड़े, दूर संचार, जूट, रबड़, हस्तशिल्प, आभूषण, उपभोक्‍ता वस्तुएँ आदि शामिल की गयीं ।
आई आई टी एफ २००९ की थीम- सेवाओं के निर्यात को राज्य और संघ राज्य क्षेत्रों के मण्डपों और एकल अलग से मण्डप में भी प्रमुखता से दर्शाया गया ।
इस वर्ष दिल्ली और उत्तराखण्ड को क्रमशः साझेदार और फोकस राज्य चुना गया है तथा थाइलैण्ड और चीन को क्रमशः साझेदार देश और फोकस देश का दर्जा प्रदान किया गया ।
भारत और अन्य २८ देशों के लगभग ७५०० प्रदर्शक मेले में भाग लिया । अन्तरराष्ट्रीय भागीदारी अफगानिस्तान, बंग्लादेश, बेल्जियम, भूटान, चीन, चीन (हांगकांग) क्यूबा, मिस्त्र, जर्मनी, ईरान, ईराक, इण्डोनेशिया, म्यांमार, हालैण्ड, नेपाल, नाइजीरिया, पाकिस्तान, पापुआ और न्यूगिनी फिलीपीन्स, श्रीलंका, दक्षिण कोरिया, सीरिया, थाइलैण्ड, तुर्की, यू के, संयुक्‍त अरब अमीरात, संयुक्‍त राज्य अमेरिका और वियतनाम आदि देशों की रही । क्यूबा, ईराक, नाइजीरिया, पापुआ और न्यूगिनी मेले में पहली बार भाग लिया ।
इस वर्ष के आई आई टी एफ को “ग्रीन फेयर” का दर्जा दिया गया जिसमें प्रगति मैदान को धूम्रपान निषेध घोषित किया गया और मेले के अन्दर प्लास्टिक के थैलों का उपयोग करने पर पाबन्दी थी ।
मेले की अन्य प्रमुख विशेषता “भारत की अन्तरिक्ष यात्रा” विषय पर नेहरू मण्डप में आयोजित हो रही प्रदर्शनी थी जिसमें भारत द्वारा अन्तरिक्ष युग में प्रवेश करने के विभिन्‍न चरणों पर प्रकाश डाला गया ।
इस मेले के दौरान हंसध्वनि,शाकुन्तलम, फलकनुमा, ऐतिहासिक चौक, फूड कोर्ट, श्रृंगार, लाल चौक, एम्फी थियेटर और प्रगति मैदान में नए बने ओपन एअर थियेटर प्रगति आंगन में विभिन्‍न इलाकों के समृद्ध और विविध सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किये गए । मेले में फूड प्लाजा में “भारत का खाना” के अन्तर्गत विभिन्‍न प्रकार के स्वादिष्ट भारतीय व्यंजनों का स्वाद लेने का भी अद्वितीय अवसर प्राप्त हुआ साझेदार राज्य दिल्ली के मण्डप में विशेष रूप से- ‘दिल्ली का खाना’ खाने को मिला ।
प्रगति मैदान के लिए मैट्रो ट्रेन की सेवाओं के फेरों में वृद्धि की गई थी । दिल्ली परिवहन निगम की विशेष सेवायें दिल्ली सहित राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के गाजियाबाद, फरीदाबाद, नोएडा और गुड़गांव शहरों से उपलब्ध थी । पहली बार प्रदर्शकों, सेवा कार्मिकों और उपभोक्‍ताओं की अन्य श्रेणियों के लिए डिजिटल पहचान पत्र की प्रणाली भी लागू की गई थी ।
आम जनता की सुविधा के लिए मेले के प्रवेश टिकट मैट्रो स्टेशनों, डी टी सी के बस डिपो, मदर डेयरी बूथों और कुछ चुनिन्दा पैट्रोल पम्पों तथा भारतीय तेल निगम, भारत, पैट्रोलियम और हिन्दुस्तान पैट्रोलियम के खुदरा बिक्री केन्द्रों पर उपलब्ध थे । इन बिक्री केन्द्रों पर उपलब्ध टिकट प्रगति मैदान के टिकट बूथों पर बेचे जाने वाले टिकटों से १० रूपये सस्ते थे ।
टैकमार्ट इंडिया ः
सूक्ष्म एवं लघु उद्यमों को लगाने के लिए एनएस‍आईसी के “टैकमार्ट इंडिया २००९” में कम लागत वाली प्रौद्योगिकियों की प्रस्तुति में सूक्ष्म, लद्यु एवं मध्यम उद्यमों की सामर्थ्य एवं क्षमताओं को प्रदर्शित किया । इस प्रदर्शनी में हलकी इंजीनियरी, मैकेनिकल उत्पाद, इलेक्ट्रिकल्स एवं इलेक्टॉनिक्स, सूचना प्रौद्योगिकी, फार्मेस्युटिकल्स, सिरैमिक, मशीन एवं मशीज औजार व सामान्य उत्पाद शामिल थे । इस प्रदर्शनी में एमएसएमई यूनिटों को एक छत के नीचे अपने मार्केटिंग प्रयासों में वृद्धि करने तथा प्रौद्योगिकी के आदान-प्रदान का अवसर प्रदान किया गया ।
टैकमार्ट इंडिया २००९ के मुख्य उद्देश्य -
भारतीय सूक्ष्म, लद्यु एवं मध्यम उद्यमों की सामर्थ्यों तथा उनके उत्पादों व सेवाओं के संभावित निर्यात को प्रदर्शित करना, स्वरोजगार के माध्यम से रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने वाली प्रौद्योगिकी/मशीनों का जीवन्त प्रदर्शन एवं जानकारी देना, भारत एवं विदेशों से संभावित ग्राहकों/सप्लायरों के साथ बैठकों के माध्यम से नए मार्केट अवसरों व प्रौद्योगिकियों की तलाश करना, उद्योगों संबंधी अपने अनुभवों की भागीदारी व उनके आदान-प्रदान तथा सर्वोत्तम व्यापार प्रक्रियाओं व नीतियों पर जानकारी माध्यम से सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों के बीच मजबूत संबंध और नेटवर्किंग कायम करना आदि है । इस वर्ष एनएस‍आईसी “वर्किंग टेकमार्ट” के विशेष एनक्लोजर का प्रावधान रखा गया जहाँ स्वरोजगार के इच्छुक उद्यमियों के लिए समुचित प्रौद्योगिकियों जैसे सीमेंट-ब्रिक बनाने की मशीन, सोया दूध बनाने की मशीन, फूड प्रोसेसिंग की मशीन, कील बनाने की मशीन, नालेदार (कारूगोटिड) गत्ते को बॉक्स बनाने की मशीन, नोटबुक बनाने की मशीन, दाना बनाने की मशीन, इन्डस्ट्रियल फर्नेस, आयल एक्सपेलर डेयरी फूड, बैल्ट फास्टनर आदि प्रदर्शित की गई । इस प्रदर्शनी के अन्य आकर्षण थे- सेन्टल वूल डेवलपमेंट बोर्ड, जोधपुर की विशेष प्रदर्शनी, महिला उद्यमियों एवं अनुसूचित जाति/ अनुसूचित जनजाति से सम्बद्ध यूनिटों तथा पूर्वोत्तर राज्यों की यूनिटों द्वारा तैयार किए गए उत्पादों का प्रदर्शन आदि ।
व्यापार मेले के नाम पर नियमों की अनदेखी -
विदेशों में व्यापार मेलों के नाम पर इंडिया ट्रेड प्रमोशन ऑर्गनाइजेशन में कबूतरबाजी जोरों पर है । दो उप-प्रबंध स्तर के अधिकारियों पर आरोप है कि वह नियमों को ताक पर रखकर बार-बार विदेश यात्रा कर रहे हैं और करोड़ों डकार कर दूसरे लोगों को भी विदेश यात्रा करा रहे हैं ।
सूत्रों के मुताबिक आईटीपीओ में अधिकारियों को विदेश भेजने से लेकर व्यापारिक फर्मा के नाम पर विदेश यात्रा करने वालों के चयन में करोड़ों रूपए की धांधली हो रही है । मामला नव नियुक्‍त मुख्य प्रबंध निदेशक सुवास पाणि की जानकारी में भी आ चुका है । पर वह अभी दबाए बैठे हैं । जल्द ही मामला सीबीआई के हवाले किया जा सकता है । मामले को लेकर प्रगति मैदान में अफरा तफरी का माहौल है । यदि समय से सीबीआई की कार्रवाई होती है तो आईटीपीओ के कई वरिष्ठ अधिकारियों की गर्दन फंस सकती है । दर‍असल आईटीपीओ द्वारा भारत सरकार की ओर से दूसरे देशों में हर साल ५० से ६० मेलों का आयोजन किया जाता है । औसतन एक मेले पर सरकार द्वारा एक करोड़ रूपए से ज्यादा की राशि खर्च की जाती है । आरोप है कि मेलों में भागीदारी के लिए जाने वाली १० कंपनियों में से दो फर्जी भी होती हैं । कई मामलों में एक ही कंपनी के लोगों को बार-बार विदेश यात्रा पर भेजा जाता रहा है ।
उप-प्रबंधक हितेश सेठी ने २००७ से अक्टूबर २००९ के बीच पांच-छह विदेश यात्राएं कर चुके हैं । इनमें २००७ में दिसंबर में चीन, २००८ में जून में ब्राजील, सितंबर में फ्रांस अक्टूबर में सिंगापुर, २००९ में अप्रैल और मई में कजाकिस्तान की यात्रा पर जा चुके हैं ।
आईटीपीओ द्वारा क्रम और वरिष्ठता के आधार पर अधिकारियों को विदेशों में आयोजित होने वाले मेलों में भेजा जाता है । इसके लिए बाकायदा एक समिति द्वारा नामों का चयन किया जाता है । पर कुछ अधिकारियों का आरोप है कि लंबे समय से इस समिति की कोई बैठक नहीं हुई और कुछ वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा खुद नाम तय करके अधिकारियों को बाहर भेजा जा रहा है । वरिष्ठ प्रबंधक वीपी रस्तोगी सहित लगभग चार दर्जन ऐसे वरिष्ठ अधिकारी हैं जो पिछले ५ से १० साल से विदेश यात्रा पर नहीं जा पाए । ऐसे में कई वरिष्ठ अधिकारियों में इस घपलेबाजी को लेकर उबाल है । जल्द ही यह मामला सीबीआई तक जा सकता है ।
आईटीपीओ के वरिष्ठ महाप्रबंधक सफदर एच खान ने भी माना कि यह लोग कुछ ज्यादा ही विदेश यात्राएं कर चुके हैं । उन्होंने बताया कि यह मामले पूर्व निदेशक डॉ. शीला भिडे के समय के हैं । अब नए निदेशक आए हैं तो नई व्यवस्था तय की जाएगी ।
- गोपाल प्रसाद

26/11 की बरसी या हमारे स्वाभिमान की बरसी

२६ नवंबर २००८ को भारत की आर्थिक राजधानी मुंबई को कथित पाकिस्तानी आतंकवादियों ने सिलसिलेवार बम धमाकों और गोलियों के बौछार से दहला दिया । इस हमले में १७३ लोग मारे गये और ३०८ लोग घायल हो गये ।
इस घटना में मुंबई की शान समझे जाने वाले ताजमहल होटल को मुख्यतः निशाना बनाया गया था । यह हमला पूरे विश्‍व में ११/९ की तरह २६/११ के नाम से जाना जा रहा है ।
अब २६ नवंबर को इसकी बरसी मनाई जाएगी । क्या भारत में लोग सिर्फ आतंकवादी हमलों की बरसी मनाने के लिए बैठे हैं? रायटर की एक रिपोर्ट के मुताबिक सन २००१ से लेकर अक्टूबर २००७ तक ५९९ लोग आतंकवादी हमलों में मारे जा चुके हैं । आखिर ये क्या चल रहा है इस देश में अब जन्मदिन का उत्सव कम और श्राद्ध क्रियाऐं ज्यादा होने लगे है । आखिर ये सब कब तक चलेगा?
मुंबई हमले में पकड़े गये एक मान आतंकवादी अजमल कसाब के पाकिस्तानी होने के पक्‍के सबूत भारत के पास है । भारत में आतंकी साजिशें कितनी गहरी होती हैं, इसका अंदाजा अभी हाल ही में अमेरिकी खुफिया पुलिस द्वारा अमेरिका में ही गिरफ्तार हेडली और उसके दोस्त तहखूर राणा से हो जाता है ।
ये दोनों पाकिस्तान के लिए काम करते थे । इन दोनों का पाकिस्तान के उच्च आयोग से लगातार संपर्क था और इन दोनों के तार २६/११ के हमले से जुड़ते जा रहे हैं । हेडली नाम का ये शख्स पैदा कहीं हुआ, पढ़ाई-लिखाई कहीं हुयी और अपनी आतंकी कारमुजरियों को अंजाम उसने भारत में दिया । भारत के किसी भी स्थान पर कोई भी आतंकवादी घटना अगर घटी है, हो उसका सूत्र किसी ना किसी प्रकार से पाकिस्तान से ही जुड़ा है । हम जानते हैं कि हमारे देश वो अस्थिर करने की साजिश सीमा पार में लगातार चल रही है । वहाँ पर लगातार आतंकवादी संगठनों के सदस्यों को तरह-तरह के प्रशिक्षण देकर भारत भेजा जा रहा है आतंक फैलाने के लिए । आये दिन कई स्थानों पर आतंकवादी, खुफिया विभाग के लोग जासूस पकड़े जाते हैं, सभी कबूल करते हैं कि उनका लिंक पाकिस्तान है । जब भारत सरकार अच्छी तरह से जानती है कि देश की अस्थिरता में पाकिस्तान का हाथ है तो कार्यवाही क्यों नहीं हो रही है? अखिर हम कहाँ कमजोर पड़ रहे हैं । एक नजर डालते हैं भारत की संपूर्ण शक्‍ति के उपर ः-
भारत की जनसंख्या दूसरे स्थान पर सबसे ज्यादा है । भारत की जनसंख्या २००८ में १,१३९,१६४,९३२ थी । ये है भारत का मैन पावर । हमारा देश विश्‍व का सबसे तेजी से उभरता हुआ आर्थिक महाशक्‍ति है । हम संयुक्‍त राष्ट्र के सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता पाने के प्रबल हकदार है । भारत जी २० देशों का सदस्य है । भारत सार्क देशों का सदस्य है । भारत ब्रिक देशों का सदस्य है । भारत की सैनिक शक्‍ति विश्‍व में चौथी है ।
भारत का मित्र रूस व जापान है, यूरोपिय देश क्रांस, इंग्लैड, जर्मनी, इटली आदि है । भारत की पूरे विश्‍व में पूछ है । भारत की पूरे विश्‍व में एक अलग पहचान है । तो आखिर आतंकवाद के मामले में हम कहाँ पिछड़ रहे हैं । २००८ में दिल्ली, मुंबई, जयपुर के आतंकवादी घटनाओं पर तत्कालीन कांग्रेस सरकार से जो कुछ किया वह काफी है । हमारे देश के दुश्‍मन ऐसी कार्रवाइयों से डरने वाले नहीं हैं । हम जानते हैं कि भारत शांतिप्रिय देश हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि कोई हमारे मुंह पर थूक कर चला जाए और हम उसका अफसोस मनाते रहें । भारत की इन्हीं कमजोरियों का फायदा उठाकर पहले भी कई जघन्य घटनाऐं होती रही हैं । कुछ सालों पहले हमारे BSF के २७ वीर जवानों की बी.डी.आर (बांग्लादेश राईफल्स) ने किसी विवाद को लेकर नृशंस हत्या कर दी एवं उनके कटे-कटाऐं शव भारतीय सीमा में फेक दिये ।
भारत के ओर से भी गयी जवाबी कार्रवाई संतोषप्रद नहीं लगी । हमारे सबसे अच्छे पड़ोसी देश का तहमा हासिल किये हुए देश नेपाल में माओवादी नेता प्रचंद भारत विरोधी टिप्पणियाँ जिस अंदाज में करता है, उससे मालूम पड़ता है कि शायद भारत भूटान जैसे देशों के समक्ष खड़ा है । उस समय हमारे विश्‍व की तिसरी आर्थिक भयशक्‍ति बनने वाली बात कहाँ गुम हो जाती है पता नहीं चलता । हम जानते हैं कि भारत और पाकिस्तान के बीच कश्मीर का मुद्‌दा बेहद संवेदनशील है, लेकिन इसका मतलब यह तो नहीं कि पाकिस्तान इसका फायदा उठाकर हमारे देश के निरापराध लोगों की हत्या करवाता रहें और हमारी सरकार चुपचाप तमाशा देखती रहे । हम जानते हैं कि नक्सली हमारे देश को उसी तरीके से चाटते जा रहे हैं, जिस प्रकार से दीमक लड़की को चाटता है, लेकिन फिर सरकार अपनी नई-नई रणनीतियाँ नक्सली समस्या के लिए बनाती रहती है ।
नक्सली लैंड माईन बिछाकर एक बार में कई पुलिस व अन्य सुरक्षाबलों के जवानों को असमय मौत की नींद सुला देते हैं, लेकिन हमारी सरकार इस पर सिर्फ विचार करती है । अब अजमल कसाब को ही ले लीजिए बरसी आने वाली है २६/११ की लेकिन ये आतंकवादी अब भी चैन की नींद सोकर नये-नये ख्याब बुन रहा है । ऐसा क्यों हो रहा है, क्योंकि हमारी सरकार पिछले सालभर से उस पर मुकदमा जो चला रही है । उसने तो मुंबई में अंधाधुंध गोलियां चलाकर कई घरों को उजाड़ दिया लेकिन हम उसपर मुकदमा चलाकर अपने कर्तव्यनिष्ठ होने का स्वांग रच रहे हैं । वह कसाब कभी कबाब खाने की माँग रखा है तो कभी कुछ और भौतिक सुख-सुविधा की बात करता है । आखिर हम उसकी क्यों सुन रहे हैं? क्या पूरे विश्‍व को यह नहीं पता है कि पाकिस्तान में आतंकवादी ट्रेनिंग कैप चल रहे हैं और वहीं से भारत में आतंकवादी हमले करवाये जा रहे हैं ।
अमेरिका के उपर जब हमला हुआ तो उसने इराक और अफगानिस्तान में अपने बल का प्रयोग कर के दिखा दिया कि अगर उसकी तरफ किसी ने आँख उठाकर देखा भी तो वो उसका क्या हर्ष होगा । क्या हमें इस आतंकवाद रूपी दरिन्दो को कोई ऐसा मुंह तोड़ जवाब नहीं देना चाहिए? यदि हम ऐसा कर रहे है तो फिर २६/११ की बरसी हमारे स्वाभिमान की बरसी है । इसलिए भारत को क्या अमेरिका से रूबरू होना चाहिए? फैसला आपके ऊपर ।
[अमेरिका के उपर जब हमला हुआ तो उसने इराक और अफगानिस्तान में अपने बल का प्रयोगकर के दिखा दिया कि अगर उसकी तरफ किसी ने आँख उठाकर देखा भी तो वो उसका क्या हर्ष होगा । क्या हमें इस आतंकवाद रूपी दरिन्दो को कोई ऐसा मुंह तोड़ जवाब नहीं देना चाहिए? यदि हम ऐसा कर रहे है तो फिर २६/११ की बरसी हमारे स्वाभिमान की बरसी है । इसलिए भारत को क्या अमेरिका से रूबरू होना चाहिए? फैसला आपके ऊपर । ]

- धन्‍नू मिश्रा