न्यायालयों में बड़ी संख्या में मुकदमों के लंबित रहने पर राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने भी चिंता जाहिर की है । उन्होंने पुराने कानूनों में सुधार और न्यायिक संस्थानों को मजबूत बनाने की जरूरत बताई । इतने साल पुराने कानून को हम आज भी ढोते फिर रहे हैं । समय के परिप्रेक्ष्य में कानून भी व्यापक संशोधन एवं बदलाव की माँग कर रहा है । कानून की खामियों की वजह से अपराधी अपराध कर बेरोकटोक होकर घूम रहे हैं । वहीं मुक्तभोगी सजा पाने को विवश है । अदालतों के चक्कर लगाते-लगाते एवं हर कदम पर जेब ढीली करने के कारण ही अधिकांश लोग अदालतों के चक्कर लगाने से परहेज करते हैं तथा समाधान के अन्य विकल्प ढूँढने लगते हैं । प्रश्न यह उठता है कि समय पर यदि न्याय ना मिले तो वैसे न्याय का क्या औचित्य? आज भी भारतीय जेलों में बिना अपराध घोषित कैदी बढ़ रहे हैं । क्या यह भारतीय प्रजातंत्र के लिए डूब मरने जैसी बात नहीं है? आज आवश्यकता है त्वरित न्याय व्यवस्था की फास्ट ट्रैक कोर्ट की अदालत आपके गाँव तक जैसे व्यवस्था की । देश की संपूर्ण न्याय व्यवस्था को त्वरित एवं पारदर्शी बनाने हेतु डिजिटल करने की परम आवश्यकता है । सरकार की मंशा हो तो छः महीने के अंदर ही कानूनों के संशोधन संबंधी कार्य पूरे किए जा सकते हैं । आखिर आजादी के ६२ वर्ष गुजरने के बाद भी अब तक इतनी सरकार आई गई मगर किसी को भी इस देशव्यापी महत्वपूर्ण समस्या के समाधान की चिंता क्यों नहीं हुई?
विगत लोकसभा चुनाव के दौरान कानून की एक खामी अपने आप में सारी कहानी कह देती है “विचाराधीन कैदियों को वोट डालने का अधिकार नही देने को लेकर कानून में ही मतभेद है । जनप्रतिनिधि अधिनियम १९५१ के रूल ६७ (५) में विचाराधीन कैदियों को मताधिकार से वंचित कर दिया गया है जबकि संविधान के अनुच्छेद ३२६ मं कैदियोंको भी मत डालने का अधिकार देने की बात कही गई है । ”
इतनी सुरक्षा व्यवस्था के बावजूद भी नामी गिरामी जेलों में भी कैडी अपने दबंगता एवं रूतबे के बदौलत मोबाईल, टीवी, पिस्तौल, शराब का जमकर इस्तेमाल कर रहे हैं । इस आशय की खबरें हमें अक्सर पढ़ने को मिलती हैं । जेलों में क्षमता से अधिक कैदियों को जानवरों की तरह ठूँसकर रखा जाता है ।
भय, पैसा और पुलिस की दबाब के प्रभाव में आकर अदालत में गवाहों के ब६यान बदल जाते हैं । मध्यप्रदेश, राजस्थान, कर्नाटक और महाराष्ट्र में गवाहों की स्थिति को लेकर डेढ साल के दौरान की गई मामलों के अधययन से यह निषकर्ष निकला है कि ३१ फीसदी गवाहों को रूपए का लालच दिया गया, ३९ प्रतिशत को डराया धमकाया गया तथा २४ फीसदी ने माना कि उन्हें पुलिस द्वारा ही परेशान किया गया । केंद्रीय गृह मंत्रालय के अधीन पुलिस अनुसंधान एवं विकास ब्यूरो के सहयोग से नेशनल लॉ इंस्टीच्यूट युनिवर्सिटी, भोपाल के प्रो० जी० एस० वाजपेयी ने इस अध्ययन में गवाहों के पलटने के कारणों से लेकर आने वाली दिक्कतों की बारीकी से पड़ताल की । इस दौरान चार राज्यों के ७८९ गवाहों से चर्चा कर किए गए अध्ययन की रिपोर्ट हाल ही में ब्यूरो को सौंपी गई है ।
प्रो० बाजपेयी के अनुसार ः गवाहों की स्थिति पर देश में यह पहला अध्ययन है । गवाहों की सबसे बड़ी दिक्कत यह भी सामने आई कि उन्हें एक ही मामले में गवाही देने के लिए कई चक्कर लगाने पड़ते हैंऔर इससे होने वाले नुकसान को देखते हुए वे गवाही देने से बचते हैं । ४१ फीसदी गवाहों ने बताया कि उन्हें गवाही देने के चक्कर में आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा
।३५ फीसदी का व्यवसाय प्रभावित हुआ । गौरतलब है प्रो. सभरवाल प्रकरण में कुछ पुलिसकर्मी व कुछ गवाह मुकर गए थे जिन्हें पक्ष विरोधी घोषित किया गया था । कोर्ट के चक्कर लगाते-लगाते थक गए ।
नियत दिन सुनवाई नहीं होना गवाहों को हतोत्साहित करने का मुख्य कारण सामने आया है । ६१.७ फीसदी मामलों में देरी की वजह स्थगन रही । ६५ फीसदी गवाहों को मामले की सुनवाई के सिलसिले में एक से अधिक बार अदालत आना पड़ा । ९.४ फीसदी गवाहों को तो छह और इससे अधिक बार कोर्ट के चक्कर लगाना पड़े । दंड प्रकिया संहिता की धारा ३०९ में उल्लेख है कि उस दिन न्यायिक प्रकिया प्रारंभ होने के बाद यह तक जारी रहेगी जब तक सभी उपस्थित गवाहों का परीक्षण न हो जाए ।
ऐसी भी स्थिति ः ३९ फीसदी गवाहों के साथ गवाही के पहले या बाद में मारपीट की गई । राजस्थान में इस तरह के मामलों का प्रतिशत २०.५ तथा मप्र में ५.८ पाया गया । ३ फीसदी गवाहों को ही गवाही भत्ता मिल पाता है । ३५ फीसदी गवाह फर्जी पाए गए । ४५ फीसदी गवाह जटिल न्यायिक प्रक्रिया को बयान बदलने का कारण मानते हैं । ४६.३ फीसदी का अनुभव था कि अभियुक्त आर्थिक रूप से ताकतवर है तो वह दबाव द्वारा गवाह पलटने में सफल होताहै । यह बात महाराष्ट्र में ४०.६ फीसदी तथा मप्र में १२.६ फीसदी गवाहों ने मानी । ३९.६ फीसदी गवाहों का मानना है कि अभियुक्त की आपराधिक पृष्ठभूमि गवाहों के पलटने का कारण होती है ।
सही कहा !!
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